
शरीर में अलग-अलग जगह फैट जमा होने का दिमाग पर होता है अलग असर!
रिसर्च बताती है कि दिमाग की सेहत के लिए केवल वजन कम होना काफी नहीं है। जरूरी है कि शरीर चर्बी को कैसे स्टोर कर रहा है और ये दिमाग को कैसे प्रभावित कर रहा है।
मोटापे को आमतौर पर केवल वजन बढ़ने या BMI ज्यादा होने तक सीमित समझा गया है। लेकिन एक नई रिसर्च में ऐसे चौंकाने वाले संकेत सामने आए हैं कि अपने शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर बढ़ी चर्बी के प्रति आपकी सोच बदल जाएगी। यह रिसर्च साफतौर पर कहती है कि मोटापे का दिमाग पर असर केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि शरीर में कुल चर्बी कितनी है बल्कि यह भी मायने रखता है कि चर्बी शरीर के किन हिस्सों में जमा है। शोधकर्ताओं ने दिमागी सेहत से जुड़े नतीजों की तुलना शरीर में चर्बी के वितरण के पैटर्न से की और पाया कि चर्बी का स्थान और प्रकार वजन जितना दिमाग को प्रभावित करता है।
आसान शब्दों में कहें तो वैज्ञानिकों ने लोगों की दिमागी सेहत (जैसे याददाश्त, सोचने की क्षमता, ब्रेन की उम्र) को अलग-अलग बॉडी फैट पैटर्न से मिलाकर देखा। यहां तुलना केवल इस बात की नहीं थी कि वजन या BMI कितना है बल्कि इस बात की थी कि चर्बी शरीर में कहां और किस रूप में जमा है। अध्ययन में यह सामने आया कि यदि चर्बी पैनक्रियास के आसपास या पेट के अंदर असामान्य तरीके से जमा हो रही है तो उसका असर दिमाग पर उतना ही गंभीर हो सकता है, जितना ज्यादा वजन होने का। यानी दिमाग के लिए खतरा केवल मोटा होना नहीं है। बल्कि चर्बी का गलत जगह जमा होना भी उतना ही नुकसानदेह साबित हो सकता है।
इस शोध का नाम है “एसोसिएशन ऑफ बॉडी फैट डिस्ट्रीब्यूशन पैटर्न्स ऐट एमआरआई विद ब्रेन स्ट्रक्चर, कॉग्निशन एंड न्यूरोलॉजिक डिज़ीज़ेज़” इस रिसर्च के सह-लेखकों में प्रमुख नाम काई लियू, एम.डी., पीएच.डी. (Kai Liu, M.D., Ph.D.) है। वे द एफिलिएटेड हॉस्पिटल ऑफ शूझोउ मेडिकल यूनिवर्सिटी, चीन में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।
रिसर्च के मुख्य डेटा सोर्स की बात की जाए तो इस शोध में यूके बायोबैंक (UK Biobank) से जुड़े लगभग 25,997 प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में एमआरआई इमेजिंग डेटा, शारीरिक माप, स्वास्थ्य संकेतक और जीवनशैली से संबंधित विवरण शामिल थे, जिनके आधार पर शरीर में चर्बी के वितरण और दिमागी सेहत के बीच संबंध को समझा गया।
विश्लेषण में शरीर में चर्बी के अलग-अलग पैटर्न सामने आए, जिनमें दो पैटर्न सबसे अधिक हानिकारक दिखे। पहला था पैनक्रियास-प्रधान (pancreatic-predominant) फैट, और दूसरा था ‘स्किनी फैट’ प्रोफाइल। इन दोनों रूपों में पाया गया कि दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव, जैसे ग्रे मैटर का सिकुड़ना, दिमाग की उम्र का तेज़ी से बढ़ना, संज्ञानात्मक क्षय और तंत्रिका संबंधी रोगों का बढ़ा जोखिम अधिक था। ये निष्कर्ष पुरुषों और महिलाओं दोनों में समान रूप से देखे गए।
पहले के अध्ययनों में मोटापे, खासतौर पर विसरल फैट (आंतरिक अंगों के आसपास की चर्बी) के अधिक होने को दिमागी या संज्ञानात्मक स्वास्थ्य में गिरावट से जोड़ा गया था। लेकिन यह नया शोध चर्बी जमा होने के पैटर्न से जुड़े विशेष जोखिमों को रेखांकित करता है। अध्ययन के सह-लेखक, चीन के शूझोउ मेडिकल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर काई लियू के अनुसार, इस काम में MRI की वह क्षमता उपयोग की गई है, जिससे शरीर के विभिन्न हिस्सों विशेष रूप से आंतरिक अंगों में चर्बी की मात्रा को सटीक रूप से मापा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह वर्गीकरण व्यक्तिपरक नहीं बल्कि डेटा-आधारित था। और इसी डेटा-आधारित दृष्टिकोण ने चर्बी के वितरण के दो ऐसे प्रकार उजागर किए, जिन्हें पहले स्पष्ट रूप से नहीं पहचाना गया था और जिन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
इस अध्ययन में यूके बायोबैंक के लगभग 26,000 लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें मेडिकल इमेजिंग माप, शारीरिक माप, जनसांख्यिकीय विवरण, रोग-बायोमार्कर, चिकित्सकीय इतिहास और जीवनशैली से जुड़ी आदतें शामिल थीं। इन सभी डेटा को जोड़कर देखा गया कि दिमाग की सेहत के नतीजे शरीर में चर्बी के वितरण के पैटर्न के साथ कैसे जुड़ते हैं। और विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि पैनक्रियास-प्रधान और स्किनी फैट पैटर्न विशेष रूप से हानिकारक तंत्रिका परिणामों से जुड़े हैं।
जब शोधकर्ताओं ने पैनक्रियास के आस-पास जमा अधिक चर्बी वितरण वाले लोगों के MRI डेटा देखे तो पाया कि पैनक्रियास में ‘प्रोटॉन डेंसिटी फैट फ्रैक्शन’लगभग 30 प्रतिशत था। यह किसी ऊतक में चर्बी की सटीक मात्रा बताने वाला MRI संकेतक होता है। लियू के अनुसार, यह स्तर अन्य चर्बी-वितरण श्रेणियों की तुलना में दो से तीन गुना अधिक होता है और कम कुल चर्बी वाले दुबले व्यक्तियों की तुलना में छह गुना तक अधिक हो सकता है। इसके अलावा, इस समूह में BMI और कुल शारीरिक चर्बी भी अधिक पाई गई।
हालांकि, पैनक्रियास-प्रधान प्रोफाइल वाले व्यक्तियों में अन्य प्रोफाइल्स की तुलना में लिवर फैट उतना अधिक नहीं पाया गया। लियू ने कहा कि उच्च पैनक्रियाटिक फैट के साथ तुलनात्मक रूप से कम लिवर फैट का यह संयोजन एक विशिष्ट और चिकित्सकीय रूप से अक्सर अनदेखा किया गया फीनोटाइप है। वे कहते हैं कि रोज़मर्रा की रेडियोलॉजी प्रैक्टिस में “फैटी लिवर” का निदान आम है, लेकिन दिमाग की संरचना, संज्ञानात्मक हानि और तंत्रिका रोगों के जोखिम के दृष्टिकोण से, पैनक्रियास में बढ़ी चर्बी को फैटी लिवर की तुलना में संभावित रूप से अधिक जोखिम वाला इमेजिंग फीनोटाइप माना जाना चाहिए।
दूसरी ओर, ‘स्किनी फैट’ प्रोफाइल वाले लोगों में लिवर और पैनक्रियास को छोड़कर लगभग सभी क्षेत्रों में चर्बी का भार सबसे अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने बताया कि संतुलित ‘उच्च मोटापा’ प्रोफाइल के विपरीत, स्किनी फैट में चर्बी मुख्यतः पेट के आसपास केंद्रित होती है। लियू ने कहा कि यह प्रकार पारंपरिक रूप से बहुत मोटे व्यक्ति की छवि में फिट नहीं बैठता क्योंकि इसका औसत BMI सभी श्रेणियों में केवल चौथे स्थान पर आता है। इसका मतलब यह है कि समस्या BMI से कम और चर्बी-मांसपेशी के अनुपात से ज़्यादा जुड़ी है। उन्होंने आगे कहा कि अगर इस प्रोफाइल को सबसे संक्षेप में वर्णित करना हो तो वह होगा बढ़ा हुआ वजन-से-मांसपेशी का अनुपात, खासकर पुरुषों में।
कुल मिलाकर, यह रिसर्च एक जरूरी और साफ संदेश देती है कि दिमाग की सेहत के लिए सिर्फ वजन कम होना ही काफी नहीं है। यह जरूरी है कि हम समझें शरीर चर्बी को कैसे स्टोर कर रहा है और यह वितरण पैटर्न दिमाग को किस तरह प्रभावित कर रहा है। इसे समझना न केवल मोटापे के जोखिम को गहराई से जानने में मदद करेगा बल्कि दिमागी स्वास्थ्य के लिए इलाज और रोकथाम के नए आयाम भी खोलेगा।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से संपर्क करें।

