किडनी अब नहीं होगी खराब, जान लीजिए क्या नहीं करना है और क्या करना है?
अगर शुगर को ठीक से नियंत्रित न किया जाए तो पंद्रह से बीस साल में किडनी स्थायी रूप से खराब हो सकती है। इसी तरह मोटापा भी किडनी के लिए खतरा है...

किडनी से जुड़ी समस्याओं की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अक्सर बिना शोर किए बढ़ती रहती हैं। अधिकांश लोगों को तब तक पता ही नहीं चलता कि उनकी किडनी ठीक से काम नहीं कर रही जब तक स्थिति काफी आगे न बढ़ जाए। आमतौर पर लोग यूरिन कम होने, बार बार पेशाब आने या पेशाब में झाग दिखने जैसे लक्षणों से किडनी की बीमारी को जोड़ते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि किडनी की खराबी इसके बहुत पहले ही शरीर में संकेत देने लगती है जिसे हम पहचान नहीं पाते।
दरअसल किडनी सिर्फ पेशाब बनाने वाला अंग नहीं है। यह शरीर से विषैले तत्व निकालती है, अतिरिक्त पानी बाहर करती है, रक्तचाप को संतुलित रखती है, खून बनाने में मदद करती है और हड्डियों की सेहत तक को नियंत्रित करती है। यही कारण है कि जब किडनी प्रभावित होती है तो उसका असर केवल यूरिन तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे शरीर में दिखाई देने लगता है।
थकान से लेकर सांस फूलने तक ये लक्षण क्यों आते हैं
किडनी की गड़बड़ी का एक शुरुआती संकेत है लगातार कमजोरी। बिना ज्यादा काम किए भी थक जाना, काम में मन न लगना या सामान्य गतिविधियों में ऊर्जा की कमी महसूस होना इस ओर इशारा कर सकता है कि शरीर से अपशिष्ट पदार्थ सही ढंग से बाहर नहीं निकल पा रहे। इसके साथ ही कुछ लोगों में हड्डियों और जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है क्योंकि किडनी कैल्शियम और फॉस्फेट संतुलन को भी नियंत्रित करती है।
जब किडनी अतिरिक्त पानी और नमक बाहर नहीं निकाल पाती तो उसका असर पैरों में सूजन, चेहरे पर फुलाव और कभी कभी सांस फूलने के रूप में दिखता है। यह स्थिति इसलिए भी खतरनाक होती है क्योंकि कई लोग इसे वजन बढ़ना या उम्र का असर मानकर अनदेखा कर देते हैं।
रक्तचाप, खून की कमी और उल्टियां छुपे हुए संकेत
किडनी और रक्तचाप का रिश्ता दो तरफा होता है। किडनी खराब हो तो बीपी अनियंत्रित होने लगता है और लंबे समय तक हाई बीपी रहने से किडनी को नुकसान पहुंचता है। अचानक बीपी बढ़ जाना या पहले से नियंत्रित बीपी का दवाओं के बावजूद काबू में न आना किडनी जांच का संकेत हो सकता है।
इसी तरह बार बार खून की कमी होना भी किडनी की बीमारी का संकेत है क्योंकि किडनी ही वह हार्मोन बनाती है जो बोन मैरो को खून बनाने के लिए प्रेरित करता है। लंबे समय तक किडनी खराब रहने पर उल्टियां, भूख न लगना, वजन कम होना और मतली जैसे लक्षण उभरने लगते हैं। ये सभी संकेत बताते हैं कि शरीर में यूरिया और क्रिएटनिन जैसे अपशिष्ट जमा हो रहे हैं।
किडनी की जांच कब और क्यों जरूरी है
किडनी की बीमारी की पहचान का सबसे भरोसेमंद तरीका है समय पर जांच। प्रिवेंटिव हेल्थ के सिद्धांत यही कहते हैं कि बीमारी होने के बाद इलाज करने से बेहतर है उसे पहले ही पकड़ लिया जाए। जिन लोगों को कोई पुरानी बीमारी नहीं है उन्हें भी साल में कम से कम एक बार ब्लड और यूरिन की जांच करानी चाहिए।
डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है। ऐसे लोगों को हर छह महीने में ब्लड और यूरिन टेस्ट कराना चाहिए क्योंकि यही वे स्थितियां हैं जो सबसे तेजी से किडनी को नुकसान पहुंचाती हैं।
क्रिएटनिन और ई जी एफ आर किडनी की भाषा
किडनी की कार्यक्षमता को मापने का सबसे सरल तरीका है सीरम क्रिएटनिन। यह एक ऐसा पदार्थ है जो मांसपेशियों के सामान्य टूटने से बनता है और किडनी के जरिए बाहर निकलता है। जब किडनी ठीक से काम नहीं करती तो क्रिएटनिन खून में बढ़ने लगता है। सामान्य तौर पर 1.2 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम क्रिएटनिन को ठीक माना जाता है हालांकि यह लैब के अनुसार थोड़ा बदल सकता है।
इसी क्रिएटनिन के आधार पर ई जी एफ आर यानी एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट निकाला जाता है जो यह बताता है कि किडनी अपनी क्षमता का कितना प्रतिशत काम कर रही है। चालीस साल की उम्र तक ई जी एफ आर 90 से ऊपर होना सामान्य माना जाता है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसमें धीरे धीरे कमी आना स्वाभाविक है।
यूरिया और क्रिएटनिन बढ़ने पर शरीर क्या संकेत देता है
जब यूरिया और क्रिएटनिन बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं तो शरीर में यूरेमिक लक्षण दिखने लगते हैं। इनमें तेज मतली, बार बार उल्टियां, पेट दर्द, चक्कर आना, सिरदर्द और कभी कभी दौरे तक शामिल हैं। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि क्रिएटनिन बढ़ने का कारण हमेशा किडनी की बीमारी ही नहीं होता। तेज बुखार, भारी व्यायाम या मांसपेशियों के टूटने से भी अस्थायी रूप से यह बढ़ सकता है। इसलिए रिपोर्ट को हमेशा लक्षणों और अवधि के साथ जोड़कर देखना चाहिए।
किडनी की बीमारी एक्यूट या क्रॉनिक
किडनी की समस्याएं समय के आधार पर अलग अलग होती हैं। अगर सात दिनों के भीतर किडनी की कार्यक्षमता अचानक गिर जाए तो उसे एक्यूट किडनी इंजरी कहा जाता है। सात दिन से तीन महीने के बीच की समस्या को एक्यूट किडनी डिजीज और तीन महीने से अधिक समय तक बनी रहने वाली स्थिति को क्रॉनिक किडनी डिजीज कहा जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि कई बार क्रॉनिक किडनी डिजीज वाले मरीजों को लंबे समय तक कोई लक्षण नहीं होते क्योंकि शरीर धीरे धीरे इस स्थिति के साथ तालमेल बैठा लेता है। लक्षण तब आते हैं जब शरीर की सहनशक्ति की सीमा पार हो जाती है।
डायबिटीज, मोटापा और किडनी एक खतरनाक संबंध
डायबिटीज किडनी की सबसे बड़ी दुश्मन मानी जाती है। शोध बताते हैं कि शुगर होने के पांच साल के भीतर ही किडनी पर असर शुरू हो सकता है। शुरुआती वर्षों में पेशाब में प्रोटीन का रिसाव दिखाई देता है जो समय के साथ बढ़ता जाता है। अगर शुगर को ठीक से नियंत्रित न किया जाए तो पंद्रह से बीस साल में किडनी स्थायी रूप से खराब हो सकती है।
इसी तरह मोटापा भी किडनी के लिए खतरा है। मोटापे से शरीर में लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन की स्थिति बनती है जो किडनी के फिल्टर को नुकसान पहुंचाती है।
बच्चों में भी हो सकती है किडनी की समस्या
किडनी की बीमारी केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है। बच्चों में भी पेशाब में प्रोटीन आना, शरीर में सूजन या बार बार यूरिन इंफेक्शन होना किडनी समस्या का संकेत हो सकता है। कुछ मामलों में यह जन्मजात विकार होते हैं। अच्छी बात यह है कि अगर इनकी पहचान समय पर हो जाए तो अधिकांश स्थितियों का सफल इलाज संभव है।
जीवनशैली ही किडनी की असली दवा
किडनी को स्वस्थ रखने का सबसे प्रभावी तरीका दवाओं से पहले जीवनशैली में बदलाव है। रोजाना कम से कम तीस मिनट की तेज चाल से चलना, शरीर के कुल वजन का थोड़ा सा भी कम होना, नमक का सीमित सेवन और धूम्रपान तथा शराब से दूरी ये छोटे कदम किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं।
आज जब प्रदूषण, तनाव और असंतुलित जीवनशैली आम हो चुकी है तब किडनी की देखभाल सिर्फ मेडिकल जरूरत नहीं बल्कि जीवन की जरूरत बन चुकी है। किडनी दर्द नहीं करती लेकिन जब संकेत देती है तब बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए सबसे समझदारी भरा कदम है उसे बोलने से पहले सुन लेना।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

