
गुलियन बेरी सिंड्रोम, जानें जरूरी मेडिकल टेस्ट और बचाव से जुड़ी बातें
गुलियन बेरी सिंड्रोम में अपने शरीर की इम्युनिटी ही अपनी दुश्मन बन जाती है। इससे बॉडी का सारा सिस्टम बैठने लगता है। समय पर इलाज मिले तो गंभीर स्थिति से बच सकते हैं
Guillain Barre Syndrome : गुलियन बेरी सिंड्रोम एक दुर्लभ लेकिन गंभीर बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) अपने ही नर्वस सिस्टम (Nervous System) पर हमला करने लगती है। यह समस्या अक्सर वायरल (Viral) या बैक्टीरियल (Bacterial) इंफेक्शन के बाद देखने को मिलती है। इसके शुरुआती लक्षणों में पैरों में कमजोरी (Weakness), झुनझुनी (Tingling) और मांसपेशियों में दर्द (Muscle Pain) शामिल होते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के ऊपरी हिस्से तक पहुंच सकते हैं। अगर समय पर इलाज न किया जाए तो यह स्थिति सांस लेने में तकलीफ (Breathing Difficulty) और लकवे (Paralysis) जैसी समस्या का कारण बन सकती है। यहां जानें इसकी जांच औरि बचाव के उपाय...
मेडिकल हिस्ट्री और लक्षणों की जांच (Medical History and Symptoms)
गुलियन बेरी सिंड्रोम का पता लगाने के लिए सबसे पहले मेडिकल हिस्ट्री (Medical History) और लक्षणों की जांच की जाती है। डॉक्टर मरीज से पूछते हैं कि कमजोरी (Weakness) और झुनझुनी (Tingling) जैसी दिक्कतें कब से हो रही हैं। साथ ही यह भी देखा जाता है कि क्या कमजोरी शरीर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक फैल रही है। मांसपेशियों की ताकत (Muscle Strength), तालमेल (Coordination) और संवेदनशीलता (Sensitivity) की जांच भी की जाती है।
नर्व कंडक्शन स्टडी (Nerve Conduction Study)
यह टेस्ट नर्व्स (Nerves) के जरिए इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स (Electrical Signals) की गति को मापने के लिए किया जाता है। गुलियन बेरी सिंड्रोम में नर्व्स की गति धीमी हो जाती है, जो नर्व डैमेज (Nerve Damage) का संकेत देती है। यह टेस्ट बीमारी की पुष्टि करने के लिए बेहद जरूरी है।
इलेक्ट्रोमायोग्राफी (Electromyography)
यह टेस्ट मांसपेशियों (Muscles) और नर्व्स (Nerves) के बीच होने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स की गतिविधि को मापता है। इससे यह पता चलता है कि समस्या नर्व्स में है या मांसपेशियों में। यह टेस्ट गुलियन बेरी सिंड्रोम की गंभीरता का आकलन करने में मदद करता है।
लंबर पंक्चर (Lumbar Puncture)
लंबर पंक्चर टेस्ट के जरिए रीढ़ की हड्डी (Spinal Cord) के चारों ओर मौजूद सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) का सैंपल लिया जाता है। गुलियन बेरी सिंड्रोम में इस फ्लूइड में प्रोटीन (Protein) का स्तर बढ़ा हुआ पाया जाता है, जबकि सफेद रक्त कोशिकाएं (White Blood Cells) सामान्य रहती हैं। यह टेस्ट बीमारी की पुष्टि करने में अहम भूमिका निभाता है।
ब्लड टेस्ट और MRI
ब्लड टेस्ट (Blood Test) से इंफेक्शन (Infection), मेटाबॉलिक समस्याएं (Metabolic Disorders) या ऑटोइम्यून डिसऑर्डर (Autoimmune Disorder) का पता लगाया जाता है। इसके अलावा, MRI स्कैन के जरिए नर्व्स में सूजन (Inflammation) या अन्य असामान्यताओं का पता लगाया जा सकता है। हालांकि, MRI गुलियन बेरी सिंड्रोम की डायग्नोसिस के लिए प्राथमिक टेस्ट नहीं है।
स्पेशल टेस्ट्स (Special Tests)
अगर मरीज को सांस लेने में तकलीफ हो रही हो तो फेफड़ों की कार्यक्षमता (Lung Function) की जांच की जाती है। कई मामलों में कार्डियक मॉनिटरिंग (Cardiac Monitoring) भी की जाती है क्योंकि यह बीमारी दिल की धड़कन (Heart Rate) को भी प्रभावित कर सकती है।
समय पर इलाज क्यों जरूरी है?
गुलियन बेरी सिंड्रोम तेजी से बढ़ने वाली बीमारी है, जो बिना इलाज के गंभीर रूप ले सकती है। समय पर इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy) या प्लाज्मा थेरेपी (Plasma Therapy) से नर्व डैमेज (Nerve Damage) को रोका जा सकता है और रिकवरी (Recovery) की प्रक्रिया तेज हो सकती है। अगर आपको कमजोरी, झुनझुनी या चलने में परेशानी हो रही है तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
Disclaimer: यह लेख केवल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए डॉक्टर से सलाह जरूर लें।