ये 5 गलतफहमियां कैंसर को जानलेवा बना देती हैं, इनसे बचना जरूरी है!
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कैंसर से बचने के लिए क्या करें?

ये 5 गलतफहमियां कैंसर को जानलेवा बना देती हैं, इनसे बचना जरूरी है!

भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ इलाज की सुविधाएं बढ़ाना ही नहीं बल्कि गलत जानकारी और डर को दूर करना भी जरूरी है...


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World Cancer Day: कैंसर के बढ़ते मामलों के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि 30 से 50 प्रतिशत तक कैंसर के मामले रोके जा सकते हैं। यदि बीमारी शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए। क्योंकि इस बीमारी के बढ़ने के कई अन्य कारणों के साथ ही इसका देर से डायग्नोसिस होना आज भी एक बड़ी चुनौती है, खासकर भारत जैसे निम्न और मध्यम आय वाले देशों में।

कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है। आज कैंसर दिवस के अवसर पर हम आपके लिए वे 5 मुख्य कारण लेकर आए हैं, जिनके चलते यह बीमारी जानलेव बन जाती है! इनमें शामिल हैं, कैंसर से जुड़ी भ्रांतियां और गलतफहमियां...

मिथ 1: कैंसर मतलब मौत होना पक्का है!

बहुत से लोग सोचते हैं कि कैंसर हो गया है तो इसका मतलब मौत है! यह बात पूरी तरह सच नहीं है। आज के समय में उपचार और तकनीक की वजह से कई तरह के कैंसर, खासकर अगर समय पर पता चल जाएं तो इन्हें पूरा ठीक किया जा सकता है। या लंबी अवधि तक कंट्रोल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए शुरुआती स्टेज के ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, कोलोन और प्रोस्टेट कैंसर की सर्वाइवल रेट बहुत बेहतर होती है।



मिथ 2: जिनके परिवार में किसी को कैंसर हुआ हो, उन्हें ही कैंसर होता है!

यह सोच भी सही नहीं है कि केवल उन्हें ही कैंसर होता है, जिनके परिवार में पहले किसी को यह बीमारी रही हो। कैंसर केवल जीन की वजह से नहीं होता बल्कि इस बीमारी के होने के पीछे कई और कारण भी हो सकते हैं। जैसे...

जीवनशैली

खान-पान

धूम्रपान

मोटापा

शराब

प्रदूषण

और साथ ही इसमें उम्र और क्षेत्र का भी बड़ा रोल होता है। इसका मतलब यह है कि हर उम्र और हर पृष्ठभूमि के लोगों को सावधान रहना चाहिए।



मिथ 3: कैंसर के स्क्रीनिंग टेस्ट दर्दनाक, महंगे या शर्मनाक होते हैं!

कई लोगों को लगता है कि कैंसर के स्क्रीनिंग टेस्ट कठिन, महंगे या शर्मनाक होंगे!इसलिए वे स्क्रीनिंग यानी कैंसर की प्रारंभिक जांच कराने से बचते हैं। लेकिन आधुनिक स्क्रीनिंग में मैमोग्राम, पैप स्मीअर, कोलोनोस्कोपी और स्किन चेक, काफी कम दर्द, सस्ते एवं आसान तरीके हैं। और ये कैंसर होने के शुरुआती चेतावनी संकेत पकड़ने में मदद करते हैं। समय पर जांच का मतलब इलाज पहले शुरू होना और परिणाम बेहतर होना होता है।



मिथ 4: अगर कोई लक्षण नहीं है तो कैंसर नहीं है!

कैंसर कई बार शुरुआत में बिलकुल सूत्रहीन (asymptomatic) होता है। इसका मतलब यह है कि कोई दर्द या लक्षण न दिखने पर भी कैंसर हो सकता है। यही कारण है कि डॉक्टर नियमित जांच कराने की सलाह देते हैं। क्योंकि लक्षणों से पहले ही रोग पकड़ा जाना इलाज को कहीं अधिक प्रभावी बनाता है।


मिथ 5: कैंसर के बारे में बात नहीं करनी चाहिए?

कई समुदायों में कैंसर को टैबू माना जाता है। यानी लोग इसे खुलकर शेयर नहीं करते, इसका नाम भी नहीं लेना चाहते, बीमारी पता चलने पर इसे छिपा लेते हैं या मदद लेने में देर करते हैं। यही सांस्कृतिक दबाव कई बार समय से इलाज शुरू न होने का कारण बनता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि कैंसर के बारे में खुलकर बात करना, जागरूकता फैलाना और सही जानकारी देना ही रोग को तेजी से पहचानने और बेहतर इलाज पाने में सहायक है।

कुल मिलाकर देखें तो यह सच है कि कैंसर आज भी दुनियाभर में मौत के प्रमुख कारणों में से एक बना हुआ है। लेकिन विशेषज्ञ एक बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि इस बीमारी की समय पर पहचान होने से मरीज की जान बचाई जा सकती है।


डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।


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