यमुना की बदहाली: दिल्ली के 25% सीवेज प्लांट बेकार, आर्थिक सर्वेक्षण का खुलासा
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यमुना की बदहाली: दिल्ली के 25% सीवेज प्लांट बेकार, आर्थिक सर्वेक्षण का खुलासा

दिल्ली में क्षमता होने के बाद भी 210 MGD गंदा पानी सीधे यमुना में गिर रहा है। 67% औद्योगिक उपचार संयंत्र भी ठप। 10 बड़े नालों को अब तक नहीं किया जा सका 'ट्रैप'।


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Delhi's Budget And Yamuna's Cleanliness : दिल्ली विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन सोमवार को पेश किए गए 'दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण 2026' ने यमुना नदी की सफाई को लेकर सरकार के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, दिल्ली के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STP) की कुल क्षमता का 26.4 प्रतिशत हिस्सा आज भी बेकार पड़ा है। इसका सीधा मतलब यह है कि बुनियादी ढांचा उपलब्ध होने के बावजूद भारी मात्रा में अनुपचारित सीवेज (Untreated Sewage) सीधे यमुना नदी में गिर रहा है। यही नहीं, औद्योगिक कचरे को साफ करने वाले कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) की स्थिति और भी भयावह है, जहाँ 67 प्रतिशत क्षमता का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। वजीराबाद से ओखला बैराज के बीच का 22 किलोमीटर का वह हिस्सा, जो दिल्ली के अस्तित्व का आधार है, आज भी प्रदूषण के उच्चतम स्तर और ऑक्सीजन की कमी (Low BOD) से जूझ रहा है।


अंकों का गणित: क्षमता 794 MGD, इलाज सिर्फ 584 MGD का
आर्थिक सर्वेक्षण के तकनीकी आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में वर्तमान में प्रतिदिन 794 मिलियन गैलन (MGD) सीवेज उपचार की कुल क्षमता विकसित की जा चुकी है। लेकिन हकीकत यह है कि केवल 584 MGD सीवेज का ही उपचार किया जा रहा है। प्रतिदिन लगभग 210 MGD गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के यमुना में जहर घोल रहा है। सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक 18 पुराने STPs को अपग्रेड करना और 3 नए प्लांट बनाकर क्षमता को 456 MGD और बढ़ाना है। हालांकि, सर्वेक्षण इस बात पर खामोश है कि मौजूदा खाली पड़ी 26 प्रतिशत क्षमता का उपयोग करने में प्रशासन अब तक विफल क्यों रहा है।

नालों का मायाजाल: 22 में से 10 अब भी 'अनट्रैप्ड'
यमुना प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत दिल्ली के वे 22 बड़े नाले हैं जो सीधे नदी में गिरते हैं। इनमें नजफगढ़ और शाहदरा नाले सबसे प्रमुख हैं। सरकार की योजना इन नालों के पानी को 'इंटरसेप्टर सीवर' के जरिए एसटीपी तक मोड़ना था। रिपोर्ट बताती है कि 22 में से अभी भी 10 नाले, जिनमें तुगलकाबाद, बारापुला, दिल्ली गेट और मोरी गेट शामिल हैं—पूरी तरह अनट्रैप्ड हैं। नजफगढ़ नाले के लिए बिछाए गए इंटरसेप्टर सीवर, जो 242 MGD पानी मोड़ने की क्षमता रखते हैं, सितंबर 2025 में काम पूरा होने के बावजूद अभी तक पूरी तरह चालू (Functional) नहीं हो पाए हैं।

गुलाबी झाग और औद्योगिक कचरे का संकट
पिछले सप्ताह यमुना में देखा गया 'पिंक फ्रोथ' (गुलाबी झाग) रंगाई उद्योगों से निकलने वाले केमिकल का नतीजा था। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, औद्योगिक क्षेत्रों के लिए बने CETPs की 67 प्रतिशत क्षमता का उपयोग न होना यह साबित करता है कि फैक्ट्रियों का कचरा बिना साफ किए ही नदी में बहाया जा रहा है। यमुना के पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (COD) का स्तर इतना खराब है कि वहां जलीय जीवन का पनपना लगभग नामुमकिन है। हैरानी की बात यह है कि इस पूरी रिपोर्ट में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा 2025 में घोषित 9,000 करोड़ रुपये के 'यमुना कायाकल्प प्लान' का कोई विशेष उल्लेख नहीं है।

प्रशासनिक देरी और भविष्य की चुनौतियां
सर्वेक्षण में स्वीकार किया गया है कि कई नालों को मोड़ने के लिए जमीन की पहचान करने की प्रक्रिया अभी भी प्रारंभिक चरण में है। कुछ परियोजनाओं को पूरा करने की समय सीमा 2027 तक बढ़ा दी गई है। दिल्ली जल बोर्ड और अन्य संबंधित एजेंसियां जब तक कोरोनेशन पिलर, रिठाला और कोंडली जैसे मुख्य एसटीपी का पुनर्वास कार्य पूरा नहीं कर लेतीं, तब तक यमुना को उसका पुराना स्वरूप लौटाना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। प्रदूषण मुक्त यमुना का सपना अब 2026 के अंत तक सरकारी फाइलों में सिमटा नजर आ रहा है।


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