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हवा में अब भी मौजूद है, जानलेवा प्रदूषण

हवा में आज भी मौजूद है प्रदूषण का जानलेवा और जहरीला असर!

8 Feb 2026 6:58 PM IST  ( Updated:2026-02-08 13:31:48  )

मुंबई के छाती रोग विशेषज्ञ ने बताया कि कैसे प्रदूषण का असर लोगों की सेहत पर बहुत बुरा असर डाल रहा है और इससे बचने के लिए क्या करें...

Pollution: हवा में जरा-सी ठंड कम हुई और ऐसा लगने लगा कि प्रदूषण भी जैसे विदा हो गया हो। खबरों से इसका शोर कम हुआ, अलर्ट टूट गए, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि शहरों की हवा सच में साफ हो गई है। प्रदूषण कैमरों और सुर्खियों से भले ओझल हो जाए, लेकिन फेफड़ों के भीतर उसकी मौजूदगी बनी रहती है। फरवरी के पहले सप्ताह में भी देश की राजधानी सहित बड़े महानगर उसी जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं, जिसने बीते महीनों में करोड़ों लोगों की सेहत पर असर डाला है।

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के 7 फरवरी 2026 के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर का औसत AQI लगभग 311 दर्ज किया गया। यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उस स्तर का संकेत है, जहां हवा को “गंभीर” माना जाता है। इस स्तर पर सांस लेना केवल संवेदनशील लोगों के लिए नहीं, बल्कि पूरी आबादी के लिए स्वास्थ्य जोखिम बन जाता है। हवा में PM 2.5 की मात्रा लगभग 142 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और PM 10 करीब 181 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गई, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार PM 2.5 का सुरक्षित स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए।

दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग इलाकों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। आनंद विहार, आरके पुरम, आईटीओ और चांदनी चौक जैसे क्षेत्र लगातार “बहुत खराब” से “गंभीर” श्रेणी में बने हुए हैं। ये वही इलाके हैं जहां घनी आबादी, ट्रैफिक और व्यावसायिक गतिविधियां सबसे अधिक हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय तक ऐसे प्रदूषण स्तर में रहना शरीर में धीरे-धीरे सूजन की स्थिति पैदा करता है, जिसे मेडिकल भाषा में क्रॉनिक इंफ्लेमेशन कहा जाता है।

दिल्ली अकेली नहीं है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई भी इस प्रदूषण की चपेट में है। फरवरी के पहले हफ्ते में मुंबई का AQI 250 से 265 के बीच दर्ज किया गया, जो “बहुत खराब” श्रेणी में आता है। वाडाला और चांदिवली जैसे इलाकों में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है। पल्मोनोलॉजिस्ट बताते हैं कि मुंबई जैसे तटीय शहरों में नमी के कारण प्रदूषक कण हवा में ज्यादा देर तक टिके रहते हैं, जिससे सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा और बढ़ जाता है। बढ़ता ट्रैफिक, निर्माण कार्य और औद्योगिक उत्सर्जन इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं।

कोलकाता की हवा भी राहत देने वाली नहीं है। 7 फरवरी को यहां AQI करीब 170 दर्ज किया गया, जो “खराब” श्रेणी में आता है। यह वह स्तर है जहां लंबे समय तक बाहर रहना बच्चों, बुजुर्गों और हृदय या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। वहीं चेन्नई की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर जरूर है, लेकिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं कही जा सकती। चेन्नई में AQI 94 से 115 के बीच रहा, जो संतोषजनक और खराब की सीमा पर खड़ा है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि संवेदनशील लोगों को ऐसे स्तर पर भी सावधानी बरतनी चाहिए।

अब सवाल यह है कि यह प्रदूषण शरीर के भीतर आखिर करता क्या है? इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें बताती हैं कि PM 2.5 जैसे सूक्ष्म कण इतने बारीक होते हैं कि सांस के साथ सीधे फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं। वहां से ये कण रक्त प्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं और पूरे शरीर में सूजन पैदा कर सकते हैं। यही वजह है कि प्रदूषण केवल खांसी या सांस फूलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हृदय रोग, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप और यहां तक कि मधुमेह जैसी बीमारियों के खतरे को भी बढ़ा देता है।

बच्चों पर इसका असर और ज्यादा गंभीर होता है। शोध बताते हैं कि प्रदूषित हवा में पले-बढ़े बच्चों के फेफड़ों की वृद्धि धीमी हो सकती है और उनमें अस्थमा विकसित होने की संभावना अधिक रहती है। बुजुर्गों में यह पहले से मौजूद बीमारियों को और बिगाड़ देता है। गर्भवती महिलाओं में लंबे समय तक खराब हवा के संपर्क से समय से पहले प्रसव और कम वजन के शिशु का खतरा भी बढ़ सकता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रदूषण का असर धीरे-धीरे होता है। यह अचानक बीमार नहीं करता, बल्कि शरीर को अंदर ही अंदर कमजोर करता है। कई लोग यह मान लेते हैं कि जब आंखों में जलन या सांस की तकलीफ नहीं हो रही, तो हवा ठीक है। लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि प्रदूषण का सबसे खतरनाक रूप वही होता है, जो बिना लक्षण के शरीर में नुकसान करता रहता है।

सरकारी एजेंसियां लगातार वायु गुणवत्ता की निगरानी कर रही हैं और नागरिकों को सावधानी बरतने की सलाह दे रही हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग बढ़ाने, कचरा और पराली न जलाने और निजी वाहनों के सीमित इस्तेमाल की अपील की जा रही है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक नीतिगत स्तर पर ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यह समस्या हर साल नए रूप में लौटती रहेगी।

व्यक्तिगत स्तर पर भी सावधानी जरूरी है। खराब AQI वाले दिनों में बाहर निकलते समय मास्क पहनना, भारी शारीरिक गतिविधि से बचना और घर के भीतर हवा को अपेक्षाकृत साफ रखने की कोशिश करना छोटे लेकिन जरूरी कदम हैं। यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि प्रदूषण कोई मौसमी समस्या नहीं है, जिसे ठंड के साथ जोड़कर देखा जाए। यह एक साल-भर रहने वाला स्वास्थ्य संकट है, जो मौसम बदलने के साथ केवल अपना चेहरा बदलता है।

एक बात बिल्कुल साफ है कि महानगरों की हवा साफ दिख सकती है लेकिन सुरक्षित नहीं है। जब तक आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं, तब तक आंखों पर भरोसा करना खुद को धोखा देने जैसा है। प्रदूषण गया नहीं है, वह हर सांस के साथ शरीर के भीतर जा रहा है और यही इसकी सबसे खतरनाक सच्चाई है।


डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।