धीमी गैस सप्लाई! दिल्ली में लौटा पुराना दौर, कोयले और केरोसिन पर खाना
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धीमी गैस सप्लाई! दिल्ली में लौटा पुराना दौर, कोयले और केरोसिन पर खाना

मिडिल ईस्ट जंग से सप्लाई धीमी, दिल्ली में ₹6000 तक पहुँचा गैस सिलेंडर का दाम। पेट्रोल से महंगा बिक रहा केरोसिन, ढाबों से रोटी गायब, कोयले पर पक रहा खाना।


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Slow LPG Supply : मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग का अंत कब होगा, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन इसकी आग की तपिश हजारों मील दूर भारत के अलग अलग शहरों में महसूस की जा रही है। वजह है इंधन की सप्लाई चेन की रफ़्तार का मंदा पड़ना। देश की राजधानी दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है। ये समस्या देश की राजधानी की गलियों और ढाबों तक पहुँच गई है। भारत में ईंधन की सप्लाई क्या धीमी हुई, मानों देश की राजधानी एक झटके में 30-40 साल पीछे लौट गई हो। आज दिल्ली के कई इलाकों में वही मंजर दिख रहा है, जो हमारे बड़े-बुजुर्गों के जमाने में हुआ करता था। जब रसोई में गैस की नीली लौ नहीं, बल्कि मिट्टी के तेल (केरोसिन) के स्टोव और कोयले की अंगीठियां जलती थीं। आज मजबूरी ने फिर से उसी धुएं और कालिख भरे दौर को वापस ला खड़ा किया है। इसकी सबसे बड़ी वजह है बाजार से कमर्शियल गैस सिलेंडर का अचानक गायब हो जाना और जो मिल रहा है, उसकी कीमत सुनकर आम आदमी के होश उड़ रहे हैं।

दाम बढ़े पर सिलेंडर कहाँ है? जनता का तीखा सवाल

आम लोगों और छोटे दुकानदारों के मन में आज एक ही सबसे बड़ा सवाल है कि केंद्र सरकार ने कमर्शियल सिलेंडर के दाम में ₹195 की भारी वृद्धि तो कर दी, लेकिन आखिर ये सिलेंडर हैं कहाँ? दिल्ली के प्रमुख बाजारों से लेकर गली-मोहल्लों तक, कमर्शियल गैस की ऐसी किल्लत है कि दुकानदार खाली सिलेंडर लेकर दर-दर भटक रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जो सिलेंडर सरकारी रेट और एजेंसियों पर उपलब्ध नहीं है, वही 'ब्लैक मार्केट' में ₹6000 तक बेचा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि अगर पीछे से सप्लाई कम है और युद्ध का असर है, तो कालाबाजारी करने वालों के पास सिलेंडरों का स्टॉक कहाँ से आ रहा है? सरकार की सख्ती केवल ज़ुबानी क्यों प्रतीत हो रही है, जमीन पर छोटे दुकानदार को ₹6000 तक का चूना क्यों लग रहा है?

बिरयानी की दुकान पर 'कोयले का तंदूर'

दिल्ली की मशहूर शंकर मार्किट में एक बिरयानी की दुकान पर अब गैस के आधुनिक चूल्हे ठंडे पड़े हैं और उनकी जगह लोहे के भारी तंदूर ने ले ली है। दुकानदार रईस की कहानी आज हर उस छोटे कारोबारी की दास्तां है जो रोज कमाता और रोज खाता है।

रईस ने अपनी बेबसी साझा करते हुए कहा:

"गैस खत्म हुई तो मजबूरी में ₹3500 का यह तंदूर लाना पड़ा, क्योंकि कई दिनों तक दुकान बंद रखनी पड़ी थी। गैस का कोई ठिकाना नहीं था। अब इस तंदूर में रोज लगभग ₹800 तक का कोयला जल जाता है। आप हिसाब लगाइए, पहले ₹1400 का सिलेंडर 4 से 5 दिन चल जाता था, यानी एक दिन का खर्च ₹300 से भी कम था। अब वही खर्च तीन गुना बढ़ गया है। दुकान चलाना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है।"

जलीश, जो सालों से बिरयानी का काम कर रहे हैं, उनका दर्द और भी गहरा है:

"चार दिन से हमारे पास गैस नहीं है। जो सिलेंडर ₹1300 का मिलता था, आज उसके ₹6000 मांगे जा रहे हैं। हम जैसे छोटे दुकानदार इतना पैसा कहाँ से लाएं? कोयला भी अब ₹45 किलो हो गया है जो पहले ₹20-25 था। मेहनत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि सुबह से शाम तक धुएं में आंखें जलती रहती हैं, लेकिन पेट पालने के लिए यह सब करना पड़ रहा है।" ''हमने बिरयानी की कीमत 10 रूपये बढ़ा दी है। ज्यादा बढ़ा नहीं सकते, वरना ग्राहक नहीं आएगा।''

ढाबों से 'रोटी' गायब, मिट्टी के तेल का आख़िरी सहारा

सबसे ज्यादा भावुक कर देने वाला दृश्य शंकर मार्किट में ही स्थित 'ॐ शुद्ध वैष्णो भोजनालय' जैसे छोटे ढाबे पर देखने को मिल रहा है। यहाँ गैस न मिलने की वजह से दुकानदार ने ₹9000 खर्च करके केरोसिन (मिट्टी के तेल) वाले बड़े स्टोव खरीदे हैं। लेकिन इन स्टोव ने गरीबों और मजदूरों की थाली से उनकी 'रोटी' ही छीन ली है।

ढाबा चलाने वाले रमेश पिछले 25 साल से ये ढाबा चला रहे हैं, लेकिन उन्होंने ऐसा संकट कभी नहीं देखा। उन्होंने बताया:

"25 साल में पहली बार ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं। हमने दो केरोसिन स्टोव खरीदे हैं क्योंकि बच्चों का पेट तो पालना ही है। लेकिन इस स्टोव की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस पर हम रोटी नहीं बना सकते। रोटियों में मिट्टी के तेल की महक आने लगती है, जिसे कोई खा नहीं सकता। इसलिए अब हमने अपनी थाली से रोटी को पूरी तरह हटा दिया है। अब हम ग्राहकों को सिर्फ चावल, दाल और सब्जी ही दे पा रहे हैं। केरोसिन भी अब ₹150 लीटर तक मिल रहा है, वह भी बहुत मुश्किल से ढूंढकर लाना पड़ता है।" रमेश के इस दावे ने ये सवाल भी खड़ा किया है कि आखिर मिट्टी का तेल पेट्रोल के दाम से भी ज्यादा महंगा है, आखिर क्यों ?

'छोटू सिलेंडर' का विज्ञापन और हकीकत का अंतर

छोटे रोल, मोमोज आदि की दूकान लगाने वालों की आखिरी उम्मीद 'छोटू सिलेंडर' (5 किलो) पर टिकी थी। केंद्र सरकार और पेट्रोलियम कंपनियों ने विज्ञापन देकर कहा था कि 5 किलो वाला सिलेंडर एजेंसियों पर आसानी से मिलेगा। लेकिन दुकानदार नितिन की मानें तो यह सिर्फ एक कागजी दावा है।

नितिन ने बताया:

"अगर छोटू सिलेंडर मिल रहा होता, तो हम क्यों भटकते? एजेंसियों पर जाने पर वे साफ मना कर देते हैं। अब मजबूरन हमें ₹300 से ₹350 प्रति किलो की दर से अवैध तरीके से गैस भरवानी पड़ रही है। दुकान ज्यादा दिन बंद रख नहीं सकते क्योंकि किराया और बिजली का बिल भी देना है। इस महंगाई का सीधा असर हमारे काम पर पड़ा है। हमने मजबूरी में हर रोल और प्लेट पर ₹10 बढ़ा दिए हैं। ग्राहक भी क्या करें, उन्हें पता है कि बाहर युद्ध चल रहा है और देश में गैस की कमी है, तो वे भी चुपचाप बढ़ा हुआ दाम दे देते हैं।"

आम आदमी की जेब और भूख की मजबूरी

इस ईंधन संकट का सबसे बड़ा शिकार वो आम नागरिक है जो बाहर खाना खाने पर निर्भर है। चाहे वो दफ्तर जाने वाला बाबू हो या दिहाड़ी मजदूरी करने वाला श्रमिक, सबकी थाली महंगी हो गई है। दिल्ली के ढाबों पर अब एक नोटिस आम हो गया है "ईंधन की कमी के कारण हर खाना ₹10 महंगा।" लोग अब रोटी के बजाय चावल खाकर पेट भर रहे हैं। भूख लगेगी तो आदमी क्या करेगा, उसे तो खाना ही पड़ेगा चाहे दाम ₹10 बढ़े या ₹20।

चूल्हे की आग ठंडी, पर महंगाई की आंच तेज

दिल्ली की सड़कों पर सुलग रहे कोयले के तंदूर से काला धुआं और केरोसिन की तीखी गंध आज के ऊर्जा संकट की गवाही दे रही है। जंग भले ही सरहदों के पार हजारों मील दूर हो रही हो, लेकिन उसकी असली कीमत भारत का वो आम आदमी चुका रहा है।

बड़ा सवाल यह है कि अगर ₹195 दाम बढ़ाने के बाद भी सिलेंडर उपलब्ध नहीं है, तो फिर इस मूल्य वृद्धि का औचित्य क्या है? साथ ही, प्रशासन को उन कालाबाजारी करने वालों पर नकेल कसनी होगी जो संकट के समय में ₹1300 का सिलेंडर ₹6000 तक में बेच रहे हैं। जब तक गैस की सप्लाई सुचारू नहीं होती और कालाबाजारी नहीं रुकती, तब तक दिल्ली के इन ढाबों की थाली अधूरी रहेगी और गरीब की 'रोटी' पर यह संकट बना रहेगा।


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