मां की सांस से बच्चे का दिमाग: गर्भ में ऑक्सीजन क्यों है निर्णायक?
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गर्भ में ऑक्सिजन का स्तर सही बनाए रखने के लिए क्या करें?

मां की सांस से बच्चे का दिमाग: गर्भ में ऑक्सीजन क्यों है निर्णायक?

गर्भ में ऑक्सिजन की कमी का किस बच्चे पर कैसा असर होगा, यह इस बात पर निर्भर है कि बच्चे के दिमाग का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है। अगर ऑक्सीजन की कमी का असर...


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International Epilepsy Day: गर्भ में पल रहा बच्चा सांस कैसे लेता है? इस बात की जानकारी होना बहुत जरूरी है। ताकि होने वाले माता-पिता सजग रहें और कई तरह की सेहत संबंधी समस्याओं और गंभीर बीमारियों के जोखिम को समय रहते कम किया जा सके। आपको बता दें कि प्रेग्नेंसी के समय यदि कुछ समय के लिए भी बच्चे को मिलने वाली ऑक्सिजन का स्तर कम हो जाए तो इसका असर बच्चे के आने वाले जीवन पर पड़ सकता है...

प्रेग्नेंसी में बच्चे को ऑक्सीजन कैसे मिलती है?

गर्भ में बच्चा अपने फेफड़ों से सांस नहीं लेता। उसे पूरी ऑक्सीजन मां के खून के जरिए प्लेसेंटा (गर्भनाल तंत्र) से मिलती है। यानी मां की सांस, उसका खून, उसकी जीवनशैली, सब सीधे बच्चे की ऑक्सीजन सप्लाई तय करते हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि मां की हर आदत बच्चे की सांस से जुड़ी होती है।

हीमोग्लोबिन ठीक रहेगा, तभी ऑक्सीजन पहुंचेगी

ऑक्सीजन खून में हीमोग्लोबिन के सहारे चलती है। अगर मां को एनीमिया है तो बच्चा ऑक्सीजन की कमी झेल सकता है। लैंसेट और बीएमजे में प्रकाशित प्रेग्नेंसी स्टडीज़ बताती हैं कि गर्भावस्था में कम हीमोग्लोबिन से फीटल ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन और प्रीटर्म डिलीवरी का खतरा बढ़ता है। इसलिए आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी12 की नियमित पूर्ति बेहद जरूरी है। ये सिर्फ दवा से नहीं बल्कि भोजन से भी मिलने चाहिए ।


सांस की गुणवत्ता भी उतनी ही जरूरी है

धुआं, प्रदूषण और बंद जगहों में रहना मां के खून में ऑक्सीजन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। रिसर्च बताती है कि एयर पॉल्यूशन के संपर्क में रहने वाली गर्भवती महिलाओं में प्लेसेंटल ब्लड फ्लो कम हो सकता है। इसलिए साफ हवा,खुली जगह पर हल्की सैर और गहरी सांस लेने के अभ्यास बच्चे तक ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करते हैं।


धूम्रपान और पैसिव स्मोक करते हैं ऑक्सीजन चोर का काम

सिगरेट का निकोटिन रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर देता है। अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियंस एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स की रिपोर्ट साफ कहती है कि स्मोकिंग से प्लेसेंटा तक ऑक्सीजन की आपूर्ति घट जाती है। यहां तक कि दूसरों के धुएं में रहना भी बच्चे के लिए उतना ही खतरनाक है।


प्रेग्नेंसी में ब्लड प्रेशर और शुगर का नियंत्रण क्यों जरूरी है?

हाई ब्लड प्रेशर में प्लेसेंटा की नसों पर दबाव बढ़ता है, जिससे बच्चे तक ऑक्सीजन कम पहुंच सकती है। वहीं अनियंत्रित डायबिटीज प्लेसेंटल फंक्शन को कमजोर करती है। रिसर्च यह भी दिखाती है कि प्रेग्नेंसी में अनकंट्रोल्ड बीपी और शुगर से फीटल हाइपोक्सिया यानी गर्भ में ऑक्सीजन की कमी का खतरा बढ़ता है।


गर्भावस्था में पीठ के बल लेटने को क्यों मना करते हैं?

गर्भावस्था के अंतिम महीनों में पीठ के बल लेटना मां की बड़ी रक्त नलिका पर दबाव डाल सकता है, जिससे गर्भनाल में ब्लड फ्लो घटता है। कई ऑब्स्टेट्रिक स्टडीज़ के अनुसार, बाईं करवट सोना प्लेसेंटल ऑक्सीजन सप्लाई के लिए बेहतर माना जाता है। नींद की कमी और बार-बार जागना भी शरीर के ऑक्सीजन उपयोग को प्रभावित करता है।


पानी और पोषण का ऑक्सिजन से संबंध

डिहाइड्रेशन से खून गाढ़ा होता है, जिससे ऑक्सीजन का प्रवाह धीमा पड़ता है। पर्याप्त पानी, प्रोटीन, हरी सब्जियां और ओमेगा-3 फैटी एसिड प्लेसेंटा के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं। नेचर रिव्यूज़ में प्रकाशित अध्ययनों में यह स्पष्ट किया गया है कि पोषण की कमी सीधे प्लेसेंटल एफिशिएंसी घटाती है।


प्रेग्नेंसी में तनाव से बचना

लगातार तनाव से कोर्टिसोल बढ़ता है, जो रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है। प्रेग्नेंसी में अधिक तनाव को कम ऑक्सीजन सप्लाई और कम जन्म वजन से जोड़ा गया है। ध्यान, संगीत और भावनात्मक सहारा यहां दवा जितना जरूरी हो जाता है।

जब गर्भ में बच्चे को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिलती तो इसे क्या कहते हैं?

मेडिकल भाषा में इसे फीटल हाइपोक्सिया या इन्ट्रायूटेरिन हाइपोक्सिया कहा जाता है। इसका मतलब है कि प्लेसेंटा के के माध्यम से बच्चे तक पहुंचने वाली ऑक्सीजन उसकी जरूरत से कम हो गई है। रिसर्च बताती है कि ऑक्सीजन की कमी जितनी देर तक रहती है, नुकसान उतना गहरा हो सकता है।


प्रेग्नेंसी में ऑक्सिजन की कमी का क्या असर होता है?

ऑक्सीजन की कमी का पहला संकेत अक्सर यह होता है कि बच्चा अपनी उम्र के हिसाब से छोटा रहने लगता है। इसे फीटल ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन (FGR) कहा जाता है। बीएमजे और लैंसेट की स्टडीज़ बताती हैं कि लगातार कम ऑक्सीजन मिलने से कोशिकाओं को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिलती, जिससे अंगों का विकास धीमा पड़ जाता है। इसका दिमाग पर पड़ने वाला असर सबसे संवेदनशील होता है।

क्योंकि मस्तिष्क ऑक्सीजन पर सबसे अधिक निर्भर रहने वाला अंग है। अगर लंबे समय तक ऑक्सीजन कम मिले तो दिमाग की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। न्यूरोसाइंस रिसर्च के अनुसार, गंभीर मामलों में इससे

– सीखने में कठिनाई यानी लर्निंग से जुड़ी समस्याएं

याददाश्त की कमजोरी

– या आगे चलकर सेरेब्रल पाल्सी जैसी स्थिति का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि हर केस इतना गंभीर नहीं होता। लेकिन जोखिम वास्तव में बन जाता है।


कुछ बच्चों का जन्म तय समय से पहले क्यों हो जाता है?

जब गर्भ में वातावरण बच्चे के लिए सुरक्षित नहीं रह जाता तो शरीर कई बार समय से पहले प्रसव की दिशा में बढ़ जाता है। स्टडीज़ दिखाती हैं कि फीटल हाइपोक्सिया प्रीटर्म बर्थ का एक बड़ा कारण है। ऐसे बच्चों के फेफड़े और इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होते। इसलिए जन्म के समय से ही सांस से जुड़ी दिक्कतें होने का खतरा बढ़ जाता है। गर्भ में ऑक्सिजन की कमी झेल चुके बच्चों में जन्म के तुरंत बाद

– सांस लेने में परेशानी

– कम रोना

– या नीलापन दिखाई दे सकता है।

इसे बर्थ एस्फिक्सिया कहा जाता है और ऐसे मामलों में नवजात को तुरंत मेडिकल सपोर्ट की जरूरत पड़ती है।


गर्भ का वातावरण और भविष्य की चुनौतियां

अब रिसर्च यह भी दिखा रही है कि गर्भ में ऑक्सीजन की कमी सिर्फ बचपन तक सीमित नहीं रहती। जर्नल ऑफ डेवलपमेंटल ओरिजिन्स ऑफ हेल्थ एंड डिजीज के अनुसार, जिन बच्चों ने गर्भ के अंदर ऑक्सिजन की कमी का सामना किया हो ऐसे बच्चों में बड़े होकर

– हाई ब्लड प्रेशर

– टाइप 2 डायबिटीज

– और हृदय रोग का जोखिम बढ़ सकता है।

इसे फीटल प्रोग्रामिंग कहा जाता है, जहां गर्भ का वातावरण भविष्य की सेहत तय करता है।


गंभीर और लंबे मामलों में गर्भपात या स्टिलबर्थ का खतरा

अगर ऑक्सीजन सप्लाई बहुत ज्यादा और लंबे समय तक बाधित रहे तो यह गर्भ के लिए जानलेवा भी हो सकता है। हालांकि आधुनिक जांच और मॉनिटरिंग से ऐसे मामलों को पहले ही पहचान लिया जाता है। लेकिन जोखिम को अनदेखा नहीं किया जा सकता। अच्छी बात यह है कि आज मेडिकल साइंस के पास

– अल्ट्रासाउंड,

– डॉप्लर स्टडी,

– एनएसटी जैसे टेस्ट मौजूद हैं,

जो समय रहते ऑक्सीजन की कमी पकड़ लेते हैं। सही समय पर इलाज और निगरानी से अधिकांश मामलों में गंभीर नुकसान को रोका जा सकता है।

क्या गर्भ में ऑक्सीजन की कमी से मिर्गी हो सकती है?

हां, हो सकती है। लेकिन सीधे, हर केस में नहीं। मेडिकल साइंस में यह माना जाता है कि गर्भ में लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी से अगर बच्चे के मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है तो आगे चलकर वही क्षति एपिलेप्सी का आधार बन सकती है। न्यूरोलॉजी जर्नल्स में प्रकाशित स्टडीज़ बताती हैं कि फीटल हाइपोक्सिया और बर्थ एस्फिक्सिया से गुजरे बच्चों में बचपन या किशोरावस्था में मिर्गी के दौरे, फोकल सीज़र्स या दवाओं पर निर्भर एपिलेप्सी का जोखिम सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक होता है।

खास बात यह है कि गर्भ में ऑक्सिजन की कमी का किस बच्चे पर कैसा असर होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे के दिमाग का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है। अगर ऑक्सीजन की कमी का असर...

– हिप्पोकैम्पस

– सेरेब्रल कॉर्टेक्स

– या बेसल गैन्ग्लिया

पर पड़ता है तो वहां के क्षतिग्रस्त न्यूरॉन्स आगे चलकर असामान्य इलेक्ट्रिकल डिस्चार्ज पैदा कर सकते हैं। यही एपिलेप्सी की जड़ है।


हर ऑक्सीजन की कमी एपिलेप्सी नहीं होती

यह बात जानना बहुत जरूरी है कि हर केस में गर्भावस्था के दौरान ऑक्सीजन की कमी होना मिर्गी का कारण नहीं बनता। अगर ऑक्सीजन की कमी

– हल्की थी

– कम समय की थी

– और समय रहते पहचान ली गई

तो मस्तिष्क खुद को काफी हद तक रिकवर कर लेता है। इसीलिए हर ऐसा बच्चा एपिलेप्सी का मरीज बने, यह जरूरी नहीं। द लैंसेट न्यूरोलॉजी और पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी जर्नल्स में प्रकाशित डेटा बताता है कि गंभीर और लंबे समय तक चले इन्ट्रायूटेरिन हाइपोक्सिया वाले बच्चों में एपिलेप्सी का जोखिम 2 से 4 गुना तक बढ़ सकता है, खासकर अगर जन्म के समय एस्फिक्सिया हुआ हो।

यही कारण है कि प्रेग्नेंसी मॉनिटरिंग इतनी अहम है। डॉप्लर, एनएसटी और फॉलोअप केवल डिलीवरी के लिए नहीं होते बल्कि इसलिए होते हैं ताकि भविष्य में होने वाली न्यूरोलॉजिकल समस्याओं जैसे एपिलेप्सी को रोका जा सके।

डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।


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