
दिल में है अरमान और आंखों में पानी, भारत की समर्थ महिला तेरी यही कहानी
ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी ने दूसरे तलाक के बाद कहा 'स्ट्रॉन्ग हेडेड महिलाओं को स्वीकारने में समाज को समस्या होती है।' स्ट्रॉन्ग हेडेड- अपने विचारों पर अडिग महिलाएं
Womens Day: हिंदी जगत के महान कवि मैथिली शरण गुप्त जी के काव्य संग्रह 'भारत-भारती' की एक बहुत प्रसिद्ध कविता है, जिसका शीर्षक है 'नारी'। यह काव्य संग्रह सन् 1912 में प्रकाशित हुआ। यहां हम इस रचना का प्रकाशन वर्ष इसलिए बता रहे हैं ताकि आप समझ सकें कि उस जमाने में महिलाओं की जिस पीड़ा का विवरण गुप्त जी ने कविता के माध्यम से दिया, ढेरों उतार-चढ़ाव और बदलावों के बाद भी उस नारी के नयनों का नीर अब तक निरंतर बह रहा है! कविता की मुख्य पंक्ति इस प्रकार है...
“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आंचल में है दूध और आंखों में पानी।”
यह पंक्ति भारतीय समाज में स्त्री के त्याग, ममता और पीड़ा को बहुत गहराई से व्यक्त करती है। हालांकि गुप्त जी की कविता में वर्णित अबला आज के समय में आर्थिक रूप से सबला बन रही है और आंचल के दूध का दायित्व भी पूरी तरह निभा रही है। लेकिन आंखों का पानी है कि सूखने का नाम ही नहीं ले रहा। आखिर क्यों इक्कीसवीं सदी की सबल नारी के नयनों से नीर बहना बंद नहीं हो पा रहा है? और विश्व स्तर पर तीसरी अर्थव्यवस्था बनने को तत्पर हमारे देश का समाज आखिर कहां मात खा रहा है कि स्पष्ट लक्ष्य के साथ कर्मठता से भरी इसकी आधी आबादी अपने भावनात्मक दुखों का समाधान खोजने सायकाइट्रिस्ट और काउंसलर्स के पास पहुंच रही है...
मध्यम वर्ग, उच्च मध्यम वर्ग, व्यवसायिक जगत हो या अभिनय की दुनिया, महिलाओं का दबदबा भले ही हर क्षेत्र में बढ़ा हो लेकिन जैसे-जैसे समाज के अलग-अलग स्तर पर इनकी भूमिका बदली है, इनकी चुनौतियों का स्तर भी बदल गया। महिलाएं मनोवैज्ञानिकों के पास रिश्तों से जुड़ी अलग तरह की समस्याएं लेकर पहुंच रही हैं। इनमें जीवनसाथी के साथ तकरार की वजहों में पैसे का प्रबंधन तेजी से उभरता मुद्दा है। काउंसलिंग केसेज में वित्तीय प्रबंधन यानी मनी मैनेजमेंट और आर्थिक नियंत्रण यानी फाइनेंशियल कंट्रोल, रिश्तों में तनाव का बड़ा कारण बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अब विवाद सिर्फ खर्च पर नहीं बल्कि कमाने, बचाने, निवेश करने और आर्थिक स्वतंत्रता पर भी है। इस प्रकार के मामलों में जहां पति नियंत्रणकारी स्वभाव का है और पत्नी शांत स्वभाव की, वहां पत्नी स्ट्रेस और एंग्जाइटी की शिकायतों के साथ क्लिनिक पहुंच रही हैं और जहां पत्नी प्रभुत्वकारी स्वभाव यानी डोमिनेटिंग नेचर की है, वो लोग कपल काउंसलिंग के लिए आ रहे हैं।
कनाडा में हुए 'प्यार और पैसा' पर सर्वेक्षण के परिणाम
कनाडा में हुए “लव ऐंड मनी” सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक असहमति सीधे भावनात्मक स्वास्थ्य (एंग्जाइटी, डिप्रेशन, इनसॉम्निया) को प्रभावित कर सकती है। कनाडा की एक गैर-लाभकारी क्रेडिट काउंसलिंग संस्था मनी मेंटॉर्स ने यह सर्वे किया। इस सर्वेक्षण का नाम “लव ऐंड मनी सर्वे 2025” है। इसमें विवाहित और प्रेमी जोड़ों ने वित्तीय तनाव पर अपने किस तरह के अनुभव साझा किए, आंकड़ों से समझें...
लगभग 47% लोगों ने कहा कि उन्होंने अपने पार्टनर के साथ पैसे को लेकर बहस/मतभेद अनुभव किए हैं।
इन लोगों में से 66% बताते हैं कि वित्तीय बहस उन्हें अधिक एंग्जाइटी (चिंता) या डिप्रेशन जैसा महसूस कराती है।
और 53% का कहना है कि ऐसे झगड़े के बाद उनकी नींद प्रभावित होती है।
लगभग 11% का कहना है कि पैसे के तनाव ने उन्हें अलगाव (सेपरेशन) या संबंध विच्छेद (ब्रेकअप) पर विचार करने तक मजबूर किया।
अमेरिका में कितने प्रतिशत जोड़ों में पैसों से जुड़ा विवाद होता है?
ग्लोबल रिसर्च एजेंसी आईपीएसओएस (Ipsos) द्वारा अमेरिकी बैंक, बैंक ऑफ मॉन्ट्रियल (BMO) के लिए किए गए 'ऑल-अमेरिका पोल' सर्वेक्षण में पति-पत्नी के बीच पैसों से जुड़े विवाद पर कुछ इस तरह की स्थितियां सामने आईं...
ऑल-अमेरिका पोल में पाया गया कि लगभग 34% अमेरिकन जोड़े मानते हैं कि पैसा ही उनके रिश्ते में सबसे बड़ा विवाद का स्रोत है।
यह प्रतिशत युवा समूह, जिसमें 18 से 24 साल की उम्र के जोड़े शामिल थे, उनमें और भी अधिक लगभग 47% तक पहुंचता है।
वहीं 37% लोगों को लगता है कि उनके पार्टनर अनावश्यक खर्च करते हैं। जबकि 36% लोग अपनी मौद्रिक स्थिति के बारे में सच्चाई नहीं बताते।
ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि पैसे से जुड़े मतभेद केवल एक वित्तीय मुद्दा नहीं हैं। बल्कि ये रिश्ते में विश्वास और पारदर्शिता के साथ भी जुड़े हैं।
एक साल में कितनी बार झगड़ा ?
टॉकर रिसर्च (Talker Research) द्वारा वित्तीय ऐप वाइस (Wise) के लिए के लिए किए गए शोध में जोड़ों के बीच पैसे को लेकर होने वाले झगड़े से जुड़ी जो बातें सामने आईं उन्हें जानकर आपको हैरानी हो सकती है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका जैसे देश में जोड़ों के बीच पैसे के मुद्दे पर झगड़े की वार्षिक आवृत्ति 58 प्रतिशत है। अर्थात जोड़े एक साल में लगभग 58 बार पैसों को लेकर बहस करते हैं, जो कि सप्ताह में करीब एक बार के बराबर है। वहीं, लॉन्ग-डिस्टेंस रिश्तों में यह संख्या और बढ़कर 72 बार प्रति वर्ष हो जाती है। हालांकि जिन कपल के बीच रिश्ते बहुत सामान्य होते हैं, उनमें भी आर्थिक विषयों पर झगड़ों का यह प्रतिशत लगभग 53 बार प्रतिवर्ष है। यह आंकड़ा दिखाता है कि वित्तीय संवाद और झगड़े एक नियमित और आम अनुभव बन चुके हैं, खासकर युवा और आधुनिक जोड़ों में।
वित्तीय झगड़ों का मानसिक असर क्या होता है?
जब हम सिर्फ विवाद नहीं बल्कि उसके परिणाम को देखें तो 66% लोग बताते हैं कि वित्तीय झगड़े चिंता/डिप्रेशन जैसा महसूस कराते हैं। वहीं 53% लोग कहते हैं कि ऐसे झगड़े नींद को प्रभावित करते हैं। और ये आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि पैसे के विवाद सिर्फ झगड़ा नहीं हैं बल्कि वे मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर डालते हैं। इस बारे में बात करते हुए मैक्स सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल पटपड़गंज (दिल्ली) के सीनियर सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर राजेश कुमार कहते हैं 'मानसिक और भावनात्मक समस्याएं समाज की बदली परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती हैं। पिछले करीब दो दशक में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाओं की संख्या हमारे देश में तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ इनके सामने आने वाली वित्तीय उलझनें भी बढ़ी हैं। आर्थिक झगड़ों से परेशान महिला और पुरुष दोनों ही उपचार के लिए आ रहे हैं।
लेकिन महिला और पुरुष के स्वभाव में जो प्राकृतिक अंतर होता है, उसके अनुसार इनकी समस्याएं भी अलग होती हैं और इसके साथ ही इसमें पर्सनैलिटी का भी बड़ा रोल होता है। यानी व्यक्ति नियंत्रणकारी स्वभाव (डोमिनेटिंग नेचर ) का है या समर्पणशील स्वभाव (सबमिसिव नेचर) का। ये स्वभाव महिला और पुरुष दोनों में से किसी के भी हो सकते हैं और इनका उपचार इनकी स्थिति के अनुसार किया जाता है। लेकिन जब हम इन घटनाक्रमों को एक बड़े स्तर पर देखते हैं तो अपने अब तक के अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि जिन पति-पत्नी में महिला शांत स्वभाव की और पति नियंत्रणकारी स्वभाव का होता है, वहां पत्नी में एंग्जाइटी या माइल्ड डिप्रेशन के लक्षण अधिक देखने को मिलते हैं। जबकि इसके उलट जहां पत्नी नियंत्रणकारी स्वभाव की होती है, वहां लोग कपल काउंसलिंग को प्राथमिकता देते हैं। ये कोई फैक्ट नहीं है बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे के कारण इस तरह की स्थिति बनती है, जिसे गहराई से समझना आवश्यक है।'
डॉक्टर कुमार अपनी बात को विस्तार से समझाते हुए कहते हैं 'आज भी हमारे समाज में मानसिक और भावनात्मक सेहत के प्रति जागरूकता की कमी है। इसमें भी परिवार में महिलाओं की पसंद-नापसंद और इच्छाओं को अनदेखा किया जाना,आमतौर पर घरों में देखने को मिल जाता है। आज के समय में जब यह स्थिति आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला के साथ बनती है तो वह एक सीमा तक अपनी भावनाओं को दबाती है लेकिन फिर कड़े कदम उठाने की तरफ विचार करने लगती है। ऐसे में भावनात्मक उथल-पुथल होना सामान्य बात है। फिर कोई भी महिला अपना परिवार तोड़ने या पार्टनर से अलग होने का कदम उठाने से पहले, स्थितियों को सुधारने का हर संभव प्रयास करती है। इसी क्रम में कई अन्य समस्याओं के साथ वित्तीय नियंत्रण का मुद्दा भी महिलाओं को एंग्जाइटी जैसी समस्याओं की तरफ धकेलता है। लेकिन वहीं इसके उलट, जब पत्नी नियंत्रणकारी स्वभाव की होती है तो उसे झगड़ों की समाप्ति के लिए मनोवैज्ञानिक की मदद के लिए तैयार करना आसान होता है। इसलिए ऐसे कपल्स उन कपल्स की तुलना में अधिक संख्या में काउंसलिंग और मदद के लिए सामने आते हैं, जिनमें कोई महिला पीड़ित होती है। क्योंकि हमारे सामाजिक ढांचे में किसी महिला के लिए अपने पति को काउंसलिंग के लिए तैयार कर पाना आज भी एक बड़ी चुनौती होती है।'
आर्थिक दबाव पुरुष पर अधिक होता है
पति-पत्नी के बीच बढ़ते आर्थिक झगड़ों के संबंध में बात करते हुए माइंड सर्कल न्यूरोसायकाइट्री ऐंड ड्रग डिएडिक्शन क्लिनिक (दिल्ली) के संस्थापक, मनोवैज्ञानिक डॉक्टर गौरव गुप्ता कहते हैं 'घर-परिवार और हमारे सामाजिक ढांचे में आज भी पुरुषों पर आर्थिक दबाव महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक होता है। यह भी सही है कि पिछले 15 से 20 साल में पति-पत्नी के बीच आर्थिक विषयों से संबंधित झगड़ों में वृद्धि देखने को मिल रही है। इसके कई कारणों में एक कारण है महिलाओं में आर्थिक स्वतंत्रता का बढ़ता स्तर और कुछ पुरुषों का नियंत्रणकारी स्वभाव। हालांकि पैसे के नियंत्रण, निवेश और अन्य आर्थिक मुद्दों पर आज भी अधिकतर घरों में पुरुष ही अंतिम निर्णय लेते हैं। लेकिन यह सभी कपल्स के बीच तनाव का कारण नहीं बनता। जब हम पति-पत्नी के बीच आर्थिक विषयों पर झगड़ों की बात करते हैं तो हमें पहले यह देखना होता है कि हम किस पृष्टभूमि को ध्यान में रखकर विचार कर रहे हैं। जैसे, दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगरों में अधिकांश एकल परिवार हैं। ऐसे में आर्थिक मुद्दों पर झगड़ा उन पति-पत्नी के बीच अधिक देखने को मिलता है, जहां आपसी समझ की कमी होती है। नहीं तो सामान्य रूप से कपल्स मिलकर परिवार चला रहे हैं।
वहीं, जब बात करते हैं छोटे शहरों और संयुक्त परिवारों की, तब स्थितियां अलग होती हैं और वहां वित्तीय नियंत्रण में पुरुष के साथ ही सास-ससुर की भूमिका अहम होती है। इन स्थितियों में भी आर्थिक विषयों पर तनाव तब पैदा होता है, जब पत्नी अपने पति की तुलना में अधिक पैसे कमाती है। इस एक स्थिति में भी तनाव के दो कारण अधिक देखने को मिलते हैं। पहला कारण है, महिला का अपने पैसों को अपने अनुसार निवेश करने या खर्च करने की इच्छा का प्रबल होना और दूसरा कारण है पति के अंदर इनफीरियेरिटी कॉम्प्लैक्स का होना। आज भी कई पुरुषों के लिए इस बात को स्वीकार कर पाना मुश्किल होता है कि उनकी पत्नी उनसे अधिक पैसा कमाती है और ऐसे में भी जब पत्नी निवेश या खर्च को लेकर अपनी बात मुखरता से रखने लगे तो यह पति के अहम पर सीधी चोट करता है।'
महिलाओं में आर्थिक झगड़ों के कारण भावनात्मक तनाव अधिक क्यों देखने को मिलता है? इस प्रश्न पर डॉक्टर गौरव कहते हैं कि पैसा कमाने के बाद भी यानी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद भी घर के कामों की अधिकतर जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है। परिवार और सामाजिक रिश्तों के बीच खुद को हर समय सही साबित करने का दबाव भी महिलाओं पर अधिक होता है और बच्चों की परवरिश से जुड़े काम भी। साथ ही, आमतौर पर इनकी भावनात्मक जरूरतें और शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं। ऐसे में अनसुलझी और अव्यक्त भावनाएं मनोवैज्ञानिक समस्याओं को जन्म देती हैं, जिसके चलते महिलाओं में चिंता (एंग्जाइटी), अवसाद (माइल्ड डिप्रेशन), तनाव (स्ट्रेस) और नींद की कमी यानी इनसोमनिया जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।
निवेश के मामले में बहुत पीछे हैं भारतीय महिलाएं
बस तीन दिन पहले यानी 5 मार्च 2026 को भारत का पहला ‘महिला वित्तीय समृद्धि सूचकांक’ जारी हुआ। इस इंडेक्स के साथ जारी रिपोर्ट में पता चला कि महिलाओं द्वारा आर्थिक निवेश के मामलों में भारत का कुल स्कोर 100 में से 28.1 है, जो बताता है कि बैंकिंग और डिजिटल पहुंच बढ़ने के बावजूद महिलाओं की वास्तविक वित्तीय समृद्धि और संपत्ति निर्माण की यात्रा अभी काफी पीछे है। यानी 100 में से केवल 28.1 प्रतिशत महिलाएं ही निवेश में रुचि ले रही हैं। जबकि 89 प्रतिशत भारतीय महिलाओं के पास बैंक खाते हैं। इन महिलाओं में केवल 8.6 प्रतिशत महिलाएं ही म्युचुअल फंड्स या इक्विटी में निवेश करती हैं। यह सूचकांक एलएक्समी(Lxme) और ईवाय इंडिया (EY India) द्वारा जारी किया गया है। एलएक्समी महिलाओं के लिए बनाया गया भारत का एक फिनटेक प्लेटफॉर्म/ऐप है, जो उन्हें बचत, निवेश और वित्तीय निर्णय लेने में मदद करता है।
महिलाएं बदल गईं और पुरुष वहीं अटके हैं!
पति-पत्नी के बीच आर्थिक मोर्चे पर बढ़ते तनाव के विषय पर बात करते हुए उद्गम मेंटल हेल्थ केयर ऐंड रिहेबिलिटेशन सेंटर (दिल्ली) की सीनियर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट मिस डोना सिंह बताती हैं कि बदलते समय के साथ लड़कियां बदल गईं और लड़के वहीं अटके रहे। और जब ये पति-पत्नी की भूमिका में समाज में आए तो इस अधूरे बदलाव के कारण समस्याएं खड़ी होने लगीं। मेरे पास ऐसे कई पुरुष पेशेंट्स हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी पत्नी उन्हें तानें मारती है या नीचा दिखाती है क्योंकि इनकी पत्नी इनसे अधिक कमाती है। जबकि ये खुद इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि इनकी पत्नी ने ऐसा इनसे कभी कहा नहीं है। लेकिन ये ऐसा महसूस करते हैं! ऐसा महसूस करने के पीछे की असली वजह हमारे सामाजिक ढांचे और परवरिश से जुड़ी है। लड़कियों को घर और बाहर दोनों जगह के काम सिखाए जा रहे हैं लेकिन लड़कों को घर के कामों में हाथ बंटाना और पत्नी के फैसलों का सम्मान करने की सीख नहीं दी जा रही है। इस कारण जब पति अपनी पत्नी को पैसे से जुड़े फैसले खुद लेते हुए देखता है तो कई मामलों में उसके अहम पर चोट लगती है।
क्योंकि पत्नी का ऐसा करना पति को अपने अस्तित्व और अपनी सत्ता के लिए चुनौती पूर्ण लगता है। उसने तो अपने पिता और दादा को घर के सभी महत्वपूर्ण फैसले लेते देखा है, फिर जब पत्नी को ऐसा करते देखता है तो उसे अपनी सत्ता हिलती हुई लगती है और यहीं से रिश्ते में समस्याओं की शुरुआत होती है। जीवनसाथी के साथ रिश्ते में तनाव को लेकर मेरे पास आने वाले पेशेंट्स में 70 प्रतिशत मामलों में वित्तीय तनाव एक बड़ी वजह होता है। इनमें भी 60 प्रतिशत महिलाएं ही ऐसी समस्याएं लेकर आती हैं। इन महिलाओं में दोनों महिलाएं शामिल हैं, वो भी जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और वो भी जो आर्थिक रूप से पति पर निर्भर हैं। लेकिन 10 प्रतिशत पुरुष भी वित्तीय मामलों से जुड़ी समस्याओं को लेकर काउंसलिंग के लिए आ रहे हैं। कुल मिलाकर बात इतनी है कि लड़कियां रोटी बनाने से लेकर रोटी कमाना सीख गई, लड़के भी सोच में थोड़ा बदलाव लाएं तो ये समस्या आराम से दूर हो सकती है।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल एक्सपर्ट्स के व्यक्तिगत अनुभवों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध डेटा पर आधारित है।

