आम मरीज को बड़ी राहत, कैंसर इलाज सस्ता होने पर डॉक्टरों की राय
x
कैंसर और डायबिटीज का सस्ता इलाज

आम मरीज को बड़ी राहत, कैंसर इलाज सस्ता होने पर डॉक्टरों की राय

डायबिटीज की दवाइयों और इलाज को भी सस्ता बनाने पर जोर है। क्योंकि यह बीमारी भारत में सबसे अधिक लोगों को प्रभावित करती है और जीवनभर इलाज की जरूरत होती है...


Click the Play button to hear this message in audio format

सस्ते इलाज की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए, आम बजट 2026-27 में कुछ ऐसी घोषणाएं की गई हैं, जिनके जरिए कैंसर और डायबिटीज सहित गैर संचारी रोग यानी नॉन कॉम्युनिकेवल डिजीज का इलाज सस्ता हो सके। इसके लिए सरकार ने क्या घोषणाएं की हैं और इलाज को सस्ता करने की क्या प्लानिंग है, यहां जानें...


इन बीमारियों के इलाज को सस्ता करने की बात कही है?

कैंसर (Cancer)

बजट में 17 आवश्यक कैंसर दवाओं के बेसिक कस्टम ड्यूटी (Basic Customs Duty) को पूरी तरह हटा दिया गया है। इससे इन दवाओं को विदेश से लाना सस्ता होगा और भारत में भी उनकी कीमत कम रहने में मदद मिलेगी।

डायबिटीज (Diabetes)

डायबिटीज की दवाइयों और इलाज को भी सस्ता बनाने पर जोर है। क्योंकि यह बीमारी भारत में सबसे अधिक लोगों को प्रभावित करती है और जीवनभर इलाज की जरूरत होती है।

ऑटो‑इम्यून रोग (Auto‑immune Disorders)

ऑटो‑इम्यून बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी बायोलॉजिक और बायोसिमिलर दवाइयां महंगी होती हैं। बायोफार्मा शक्ति पहल इन्हें देश में बनाने और उपलब्ध कराने में मदद करेगी।


इलाज सस्ता कैसे होगा?

इन बीमारियों के इलाज को सस्ता करने की सरकार की पूरी प्रक्रिया/मैकेनिज़म क्या होगा, इस बारे में ये जानकारी दी गई है...

(1) कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) में छूट

कैंसर की 17 जरूरी दवाओं से बेसिक कस्टम ड्यूटी हटायी गई है। इसका सीधा असर यह होगा कि जब ये दवाएं विदेश से भारत में आयात होंगी तो उन पर टैक्स नहीं लगेगा। इससे...

इनकी कीमत कम होगी

मरीज को सस्ता इलाज मिलेगा

दवाओं तक पहुंच आसान होगी

राज्य के फार्मेसी और अस्पताल उन्हें सस्ते में दे पाएँगे।


(2) बायोफार्मा शक्ति योजना पहल (₹10,000 करोड़ का निवेश)

यह इस बजट की सबसे बड़ी स्वास्थ्य घोषणा है, जिसके तहत 5 साल में ₹10,000 करोड़ निवेश होंगे। ताकि बीमारियों की जड़ पर वार करके उन्हें पूरी तरह ठीक करने पर जोर दिया जाए ना कि केवल बीमारी के लक्षणों पर काम किया जाए। इसका तरीका यह है...

नई लैब और इंस्टिट्यूशन से घरेलू उत्पादन बढ़ेगा, जिससे देश में बायोलॉजिक और बायोसिमिलर दवाओं का उत्पादन बढ़ेगा। इससे महंगी दवाइयां भारत में ही बन सकेंगी। इससे विदेशों पर निर्भरता कम होगी और घरेलू उत्पादन होने से दवाओं की उपलब्धता व्यापक होगी और इलाज का खर्च नियंत्रित होगा।


(3) अनुसंधान और क्षमता निर्माण

तीन नए NIPER (राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल एजुकेशन और रिसर्च संस्थान) बनाए जाने की घोषणा इस बजट में की गई है। साथ ही सात मौजूदा संस्थानों के इंफ्रास्ट्रक्चर को उन्नत किया जाएगा। ये कदम उच्च स्तर की दवाओं से जुड़े शोध और इनके उत्पादन को मजबूत करेंगे।


(4) 1000 मान्यता प्राप्त क्लीनिकल ट्रायल साइट्स

देश के अंदर 1,000 मान्यता प्राप्त क्लीनिकल ट्रायल साइट्स का नेटवर्क तैयार होने से दवा परीक्षण की प्रक्रिया कहीं अधिक तेज़ और व्यवस्थित हो जाएगी। इससे नई दवाओं को समय पर मंजूरी मिल सकेगी और मरीजों तक उन्नत उपचार जल्दी पहुंच पाएगा। साथ ही, उच्च-गुणवत्ता वाली दवाओं का विकास देश के भीतर होने से उनकी लागत भी कम होगी। कुल मिलाकर, यह पहल न सिर्फ़ इलाज की प्रभावशीलता बढ़ाएगी बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को भी व्यापक बनाएगी।

(5) CDSCO नियामक सुधार

सरकार ने दवा नियामक संस्था सीडीएससीओ (CDSCO) को और मजबूत करने पर भी जोर दिया है। ताकि दवाओं के परीक्षण और मंजूरी से जुड़े नियम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों। नियामक प्रक्रिया को सरल और तेज बनाने से नई दवाओं को समय पर मंजूरी मिल सकेगी, जिससे मरीजों तक आधुनिक और प्रभावी उपचार जल्द पहुंच पाएगा।

(6) बायोसिमिलर और बायोलॉजिक दवाएं

बायोसिमिलर और बायोलॉजिक दवाओं के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने का सीधा अर्थ है कि भारत को महंगी आयातित दवाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। बायोलॉजिक दवाएं आमतौर पर कैंसर, डायबिटीज और ऑटो-इम्यून जैसी दीर्घकालिक और जटिल बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होती हैं, लेकिन इनकी कीमत बहुत अधिक होने के कारण कई मरीजों की पहुंच से बाहर रहती हैं। जब इन्हीं दवाओं के सुरक्षित और प्रभावी बायोसिमिलर देश में ही बनाए जाएंगे, तो उनकी लागत स्वाभाविक रूप से कम होगी। इससे एक ओर घरेलू दवा उद्योग को तकनीकी और आर्थिक मजबूती मिलेगी। वहीं दूसरी ओर मरीजों को कम कीमत पर वही उपचार मिल सकेगा, जिसकी उन्हें लंबे समय से आवश्यकता है। कुल मिलाकर यह पहल इलाज की लागत घटाने, दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


संक्षेप में जानें कि यह सस्ता इलाज कब और कैसे मिलेगा?

सस्ता इलाज चरणबद्ध तरीके से मरीजों तक पहुंचाने की योजना यह है कि सबसे पहले, तुरंत प्रभाव के तौर पर कस्टम ड्यूटी हटने से आयातित दवाओं की कीमत घटेगी और वे जल्दी ही कम दाम पर उपलब्ध होने लगेंगी।

वहीं दूसरी तरफ बायोफार्मा क्षेत्र को मिलने वाली मजबूती के कारण बायोलॉजिक और बायोसिमिलर दवाओं का घरेलू उत्पादन बढ़ेगा, जिससे इलाज की लागत और कम होगी।

वहीं लंबी अवधि में, शोध-आधारित और उन्नत दवाओं की उपलब्धता बढ़ने से भारत में न सिर्फ इलाज के विकल्प बेहतर होंगे। बल्कि वे पहले की तुलना में कहीं अधिक किफायती भी बन सकेंगे।


क्या कह रहे हैं चिकित्सा जगत के विशेषज्ञ?

डॉ. मनदीप सिंह मल्होत्रा, निदेशक, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, सीके बिड़ला हॉस्पिटल, दिल्ली

यह फैसला कैंसर से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। खासकर उन लोगों के लिए, जिनका इलाज दुर्लभ या गंभीर कैंसर के लिए चल रहा है और जिनकी दवाएं बहुत महंगी होने के कारण आसानी से उपलब्ध नहीं हो पातीं। 17 जरूरी कैंसर दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी हटाने और सात और दुर्लभ बीमारियों को पर्सनल यूज़ के लिए ड्यूटी-फ्री आयात की लिस्ट में शामिल करने से मरीजों पर पड़ने वाला इलाज का खर्च काफी हद तक कम होगा।

इस फैसले से उन जीवनरक्षक दवाओं तक पहुंच आसान होगी, जो भारत में नहीं बनतीं। इलाज सस्ता होने और दवाएं समय पर मिलने से मरीजों को बेहतर इलाज मिल पाएगा और उनके ठीक होने की संभावना भी बढ़ेगी। यह कदम दिखाता है कि सरकार कैंसर इलाज को आम लोगों के लिए ज्यादा सुलभ और बराबरी वाला बनाने को लेकर गंभीर है, जिसका सीधा असर मरीजों की जिंदगी और उनके जीवन की गुणवत्ता पर पड़ेगा।

डॉ. श्याम अग्रवाल, अध्यक्ष- मेडिकल ऑन्कोलॉजी, सर गंगाराम अस्पताल

हम 17 कैंसर दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी हटाने और सात दुर्लभ बीमारियों के लिए दवाओं व पोषण से जुड़े उत्पादों को पर्सनल यूज़ के लिए बिना शुल्क आयात की मंजूरी देने के फैसले का स्वागत करते हैं। यह एक संवेदनशील और मानवीय कदम है, जिससे इलाज का खर्च सीधे तौर पर कम होगा, जरूरी जीवनरक्षक दवाएं आसानी से मिल सकेंगी और मरीजों व उनके परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव काफी हद तक घटेगा।

डॉ. विनय अग्रवाल, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आईएमए

ऑटोइम्यून बीमारियों के लंबे इलाज को किफायती बनाने के लिए हमारे जेनेरिक फार्मा सेक्टर को मजबूत करना बेहद जरूरी है। अगर घरेलू जेनेरिक दवाओं को बजट और नीतिगत समर्थन मिले, तो इलाज की लागत काफी कम हो सकती है और मरीजों को पैसे और इलाज के बीच फंसे रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

डॉ. धर्मेंद्र नागर, प्रबंध निदेशक, पारस हेल्थ

जब सरकार बायो‑फार्मा निर्माण में लगातार निवेश करती है, तो यह साफ संकेत है कि भारत जटिल दवाओं में आत्मनिर्भर बनने के लिए गंभीर है। इससे न सिर्फ मधुमेह और ऑटोइम्यून बीमारी की दवाओं का उत्पादन तेज होगा, बल्कि लागत कम होगी, दवाओं तक पहुंच बढ़ेगी और भारत सस्ती बायोलॉजिक दवाओं का ग्लोबल हब बन सकेगा।

डॉ. नवीन डांग, संस्थापक एवं निदेशक, डॉ. डांग्स लैब

1.5 लाख केयरगिवर्स को ट्रेन करना, मेडिकल वैल्यू टूरिज्म के लिए पांच नए क्षेत्रीय केंद्र बनाना और ऑप्टोमेट्रिस्ट, रेडियोग्राफर और सहायक स्वास्थ्य पेशेवरों का कौशल बढ़ाना—ये सभी कदम मिलकर भारत की हेल्थवर्कफोर्स को मजबूत बनाते हैं और साथ ही इलाज की गुणवत्ता, पहुंच और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बेहतर बनाते हैं।

डॉ. हर्ष महाजन, मेंटर- फिक्की हेल्थ सेक्टर

ऑटोइम्यून रोगों के लंबे इलाज को सस्ता बनाने के लिए भारत के जेनेरिक फार्मा सेक्टर को मजबूत करना बहुत जरूरी है। अगर घरेलू जेनेरिक दवाओं को नीति और बजट का समर्थन मिले, तो इलाज की लागत घटेगी और मरीज बिना आर्थिक दबाव के इलाज जारी रख पाएंगे।

श्री दीपक चोपड़ा,संस्थापक अध्यक्ष- थैलेसेमिक्स इंडिया

थैलेसीमिया मरीजों के लिए यह स्वागतयोग्य है कि भारत के जेनेरिक फार्मा सेक्टर को मजबूत किया जा रहा है। इससे लंबे इलाज की लागत कम होगी और मरीजों को इलाज और पैसों के बीच कोई कठिन फैसला नहीं करना पड़ेगा।

डॉ. मनीषा अरोड़ा, निदेशक -आंतरिक चिकित्सा, सीके बिड़ला हॉस्पिटल, दिल्ली

वित्त मंत्री की ‘बायोफार्मा शक्ति’ योजना, जिसमें अगले पांच सालों में 10,000 करोड़ रुपये का निवेश है, भारत के बायोफार्मा सेक्टर को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है। घरेलू उत्पादन, नियमों का अपग्रेड और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर ध्यान देने से हेल्थकेयर किफायती बनेगा और भारत ग्लोबल बायोफार्मा हब बन सकेगा।

इस योजना से बायोसिमिलर दवाओं का विस्तार होगा, जो इंसुलिन और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसी महंगी बायोलॉजिक दवाओं के सस्ते विकल्प हैं। इससे इलाज की लागत घटेगी और कैंसर, डायबिटीज और ऑटोइम्यून बीमारियों जैसे लंबे इलाज वाले रोगों के लिए दवाओं की पहुंच बढ़ेगी—इसलिए इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य में गेम-चेंजर कहा जा सकता है।

Read More
Next Story