बच जाएंगी आपकी किडनी, शुगर होने पर करा लें आंखों की जांच
कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के अन्य अंगों को अपनी चपेट में लेकर दूसरी घातक बीमारियों का कारण बनने लगती हैं। डायबिटीज भी ऐसी ही समस्या है...
अक्सर हम शरीर को अलग अलग हिस्सों में बांटकर सोचते हैं आंख अलग, किडनी अलग और डायबिटीज को सिर्फ “शुगर” तक सीमित कर देते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि शरीर में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो दिखते नहीं पर जब टूटते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। आंख, डायबिटीज और किडनी का रिश्ता भी ऐसा ही एक साइलेंट कनेक्शन है...
नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. प्राजित मजूमदार (यशोदा मेडिसिटी) के अनुसार, किडनी की बीमारी को यूं ही Silent Killer नहीं कहा जाता। लगभग 70 से 80 प्रतिशत किडनी डैमेज तब हो चुका होता है, जब लक्षण दिखाई देने शुरू होते हैं। यानी जब पैरों में सूजन, पेशाब में झाग या थकान महसूस हो रही होती है, तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है। यहीं से कहानी में एंट्री होती है डायबिटीज की।
डायबिटीज केवल ब्लड शुगर का मामला नहीं है। यह बीमारी धीरे धीरे शरीर की सबसे नाजुक रक्त नलिकाओं को नुकसान पहुंचाती है और ये नलिकाएं सबसे पहले आंखों के पर्दे (रेटिना) और किडनी के फिल्टर सिस्टम में होती हैं। यही वजह है कि मेडिकल गाइडलाइंस, जैसे American Diabetes Association और KDIGO Guidelines, साफ कहती हैं कि डायबिटीज का पता चलते ही तीन जांच अनिवार्य हैं आंखों का फंडस एग्ज़ामिनेशन, यूरिन में प्रोटीन की जांच और KFT (सीरम क्रिएटिनिन)।
डॉ. मजूमदार बताते हैं कि कई बार किडनी में दिक्कत आने से पहले आंखों में डायबिटिक रेटिनोपैथी के संकेत दिखने लगते हैं। यानी आंखें किडनी के खतरे की पहली चेतावनी बन जाती हैं। अगर रेटिना में शुगर से जुड़ा नुकसान दिखता है, तो यह संकेत है कि आने वाले वर्षों में किडनी भी जोखिम में है।
यहीं पर एक आम लेकिन खतरनाक भ्रम टूटता है कि “जब तक लक्षण नहीं हैं, तब तक बीमारी नहीं है।” किडनी डिजीज शुरुआती दौर में बिल्कुल चुप रहती है। न दर्द, न जलन, न परेशानी। इसी वजह से जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या परिवार में किडनी रोग का इतिहास है, उनके लिए साल में कम से कम एक बार यूरिन और KFT टेस्ट केवल सलाह नहीं, जरूरत है।
किडनी खराब हो जाए तो क्या वह ठीक हो सकती है?
इसका जवाब बीमारी के प्रकार पर निर्भर करता है। अगर किडनी को हुआ नुकसान एक्यूट किडनी इंजरी है, जैसे इंफेक्शन, डिहाइड्रेशन या एक्सीडेंट के बाद, तो सही समय पर इलाज से किडनी पूरी तरह रिकवर कर सकती है। लेकिन अगर समस्या तीन महीने से ज्यादा पुरानी हो जाए, तो वह Chronic Kidney Disease (CKD) बन जाती है, जिसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, केवल उसकी रफ्तार को धीमा किया जा सकता है। यही वजह है कि डायबिटीज और हाई बीपी वाले मरीजों में किडनी की जांच को टालना, भविष्य में डायलिसिस की तरफ एक खामोश कदम हो सकता है।
डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी के इस त्रिकोण में एक और अदृश्य दुश्मन है दर्द निवारक दवाएं। डॉ. मजूमदार साफ चेतावनी देते हैं कि पैरासिटामॉल और अल्ट्रासेट को छोड़कर ज्यादातर ओवर द काउंटर पेनकिलर्स लंबे समय में किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह नुकसान धीरे होता है, इसलिए अक्सर पकड़ा नहीं जाता।
किडनी की सेहत और आपकी लाइफस्टाइल
आज की फास्ट ट्रैक जिंदगी, लंबे समय तक बैठकर काम करना, पैकेज्ड फूड, ज्यादा नमक, मीठा और नींद की कमी ये सब मिलकर डायबिटीज और हाई बीपी को जन्म देते हैं, और वहीं से किडनी का सफर शुरू होता है। रिसर्च बताती है कि एक चम्मच (करीब 5 ग्राम) से ज्यादा नमक रोजाना लेना किडनी और बीपी दोनों के लिए नुकसानदेह है।
डायबिटीज से किडनी को बचाने का सबसे कारगर तरीका कोई जटिल इलाज नहीं, बल्कि वही बेसिक्स हैं शुगर कंट्रोल, ब्लड प्रेशर कंट्रोल, रोज कम से कम 20 मिनट की तेज चाल, पर्याप्त नींद और समय समय पर जांच। दिलचस्प बात यह है कि आज किडनी की बीमारी सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। डॉक्टर बताते हैं कि यंग एज ग्रुप में भी डायलिसिस और ट्रांसप्लांट के मामले बढ़ रहे हैं, खासकर उन युवाओं में जिनकी डायबिटीज कम उम्र में शुरू हो गई थी और सालों तक अनकंट्रोल्ड रही। यानी अगर आज 25 से 30 की उम्र में डायबिटीज है और शुगर कंट्रोल नहीं है, तो 10 से 15 साल बाद किडनी खतरे में आ सकती है। यह कोई अंदाजा नहीं, मेडिकल रियलिटी है।
डायबिटीज को सिर्फ शुगर मीटर से मत आंकिए, आंखों और किडनी की जांच से समझिए। क्योंकि जब आंखें संकेत देने लगती हैं, तब किडनी अभी भी बचाई जा सकती है, बशर्ते हम समय रहते सुन लें।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

