पूरा बीमा होने के बाद भी क्यों जेब से देना पड़ता है अस्पताल का बिल?
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हेल्थ इंश्योरेंस होने के बाद भी क्यों चुकाना पड़ता है बिल?

पूरा बीमा होने के बाद भी क्यों जेब से देना पड़ता है अस्पताल का बिल?

क्या आपने ऐसी स्थिति का सामना किया है, जब पूरा हेल्थ बीमा होने के बाद भी हॉस्पिटल बिल का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से देना पड़ा हो? क्यों होता है ऐसा, जानें...


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हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने के बाद व्यक्ति के मन में विश्वास होता है कि अब सेहत से जुड़ी कोई बड़ी समस्या आ गई तो बीमारी के इलाज का पूरा खर्च बीमा कंपनी देगी। साथ ही गंभीर बीमारी या सर्जरी की स्थिति में पैसा चिंता का विषय नहीं बनेगा। लेकिन जैसे ही अस्पताल से छुट्टी का समय आता है और बीमा कंपनी 'आंशिक भुगतान' की बात करती है, तब यह भरोसा अचानक टूट जाता है। आपको अचानक धक्का लगता है कि 10 लाख का हेल्थ इंश्योरेंस लेने के बाद 6 लाख रुपये के बिल में भी अपनी जेब से पैसे क्यों देने पड़ रहे हैं? उस पल मरीज को लगता है कि उसके साथ कोई चाल चली गई है। जबकि बीमा कंपनी के लिए यह सिर्फ पॉलिसी के नियमों का पालन होता है...


क्यों होती है समस्या?

असल समस्या यह है कि अधिकतर लोग पॉलिसी खरीदते समय केवल कवर अमाउंट और प्रीमियम पर ध्यान देते हैं। लेकिन बीमा की असली कहानी उन छोटी-छोटी शर्तों में छिपी होती है, जिन्हें अक्सर कोई पढ़ता तक नहीं। खासतौर पर दो नियम ऐसे होते हैं, जो पूरे अस्पताल बिल की दिशा तय कर देते हैं, ये हैं कमरे के किराए की सीमा और इलाज पर लगाई गई उप-सीमाएं।

कमरे के किराए की सीमा का मतलब होता है कि आपकी पॉलिसी प्रतिदिन अस्पताल के कमरे के लिए अधिकतम कितनी राशि देगी। यह कभी तय रकम के रूप में होती है और कभी आपकी कुल बीमा राशि के प्रतिशत के रूप में। कागज पर यह छोटी शर्त लगती है लेकिन सच्चाई में यही तय करती है कि आपका पूरा इलाज कितना कवर होगा।


कैसे बढ़ता है अस्पताल का बिल?

भारत के अस्पतालों में कमरे की श्रेणी केवल आराम से जुड़ी नहीं होती बल्कि उससे जुड़े खर्च भी बदल जाते हैं। जैसे ही मरीज सामान्य कमरे से डीलक्स या निजी कमरे में जाता है, न केवल कमरे का किराया बढ़ता है, बल्कि नर्सिंग चार्ज, डॉक्टर की विज़िट फीस, निगरानी शुल्क और कई बार इलाज की लागत भी बढ़ जाती है। अगर आपकी पॉलिसी 4,000 रुपये प्रतिदिन की अनुमति देती है और आपने 8,000 रुपये वाला कमरा चुना तो बीमा कंपनी केवल कमरे का आधा किराया ही नहीं काटती। कई पॉलिसियों में पूरे बिल पर अनुपातिक कटौती लागू कर दी जाती है। यानी आपके इलाज से जुड़े कई खर्चों का भी सिर्फ आधा भुगतान होता है, चाहे उनका कमरे से सीधा संबंध न हो। यही वह जगह है जहां एक छोटी-सी शर्त पूरे दावे की बड़ी राशि निगल जाती है।


पॉलिसी की उप-सीमाएं जरूर देखें

दूसरी ओर, उप-सीमाएं कुछ खास इलाजों पर और भी गहरी चोट करती हैं। मान लीजिए आपकी पॉलिसी 10 लाख रुपये का कवर दिखाती है, लेकिन मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए 25,000 रुपये प्रति आंख की सीमा तय है। अगर अस्पताल इस सर्जरी के लिए 60,000 रुपये लेता है तो बीमा कंपनी फिर भी केवल 25,000 रुपये ही देगी। बाकी पैसा आपकी जिम्मेदारी बन जाता है, भले ही आपकी कुल बीमा राशि अभी खर्च भी न हुई हो। पुरानी और कम प्रीमियम वाली पॉलिसियों में ऐसी उप-सीमाएं अधिक होती हैं। इससे पॉलिसी सस्ती दिखती है। लेकिन जोखिम का बड़ा हिस्सा चुपचाप ग्राहक के कंधों पर डाल दिया जाता है।


दो नियमों की गाज गिरना

सबसे कठिन स्थिति तब बनती है, जब दोनों नियम एक साथ लागू हो जाते हैं। पहले इलाज पर उप-सीमा लगती है, फिर महंगे कमरे के कारण पूरे बिल पर अनुपातिक कटौती होती है। नतीजा यह होता है कि बीमा कंपनी द्वारा स्वीकृत राशि अस्पताल के कुल बिल से बहुत कम रह जाती है। मरीज को तब समझ आता है कि 'बीमित होना' और 'सुरक्षित होना' दो अलग-अलग बातें हैं। इसी वजह से एक ही अस्पताल में एक जैसी सर्जरी कराने वाले दो लोगों के खर्च पूरी तरह अलग हो सकते हैं, भले ही दोनों के पास हेल्थ इंश्योरेंस हो।

बीमा कंपनियों के नजरिए से ये सीमाएं खर्च को नियंत्रित करने और अनावश्यक महंगे इलाज को रोकने का तरीका हैं। अगर कमरे और इलाज की लागत पर कोई सीमा न हो तो अस्पताल मरीजों को महंगे विकल्पों की ओर और ज्यादा धकेल सकते हैं। लेकिन ग्राहक के लिए ये नियम अक्सर छिपे हुए जाल जैसे लगते हैं, क्योंकि पॉलिसी खरीदते समय इन्हें स्पष्ट रूप से समझाया नहीं जाता।


नई पॉलिसियों में है विकल्प

हालांकि अब बाजार में बदलाव दिख रहा है। कई नई पॉलिसियां बिना कमरे की सीमा और बिना उप-सीमा के विकल्प देने लगी हैं। लेकिन उनकी कीमत भी अधिक होती है। यहां सवाल सिर्फ पैसे का नहीं, भरोसे का है। क्योंकि बीमारी के समय सबसे आखिरी चीज जो इंसान चाहता है, वह है वित्तीय असुरक्षा।

अगर आपके पास पहले से हेल्थ इंश्योरेंस है तो उसकी शर्तें एक बार जरूर पढ़िए। देखें कि कमरे के किराए की सीमा क्या है, इलाज पर उप-सीमाएं कहां-कहां लागू होती हैं और क्या सीमा से ज्यादा खर्च करने पर पूरे बिल में कटौती होती है। नई पॉलिसी लेते समय ऐसी योजना चुनना बेहतर होता है, जिसमें ये सीमाएं न्यूनतम हों।


भारत में हेल्थ इंश्योरेंस अक्सर इसलिए असफल नहीं होती कि कवर कम है। बल्कि इसलिए कि उस कवर का उपयोग सीमित कर दिया जाता है। कमरे की सीमा और उप-सीमाएं कोई छोटे तकनीकी नियम नहीं हैं बल्कि वही तय करते हैं कि आपकी बचत सुरक्षित रहेगी या नहीं। अंत में सच्चाई यही है कि बीमा केवल एक कागजी वादा नहीं होना चाहिए। वह उस समय ढाल बनना चाहिए, जब इंसान सबसे कमजोर होता है। और यह तभी संभव है, जब हम पॉलिसी को सिर्फ खरीदें नहीं बल्कि समझें भी।


डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह करें।


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