
भारत में मिले निपाह वायरस के मरीज, सरकार बरत रही है ये सावधानियां
निपाह वायरस का संक्रमण समय-समय पर सामने आता रहता है। पश्चिम बंगाल में हाल ही इसके दो नए मरीज मिले हैं। जानें, इसके फैलने का कारण और बचाव के उपाय। इलाज नहीं है..
निपाह वायरस एक अत्यंत घातक जूनोटिक वायरस है। जूनोटिक वायरस का अर्थ होता है कि यह वायरस मुख्य रूप से जानवरों से इंसानों में फैलता है। निपाह वायरस से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसकी मृत्युदर बहुत अधिक होती है। इससे संक्रमित हुए लोगों में मरने वालों का अनुपात 40 से 75 प्रतिशत तक होता है। परेशानी की बात यह है कि अब तक इस संक्रमण का कोई टीका उपलब्ध नहीं है।
भारत में निपाह के मामले
भारत में पश्चिम बंगाल में पिछले एक महीने के भीतर निपाह वायरस के दो मामलों की पुष्टि के बाद, एशिया के कई देशों के हवाई अड्डों पर अलर्ट बढ़ा दिया गया है। थाईलैंड, नेपाल और वियतनाम जैसे देशों ने संभावित व्यापक फैलाव की आशंका को देखते हुए एयरपोर्ट पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी है।
भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने पुष्टि की है कि दिसंबर के बाद से पश्चिम बंगाल में दो मामले सामने आए हैं। लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि वायरस को समय रहते नियंत्रित (timely containment) कर लिया गया है। मंत्रालय के अनुसार, जिन लोगों को संक्रमण हुआ है, उनसे जुड़े और उनके आस-पास के लगभग 200 नजदीकी संपर्कों की जांच की गई है और अब तक किसी नए प्रकोप का पता नहीं चला है। हालांकि संक्रमित मरीजों की व्यक्तिगत जानकारी साझा नहीं की गई।
कैसे फैलता है निपाह वायरस?
निपाह वायरस मुख्य रूप से सुअरों और फ्रूट बैट्स (फल खाने वाले चमगादड़ों) जैसे जानवरों से इंसानों में फैलता है। यह संक्रमण सीधे संपर्क या जानवरों के स्राव (secretions) के ज़रिए इंसानों तक पहुंच सकता है।
शरीर में प्रवेश करने के बाद यह वायरस 4 से 14 दिनों तक इनक्यूबेशन पीरियड में रह सकता है। यानी इस दौरान यह वायरस शरीर के अंदर जीवित तो रहता है लेकिन इसके संक्रमण के लक्षण दिखाई नहीं देते। जब इसका असर दिखना शुरू होता है तो शुरुआती लक्षणों में तेज़ बुखार, मतली (लगातार जी मिचलाना), उल्टी और सांस लेने में दिक्कत शामिल हैं। आगे चलकर यह संक्रमण निमोनिया का रूप ले सकता है।
गंभीर मामलों में निपाह वायरस दिमाग में खतरनाक सूजन (encephalitis) पैदा करता है, जिससे अत्यधिक नींद आना, दौरे पड़ना और अन्य तंत्रिका संबंधी लक्षण उभर सकते हैं। हालांकि इंसान से इंसान में इसका प्रसार सीमित माना जाता है। फिर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इसे महामारी की दृष्टि से उच्च जोखिम वाला वायरस मानता है। क्योंकि अभी तक इससे बचाव के लिए न तो इसका कोई टीका बन पाया है और न ही कोई विशिष्ट इलाज।
पहले कब-कब फैल चुका है निपाह वायरस?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, निपाह वायरस चमगादड़ से फलों में और फलों से इंसानों और जानवरों में फैलता है। साल 1998 में पहली बार मलेशिया के गांव कांपुंग सुंगई निपाह में इस वायरस के मामले सामने आए थे, जब यह सुअर पालकों के बीच फैला और 100 से अधिक लोगों की मौत हुई। क्योंकि यह सबसे पहले निपाह नाम के गांव में पाया गया इसलिए इस वायरस का नाम 'निपाह वायरस' पड़ गया।
इसके बाद से एशिया के कई देशों जैसे, भारत, फिलीपींस, सिंगापुर और मलेशिया में लगभग हर साल इसके मामले सामने आते रहे हैं। बांग्लादेश में यह वायरस बार-बार उभरता रहा है।
भारत में निपाह वायरस का पहला मामला 2001 में पश्चिम बंगाल में दर्ज किया गया था, जो बांग्लादेश से सटा हुआ राज्य है। बांग्लादेश में इसके फैलाव को अक्सर कच्चे खजूर के रस के सेवन से जोड़कर देखा जाता है। क्योंकि फ्रूट बैट्स यानी फल खाने वाले चमगादड़ आमतौर पर खजूर के पेड़ों पर रहते हैं। भारत में 2018 में केरल में निपाह वायरस से लगभग 17 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद वर्ष 2023 में भी केरल में इसके चलते दो मौतें दर्ज की गईं।
क्या कर रही हैं स्वास्थ्य एजेंसियां?
निपाह वायरस के जो नए मामले सामने आए हैं इन्हें इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि ये साल 2007 के बाद पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के पहले मामले हैं। यानी करीब 19 साल बाद इस राज्य में यह संक्रमण मिला है। भारतीय स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, संक्रमित मरीजों को गहरी निगरानी में रखा गया है और प्रयोगशाला जांच अनेक स्तरों पर की गई है। साथ ही फील्ड स्तर पर जांच के माध्यम से समय रहते मामलों को नियंत्रित किया गया है। ताकि संक्रमण फैलने से रोका जा सके।
हालांकि राज्य में दिसंबर 2025 के बाद अब तक केवल दो मामलों की ही पुष्टि हुई है। लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि स्थिति पर निरंतर निगरानी रखी जा रही है और सभी आवश्यक सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय लागू किए गए हैं।
भारत सरकार के साथ ही अन्य देशों ने सतर्कता बरतते हुए सुरक्षा उपाय तेज कर दिए हैं। थाईलैंड, वियतनाम और इंडोनेशिया ने भारत से आने वाले यात्रियों के लिए अतिरिक्त स्क्रीनिंग, जैसे तापमान जांच और स्वास्थ्य घोषणाएं अनिवार्य की हैं। वहीं, म्यांमार ने पश्चिम बंगाल की अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी है। जबकि चीन ने अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में रोग-नियंत्रण उपाय कड़े कर दिए हैं। भारत सरकार ने मामलों में तेज बढ़ोतरी की खबरों को अटकलबाजी और तथ्यहीन बताया है।
निपाह वायरस के संक्रमण से कैसे बचें?
कच्चे या खुले में रखे फल, खासकर जो जमीन पर गिरे हों या जिन पर काटने के निशान दिखें, निपाह संक्रमण का संभावित स्रोत बन सकते हैं। कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि चमगादड़ रात में फलों पर बैठते हैं और वही फल सुबह इंसान उठाकर खा लेते हैं। फल को केवल धोना नहीं बल्कि छीलकर खाना निपाह से बचाव का एक प्रभावी उपाय है। यही बात कच्चे ताड़ के रस यानी ताड़ी (पाम सैप) पर भी लागू होती है, जिसे कुछ क्षेत्रों में सीधे पीने की परंपरा है।
निपाह वायरस इंसान से इंसान में भी फैल सकता है। जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता है, उल्टी करता है या उसके शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क में दूसरा व्यक्ति आता है तो संक्रमण आगे बढ़ सकता है। केरल में सामने आए प्रकोपों के दौरान यह पैटर्न स्पष्ट रूप से देखा गया। इसलिए निपाह से बचाव केवल व्यक्तिगत स्वच्छता तक सीमित नहीं है बल्कि देखभाल करने वालों और स्वास्थ्यकर्मियों की सावधानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
बीमार व्यक्ति की देखभाल के दौरान पूरी सावधानी बरतें, मास्क का उपयोग, हाथों की नियमित स्वच्छता और उपयोग किए गए कपड़ों या बर्तनों को अलग रखना लाभकारी है। ये सभी कदम सामान्य लग सकते हैं लेकिन निपाह जैसे वायरस के मामले में यही कदम जीवन रक्षक बन जाते हैं।
वैज्ञानिक तथ्य भी यही बताते हैं कि संक्रमण के शुरुआती दिनों में यदि संक्रमित व्यक्ति के साथ संपर्क के दौरान सतर्कता बरती जाए तो इसे फैलने से रोका जा सकता है।
जो लोग पशु पालन करते हैं, उन्हें पशुओं को लेकर सतर्कता रखना आवश्यक है। सुअर, बकरी या अन्य पालतू जानवर यदि असामान्य रूप से बीमार दिखें, अचानक मर जाएं या उनके व्यवहार में बदलाव दिखे तो उन्हें बिना सुरक्षा के छूना खतरनाक हो सकता है।
फिलहाल निपाह वायरस के लिए कोई स्वीकृत वैक्सीन नहीं है। इलाज मुख्य रूप से सहायक चिकित्सा (supportive care) पर आधारित होता है। यही कारण है कि निपाह के मामले में इसकी रोकथाम ही सबसे बड़ा उपचार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और ICMR दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि व्यवहार में छोटे बदलाव बड़े प्रकोप को रोक सकते हैं।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

