
छोड़िए रेजॉल्यूशन का चस्का, इस आसान तकनीक से बढ़ेगी आपकी फिटनेस
जैसे ही नया साल आता है अधिकांश लोग अपने लिए नए-नए रिजॉल्यूशन लेते हैं। किसी को कुछ नया सीखना है तो किसी को फिटनेस बढ़ानी है। लेकिन ज्यादातर का फितूर कुछ ही...
नए साल पर जब हम अपने लिए नए-नए रेजॉल्यूशन लेते हैं, प्लानिंग करते हैं तो शुरू के दिनों में नई शुरुआत अक्सर हमें बड़े बदलावों का सपना दिखाती है। लेकिन विज्ञान एक अलग सच बताता है कि शरीर और दिमाग को सच में बदलने वाले फैसले बहुत बड़े नहीं होते। बल्कि वे छोटे होते हैं और रोज दोहराए जाते हैं। यही कारण है कि आधुनिक न्यूट्रिशन और न्यूरोसाइंस अब डायट प्लान से अधिक डेली हैबिट्स पर जोर देता है। इसलिए अपनी फिनेस को बढ़ाने के लिए ऐसे रेजॉल्यूशन के पीछे मत भागिए, जो कुछ ही दिनों बाद बोझिल लगने लगे। बल्कि घर में और आदत में ये छोटे-बदलाव शामिल करेंगे तो फिटनेस तेजी से बढ़ेगी...
फ्रिज से करें सेहत में सुधार की शुरुआत
फिटनेस बढ़ाने के लिए अपनी डायट में सुधार करना आवश्यक है। इसके लिए शुरुआत रसोई से करनी होगी क्योंकि स्वस्थ जीवन का सबसे पहला कदम यहीं से शुरू होता है। इसके लिए सबसे पहले अपने घर के फ्रिज पर ध्यान देना होगा। जब फ्रिज में पैकेट बंद, अल्ट्रा प्रोसेस्ड भोजन भरा होता है तो दिमाग को बार-बार वही खाने का संकेत मिलता है।
आहार और पोषण से जुड़े कई शोध यह दिखाते हैं कि जंक फ़ूड केवल वजन नहीं बढ़ाते बल्कि दिमाग में सूजन और इंसुलिन रेजिस्टेंस को भी बढ़ाता है। इसके उलट, जब फ्रिज में ताजी सब्ज़ियां, फल, दालें और साबुत अनाज होते हैं तो भोजन अपने आप संतुलित हो जाता है। यानी हेल्दी खाने के लिए इच्छाशक्ति से पहले अपनी किचन और फ्रिज का माहौल बदलना जरूरी है।
दिन की शुरुआत ऐक्टिवली करें
सुबह का समय शरीर की जैविक घड़ी के लिए सबसे संवेदनशील होता है। जैसे ही आप दिन की शुरुआत हल्की शारीरिक गतिविधि से करते हैं फिर चाहे मॉर्निंग वॉक के लिए टहलना हो,स्ट्रेचिंग हो या योग। इनसे दिमाग में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे रसायन सक्रिय हो जाते हैं। यही रसायन मूड बूस्ट,एकाग्रता और तनाव नियंत्रण से जुड़े होते हैं। यही कारण है कि जो लोग सुबह सक्रिय रहते हैं, उनमें दिनभर थकान और चिड़चिड़ापन कम देखा जाता है।
आंतों की सेहत पर ध्यान दें
अब बात उस अंग की, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं, वह हैं हमारी आंतें। आधुनिक शोध स्पष्ट कर चुका है कि आंत और दिमाग एक-दूसरे से सीधे जुड़े हैं। जब भोजन में प्रीबायोटिक और प्रोबायोटिक तत्व शामिल होते हैं तो आंत का माइक्रोबायोम संतुलित रहता है। यह संतुलन न केवल पाचन सुधारता है बल्कि इम्यूनिटी और मानसिक स्थिरता को भी मज़बूत करता है। इसलिए फर्मेंटेड भोजन और फाइबर केवल पेट के लिए नहीं बल्कि दिमाग के लिए भी आवश्यक हैं।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए ऐसा करें
मानसिक स्वास्थ्य की बात करें तो भावनाओं को दबाने की बजाय उन्हें लिखना दिमाग को हल्का करता है। इसके लिए हर दिन के घटनाक्रम को डायरी में लिखने की आदत डालें। आज किस चीज ने आपको खुशी दी और किस चीज से आपको दुख हुआ, उन पर कुछ लाइनें लिखें। नियमित डायरी लेखन पर आधारित मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि इससे तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर घटता है। ऐसा इसलिए क्योंकि लिखना हमारे दिमाग को यह मौका देता है कि दिमाग उलझी हुई बातों को क्रम में ला सके।
नींद को आराम ना समझें!
नींद को अक्सर आराम समझ लिया जाता है। लेकिन यही वह समय है, जब शरीर की सबसे अधिक मरम्मत होती है। नींद की कमी इंसुलिन,भूख हार्मोन और तनाव हार्मोन तीनों को असंतुलित कर देती है। यही कारण है कि कम सोने वाले लोगों में मोटापा, डायबिटीज और मानसिक थकान का जोखिम अधिक पाया जाता है। नियमित और गहरी नींद शरीर को दोबारा संतुलन में लाती है।
चलना जरूरी है
चलना एक साधारण गतिविधि लगती है। लेकिन इसके प्रभाव गहरे होते हैं। हर दिन कम से कम 10 हजार कदम चलने का प्रयास जरूर करें। इससे रक्त संचार बेहतर होता है, ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और मेटाबॉलिजम सक्रिय रहता है। यही कारण है कि डॉक्टर इसे सबसे सुरक्षित और स्थायी व्यायाम मानते हैं।
भोजन में फैट की मात्रा
भोजन में फैट को दुश्मन समझने की धारणा अब विज्ञान ने तोड़ दी है। सही प्रकार के फैट जैसे, ओमेगा-3 धमनियों की सूजन कम करते हैं और दिमागी कोशिकाओं की सुरक्षा करते हैं। इसी तरह, हर भोजन में प्रोटीन शामिल करने से भूख नियंत्रित रहती है और मांसपेशियों का क्षय रुकता है।
वजन प्रशिक्षण को केवल बॉडी बिल्डिंग से जोड़कर देखना भी एक भ्रांति है। हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग मेटाबॉलिजम को तेज करता है। हड्डियों को मजबूत बनाता है और उम्र के साथ आने वाली कमजोरी को धीमा करता है।
क्या करना है पेपर पर लिखें
लक्ष्य निर्धारित करो और इन्हें पूरा करने का प्रयास भी। जब हम अपने लक्ष्य पेपर पर लिखते हैं तो दिमाग उन्हें वास्तविक मानने लगता है। व्यवहार विज्ञान बताता है कि लिखे गए लक्ष्य केवल इच्छा नहीं रहते बल्कि कार्ययोजना बन जाते हैं।
अगर इन सभी बातों को जोड़कर देखा जाए तो साफ समझ आता है कि स्वास्थ्य कोई एक दिन का फैसला नहीं है बल्कि हर दिन का अभ्यास है। छोटे, समझदारी भरे कदम ही शरीर, दिमाग और भावनाओं को लंबे समय तक स्वस्थ रखते हैं।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

