
पेट्रोल-डीजल तो सिर्फ ट्रेलर, हॉर्मुज़ की जंग से अब हर सामान पर मार!
खाड़ी देशों के तनाव ने तोड़ा ग्लोबल सप्लाई चेन का पहिया। कमर्शियल गैस की कमी से रुकीं कारखानों की भट्टियाँ, 35 दिनों में ही बाज़ार में सामान हुआ बेहद महंगा।
Strait Of Hormuz Impact : जब दो देशों के बीच मिसाइलें चलती हैं, तो उसका धुआँ सिर्फ युद्ध के मैदान में नहीं उठता, बल्कि हज़ारों मील दूर बैठे एक आम आदमी की जेब और घर के बजट तक पहुँचता है। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच गहराते तनाव ने आज दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहाँ 'ग्लोबल वर्ल्ड' का नारा अब डराने लगा है। आज अगर खाड़ी के देशों में अशांति है, तो उसका सीधा असर दिल्ली के ऐतिहासिक चावड़ी बाज़ार की तंग गलियों में महसूस किया जा रहा है।
अक्सर हम युद्ध का मतलब सिर्फ पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती कीमतों से जोड़कर देखते हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज़्यादा गहरी और कड़वी है। 'द फ़ेडरल' की टीम जब एशिया की सबसे बड़ी होलसेल मार्केट चावड़ी बाज़ार पहुँची, तो वहां का सन्नाटा और व्यापारियों की चिंता एक अलग ही कहानी बयां कर रही थी। यह कहानी है उस कच्चे माल की, जो सरहदों पर रुक गया है और उस महंगाई की, जो धीरे-धीरे आपके घर के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है।
रणक्षेत्र से बाज़ार तक: क्यों गूँज रहा है 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़'?
दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और भारी मात्रा में एलपीजी (LPG) इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुज़रती है। लेकिन इस बार शोर सिर्फ ईंधन का नहीं है। इस युद्ध ने 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' (Hormuz Strait) को एक व्यापारिक चक्रव्यूह बना दिया है।
चावड़ी बाज़ार के व्यापारियों का कहना है कि इस रास्ते के बाधित होने से कच्चे माल (रॉ मटेरियल) की सप्लाई चेन पूरी तरह टूट गई है। जो कंटेनर पहले आसानी से भारत के बंदरगाहों तक पहुँचते थे, अब वे या तो आ नहीं रहे या फिर उन्हें अफ्रीका के नीचे से लंबे रास्तों से घूमकर आना पड़ रहा है। नतीजा यह है कि माल भाड़ा (फ्रेट चार्ज) बढ़ गया और बाज़ार में ज़रूरी सामान की भारी किल्लत हो गई है।
चावड़ी बाज़ार की ज़ुबानी: 35 दिनों की जंग का प्रभाव
चावड़ी बाज़ार हार्डवेयर, टूल्स, सेनेटरी फिटिंग्स और मशीनरी का गढ़ है। पिछले 35 दिनों में यहाँ के समीकरण पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। सामान के दामों में 15 से 35 प्रतिशत तक की भारी वृद्धि देखी जा रही है। व्यापारियों से बातचीत में तीन मुख्य कारण निकलकर सामने आए हैं: गैस की कमी, डॉलर की मजबूती और सप्लाई चेन का टूटना।
1. गैस की किल्लत और बुझती भट्टियाँ
चावड़ी बाज़ार के अनुभवी व्यापारी और दिल्ली स्टील टूल्स एंड हार्डवेयर ट्रेडर्स एसोसिएशन के महासचिव ललित अग्रवाल बताते हैं कि मार दोहरी पड़ी है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण के नियमों के कारण यहाँ के फोर्जिंग और कास्टिंग प्लांट (ढलाई के कारखाने) डीज़ल से हटकर गैस पर शिफ्ट हो चुके थे। अब युद्ध की वजह से कमर्शियल गैस की किल्लत हो गई है क्योंकि सरकार की पहली प्राथमिकता डोमेस्टिक (घरेलू) गैस सप्लाई को बनाए रखना है।
ललित अग्रवाल कहते हैं, "जब गैस नहीं मिलेगी, तो भट्टियाँ कैसे जलेंगी? आज कारखाने अपनी क्षमता का सिर्फ 30-40 प्रतिशत ही काम कर पा रहे हैं। हमारे फिक्स्ड खर्चे जैसे किराया, लेबर और बिजली उतने ही हैं, लेकिन उत्पादन आधा रह गया है। ऊपर से रॉ मटेरियल की कमी ने कमर तोड़ दी है।"
2. डॉलर का 'पचानवे' वाला प्रहार और रुपया
व्यापारी पुष्प जैन, जिनका वेइंग स्केल (तराजू) का बड़ा काम है, एक और गंभीर पहलू की ओर इशारा करते हैं। वह कहते हैं कि डॉलर की कीमत 95 रुपये के करीब पहुँचना भारतीय व्यापारियों के लिए किसी झटके से कम नहीं है।
जो कच्चा माल पहले 90 रुपये के डॉलर भाव पर आता था, अब वह सीधा महंगा हो गया है। पुष्प जैन के मुताबिक, "डॉलर की मूवमेंट सीधे व्यापार को प्रभावित करती है। इम्पोर्ट महंगा होने से हमें मजबूरी में दाम बढ़ाने पड़ते हैं। जब ग्राहक को पता चलता है कि दाम बढ़ गए हैं, तो वह 'कल लेंगे' कहकर लौट जाता है। इससे बिक्री में भारी गिरावट आई है।"
व्यापारिक समीकरण: कौन सी चीज़ कितनी हुई महंगी?
'द दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट एसोसिएशन' के वाइस प्रेसिडेंट लोकेश गोयल का मानना है कि आज की दुनिया में कोई भी देश किसी संकट से अछूता नहीं रह सकता। उनके संगठन का अनुभव बताता है कि पिछले एक महीने में बाज़ार का स्वरूप बदल गया है।
हार्डवेयर और टूल्स: लोहा और स्टील महंगा होने की वजह से इनके दाम 15-20% तक बढ़ गए हैं।
सेनेटरी फिटिंग्स: प्लास्टिक और पेट्रोलियम आधारित उत्पादों की कमी से नल, पाइप और अन्य फिटिंग्स में 25% से ज्यादा का उछाल आया है।
मेटल प्रोडक्ट्स: कच्चे पीतल (ब्रास) और अन्य धातुओं के दाम में प्रति किलो 40 से 50 रुपये तक की वृद्धि देखी जा रही है।
वस्तु का प्रकार कीमतों में वृद्धि (अनुमानित) मुख्य कारण
हार्डवेयर टूल्स 15% - 20% रॉ मटेरियल और ट्रांसपोर्टेशन
सेनेटरी फिटिंग्स 20% - 30% गैस किल्लत और कच्चा माल
मशीनरी और पार्ट्स 25% - 35% डॉलर की मजबूती और कम उत्पादन
वेइंग स्केल/मेटल्स 15% - 20% पीतल स्क्रैप की सप्लाई में रुकावट
सप्लाई चेन का 'पहिया' और रुकी हुई पेमेंट
व्यापार सिर्फ सामान बेचने का नाम नहीं है, यह एक भरोसे और रोटेशन (चक्र) पर चलता है। ललित अग्रवाल समझाते हैं कि युद्ध की वजह से यह चक्र टूट गया है। बाज़ार में पैसा रुक गया है।
"हमारे पास जो कस्टमर आता है, उसकी परचेजिंग पावर (खरीदने की क्षमता) कम हो गई है। अगर उसकी अपनी कमाई कम होगी, तो वह माल कम खरीदेगा। और सबसे बड़ी बात, वह पुरानी पेमेंट तभी कर पाएगा जब उसका अपना माल बिकेगा। आज पेमेंट फंसी हुई हैं, जिससे नया माल मंगाने के लिए व्यापारियों के पास नकदी की कमी हो गई है।"
क्या भारत का लोहा और पीतल संकट में है?
चावड़ी बाज़ार के व्यापारियों का कहना है कि मिडिल-ईस्ट से भारी मात्रा में ब्रास स्क्रैप (पीतल का कबाड़) भारत आता था। यहाँ उसे रिसाइकिल कर नए उत्पाद बनाए जाते थे और फिर वापस एक्सपोर्ट किया जाता था। हॉर्मुज़ के रास्ते पर तनाव होने से न तो पुराना माल आ पा रहा है और न ही यहाँ से तैयार माल बाहर जा पा रहा है।
लोकेश गोयल चेतावनी देते हुए कहते हैं, "अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो इसका दुष्प्रभाव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। अभी सरकार ने पेट्रोलियम की कीमतों को जैसे-तैसे संभाल रखा है, लेकिन अगर वहां से सप्लाई पूरी तरह कट गई, तो पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।"
सरकार से उम्मीदें और व्यापारियों की पुकार
व्यापारी संगठन हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। ललित अग्रवाल का कहना है कि एसोसिएशन के प्रधान बलदेव गुप्ता के नेतृत्व में व्यापारी लगातार पीएमओ (PMO), वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय को ई-मेल भेजकर स्थिति से अवगत करा रहे हैं। उनकी मांग है कि कमर्शियल गैस की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और छोटे उद्योगों को इस संकट से उबारने के लिए विशेष रियायतें दी जाएं।
हालांकि, राकेश जिंदल जैसे कुछ व्यापारी सकारात्मक भी हैं। उनका कहना है कि मार्च का महीना क्लोजिंग का होता है, इसलिए डिमांड बनी रही। लेकिन वे भी मानते हैं कि जो कॉन्ट्रैक्ट पुराने रेट पर साइन हुए थे, उनमें अब भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है क्योंकि कच्चे माल के दाम रातों-रात बढ़ गए हैं।
आपके लिए क्या है इस खबर के मायने?
यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। यह आपकी जेब से जुड़ी हकीकत है। अगर आप घर बनाने का सोच रहे हैं या आपके कारखाने में टूल्स की ज़रूरत है, तो तैयार हो जाइए क्योंकि चावड़ी बाज़ार की गर्मी अब आपकी दहलीज तक पहुँचने वाली है।
ईरान और इज़राइल के बीच की दूरी हज़ारों किलोमीटर हो सकती है, लेकिन दिल्ली के इस बाज़ार की धड़कनें बता रही हैं कि आज का व्यापार सरहदों का मोहताज नहीं है। युद्ध की एक चिंगारी वहां सुलगती है, तो महंगाई का धमाका यहां हमारे बाज़ारों में होता है।
आम पाठक के लिए सुझाव: यह समय समझदारी से खर्च करने और बाज़ार की चाल को समझने का है। 'ग्लोबल वर्ल्ड' में हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं, चाहे वो ईरान का समंदर हो या दिल्ली की ये तंग गलियाँ।
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