
बच्चा जीवनभर मिर्गी से लड़ेगा अगर मां ने नहीं रखा इस बात का ध्यान!
गर्भ में पल रहा शिशु अपने फेफड़ों से सांस नहीं लेता। उसकी हर सांस, हर धड़कन और हर न्यूरॉन की ऊर्जा मां के खून के जरिये मिलने वाली ऑक्सीजन पर निर्भर करती है...
World Epilepsy Day: मिर्गी के इलाज और मिर्गी के मरीज की देखभाल संवंधी सावधानियों पर अक्सर बात होती है। लेकिन मिर्गी की समस्या जहां से शुरू होती है, उस मूल कारण पर कम ही ध्यान दिया जाता है। गर्भावस्था के दौरान महिला की हर तरह से देखभाल केवल उसकी जरूरत नहीं होती है बल्कि उसकी हर सांस और हर भावना गर्भ में पल रहे बच्चे को प्रभावित कर रही होती है। मिर्गी जैसी जीवनभर परेशान करने वाली बीमारी की नींव भी अक्सर तभी पड़ जाती है, जब बच्चा गर्भ में होता है....
गर्भकालीन ऑक्सीजन की कमी और एपिलेप्सी का संबंध
गर्भ में पल रहा शिशु अपने फेफड़ों से सांस नहीं लेता। उसकी हर सांस, हर धड़कन और हर न्यूरॉन की ऊर्जा मां के खून के जरिये मिलने वाली ऑक्सीजन पर निर्भर करती है। इसलिए जब गर्भकाल के दौरान किसी भी कारण से बच्चे तक पूरी ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती तो इसका असर केवल जन्म तक सीमित नहीं रहता कई बार यह असर वर्षों बाद एपिलेप्सी जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्या के रूप में सामने आता है।
गर्भकालीन ऑक्सीजन की कमी आखिर होती क्या है?
मेडिकल भाषा में इसे इन्ट्रायूटेरिन हाइपोक्सिया कहा जाता है। इसका अर्थ है कि प्लेसेंटा और गर्भनाल के माध्यम से बच्चे को मिलने वाली ऑक्सीजन उसकी विकासात्मक जरूरत से कम हो गई है। यह कमी कुछ मिनटों की भी हो सकती है और कई हफ्तों तक भी बनी रह सकती है और यही अवधि आगे चलकर नुकसान की गहराई तय करती है।
दिमाग क्यों सबसे अधिक प्रभावित होता है?
मानव मस्तिष्क शरीर का वह अंग है जो ऑक्सीजन पर सबसे अधिक निर्भर करता है। न्यूरोसाइंस रिसर्च बताती है कि दिमाग की कोशिकाएं कुछ ही मिनटों की ऑक्सीजन कमी में तनाव में आ जाती हैं। अगर यह स्थिति बार-बार या लंबे समय तक बनी रहे तो न्यूरॉन्स स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। यही क्षति आगे चलकर दिमाग की इलेक्ट्रिकल गतिविधि को अस्थिर बना देती है और यहीं से एपिलेप्सी की नींव पड़ती है।
ऑक्सीजन की कमी से एपिलेप्सी तक की यात्रा कैसे होती है?
गर्भकालीन हाइपोक्सिया के दौरान दिमाग के कुछ हिस्से जैसे, हिप्पोकैम्पस और सेरेब्रल कॉर्टेक्स सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। रिसर्च में देखा गया है कि इन क्षेत्रों में ऑक्सीजन की कमी से न्यूरॉन्स का नेटवर्क ठीक से विकसित नहीं हो पाता। जन्म के बाद यही असंतुलित नेटवर्क असामान्य इलेक्ट्रिकल डिस्चार्ज पैदा करता है, जो आगे चलकर मिर्गी के दौरों के रूप में प्रकट हो सकता है।
क्या हर ऑक्सीजन की कमी एपिलेप्सी में बदल जाती है?
नहीं। यह समझना बेहद ज़रूरी है। सभी मामलों में एपिलेप्सी नहीं होती। अगर ऑक्सीजन की कमी हल्की थी, कम समय तक रही और समय रहते पहचान ली गई तो शिशु का मस्तिष्क काफी हद तक खुद को संभाल लेता है। लेकिन रिसर्च यह भी बताती है कि गंभीर और लंबे समय तक चली ऑक्सीजन की कमी, खासकर जन्म के समय बर्थ एस्फिक्सिया के साथ, एपिलेप्सी के खतरे को कई गुना बढ़ा देती है।
क्या संकेत देती हैं स्टडीज़ ?
अंतरराष्ट्रीय न्यूरोलॉजी और पीडियाट्रिक जर्नल्स में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, जिन बच्चों को गर्भ में या जन्म के समय गंभीर हाइपोक्सिया का सामना करना पड़ा, उनमें बचपन या किशोरावस्था में एपिलेप्सी विकसित होने की संभावना सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक पाई गई। कुछ स्टडीज़ यह भी बताती हैं कि ऐसे बच्चों में एपिलेप्सी के दौरे अधिक जटिल और लंबे समय तक चलने वाले हो सकते हैं।
जन्म के बाद संकेत कब दिखाई देने लगते हैं?
कुछ बच्चों में एपिलेप्सी के लक्षण बचपन में ही दिखने लगते हैं, जबकि कुछ में यह समस्या स्कूल जाने की उम्र या किशोरावस्था में सामने आती है। अक्सर माता-पिता को यह समझ नहीं आता कि इसकी जड़ें गर्भकाल तक जुड़ी हो सकती हैं। यही कारण है कि डॉक्टर जन्म के इतिहास को एपिलेप्सी की जांच में इतना महत्व देते हैं।
रोकथाम की सबसे मजबूत कड़ी गर्भावस्था की निगरानी
अच्छी बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा में गर्भकालीन ऑक्सीजन की कमी को समय रहते पकड़ा जा सकता है। डॉप्लर अल्ट्रासाउंड, एनएसटी और नियमित फॉलो-अप से यह पता लगाया जा सकता है कि बच्चा गर्भ में सुरक्षित है या नहीं। समय पर हस्तक्षेप करके न केवल सुरक्षित डिलीवरी कराई जा सकती है बल्कि भविष्य में होने वाली न्यूरोलॉजिकल समस्याओं जैसे, एपिलेप्सी के खतरे को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
एपिलेप्सी अचानक पैदा होने वाली बीमारी नहीं है। कई बार इसकी कहानी गर्भ में शुरू हो जाती है, उस समय जब बच्चा पूरी तरह मां की सांसों और खून पर निर्भर होता है। इसलिए गर्भकाल में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति केवल सुरक्षित जन्म का नहीं बल्कि बच्चे के पूरे न्यूरोलॉजिकल भविष्य का सवाल है। मिर्गी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल फरवरी के दूसरे सोमवार को विश्व मिर्गी दिवस मनाया जाता है।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

