
डायबिटीज की मार से देश पर आर्थिक भार,कमजोर हो रही अर्थव्यवस्था!
जब दुनिया के एक चौथाई से अधिक डायबिटीज मरीज भारत में रहते हों तो देश का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए डायबिटीज पर नियंत्रण अब राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुका है...
भारत में डायबिटीज अब केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्या नहीं रही। यह धीरे-धीरे देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ बनती जा रही है। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में सामने आया है कि डायबिटीज के कारण भारत पर पड़ने वाला आर्थिक भार लगभग 11.4 ट्रिलियन डॉलर (11.4 खरब अंतरराष्ट्रीय डॉलर) है, जो दुनिया में दूसरा सबसे अधिक है।
इस सूची में पहले स्थान पर अमेरिका है, जहां यह लागत लगभग 16.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचती है, जबकि चीन 11 ट्रिलियन डॉलर के साथ तीसरे स्थान पर है। यह निष्कर्ष ऐसे समय सामने आए हैं, जब भारत पहले ही दुनिया में सबसे अधिक डायबिटीज मरीजों वाला देश बन चुका है।
दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' में प्रकाशित NCD रिस्क फैक्टर कोलैबोरेशन (NCD-RisC) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनिया भर के 828 मिलियन डायबिटीज मामलों में से एक चौथाई से अधिक भारत में थे। चिंताजनक बात यह है कि भारत में डायबिटीज से पीड़ित लगभग 62% लोगों को कोई इलाज ही नहीं मिल रहा था।
NCD रिस्क फैक्टर कोलैबोरेशन एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समूह है, जो गैर-संचारी बीमारियों यानी नॉन कम्युनिकेबल डिजीज, जैसे डायबिटीज, मोटापा, हाई BP आदि पर वैश्विक डेटा का विश्लेषण करता है।
अस्पतालों से आगे की छिपी हुई कीमत
नेचर मेडिसिन में प्रकाशित नई रिसर्च में साल 2020 से 2050 के बीच 204 देशों में संभावित डायबिटीज के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण किया गया। इस शोध में केवल इलाज के खर्च ही नहीं बल्कि काम करने की क्षमता में कमी और परिवार द्वारा दी जाने वाली देखभाल को भी शामिल किया गया।
दुनिया में डायबिटीज पर इतना खर्चा
दुनियाभर में डायबिटीज की वजह से होने वाला खर्च लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर है और यह आंकड़ा तब का है, जब परिवार द्वारा दी जाने वाली नि:शुल्क देखभाल को इसमें जोड़ा भी नहीं गया है। यह राशि वैश्विक वार्षिक GDP का लगभग 0.2% है।
लेकिन जब अनौपचारिक देखभाल को भी शामिल किया जाता है तो यह लागत बढ़कर 152 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है। यानी दुनिया की कुल GDP का 1.7% खर्च।
वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिज़नेस के प्रोफेसर क्लाउस प्रेटनर का कहना है कि 'देखभाल करने वाले लोग अक्सर आंशिक या पूर्ण रूप से कामकाजी क्षेत्र से बाहर हो जाते हैं, जिससे अतिरिक्त आर्थिक नुकसान होता है।'
शोधकर्ताओं का कहना है कि डायबिटीज़ से जुड़ा लगभग 90% आर्थिक बोझ अनौपचारिक देखभाल के कारण आता है। क्योंकि लोग दशकों तक इस बीमारी के साथ जीवन बिताते हैं और मृत्यु दर की तुलना में रोग की व्यापकता बहुत अधिक है।
दूसरे नंबर पर है भारत
भारत पर डायबिटीज के बोझ का कारण है बीमारी से ग्रस्त बड़ी आबादी। दुनिया में सबसे अधिक डायबिटिक लोग भारत में हैं लेकिन इलाज पर खर्च के मामले में अमेरिका पहले स्थान पर और भारत दूसरे स्थान पर है। जबकि तीसरा नंबर चीन का आता है। इसे अगर आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो...
अमेरिका पर बोझ: INT$ 16.5 ट्रिलियन
भारत पर बोझ: INT$ 11.4 ट्रिलियन
चीन पर बोझ: INT$ 11 ट्रिलियन
(यहां INT$ यानी 'अंतरराष्ट्रीय डॉलर', जिसकी क्रय-शक्ति अमेरिकी डॉलर के समान होती है।)
भारत और चीन में यह बोझ मुख्य रूप से मरीजों की अत्यधिक संख्या के कारण है। जबकि अमेरिका में यह लागत ज्यादातर महंगे इलाज और शारीरिक कार्यक्षमता में कमी के कारण बढ़ती है। अध्ययन में अमीर और गरीब देशों के बीच बड़ा अंतर भी सामने आया। इनमें उच्च-आय वाले देशों में डायबिटीज़ से जुड़ी 41% आर्थिक लागत इलाज पर खर्च होती है।
जबकि कम-आय वाले देशों में यह आंकड़ा केवल 14% है। इसका अर्थ यह है कि कम आय वाले देशों में इलाज तक मरीजों की पहुंच सीमित है।अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान के विशेषज्ञ माइकल कून कहते हैं, 'यह स्पष्ट दिखाता है कि डायबिटीज़ जैसी दीर्घकालिक बीमारियों का आधुनिक इलाज केवल अमीर देशों तक ही सीमित रह गया है।'
कैंसर और अल्जाइमर से भी महंगी बीमारी
शोधकर्ताओं के अनुसार, डायबिटीज का आर्थिक प्रभाव कैंसर और अल्जाइमर जैसी बीमारियों से भी अधिक है। यही कारण है कि इसे दुनिया की सबसे महंगी दीर्घकालिक बीमारियों में गिना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि रोकथाम ही इस बीमारी का सबसे प्रभावी समाधान है। इसलिए डायबिटीज का खतरा और आर्थिक बोझ दोनों कम करने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि,संतुलित आहार और वजन नियंत्रण को अपनाना ही बेहतर विकल्प है।
इसके साथ ही लक्षणों के आधार पर बीमारी की जल्दी पहचान बेहद जरूरी है। ताकि इसे बढ़ने से रोका जा सके। पूरी आबादी की स्क्रीनिंग, समय पर जांच और उपचार से जटिलताओं को रोका जा सकता है, जो लंबे समय में खर्च बढ़ाती हैं।
जब दुनिया के एक चौथाई से अधिक डायबिटीज मरीज भारत में रहते हों तो यह स्पष्ट हो जाता है कि डायबिटीज से लड़ाई केवल सेहत की नहीं, देश की आर्थिक सुरक्षा की भी लड़ाई है। भारत के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए डायबिटीज पर नियंत्रण अब राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुका है।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

