दिल्ली यूनिवर्सिटी में ‘परमिशन राज’ पर बवाल, विरोध, आज़ादी और नियंत्रण की टकराहट
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दिल्ली यूनिवर्सिटी में ‘परमिशन राज’ पर बवाल, विरोध, आज़ादी और नियंत्रण की टकराहट

दिल्ली विश्वविद्यालय में विरोध के लिए अनुमति अनिवार्य करने के फैसले पर विवाद बढ़ गया है। शिक्षक-छात्र इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर नियंत्रण मान रहे हैं।


दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) द्वारा परिसर में किसी भी विरोध प्रदर्शन या सभा के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य करने के आदेश पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। शिक्षकों और छात्र संगठनों का कहना है कि यह आदेश पूर्ण प्रतिबंध को हटाकर असहमति को नियंत्रित और चयनात्मक तरीके से सीमित करने की दिशा में कदम है।

यह विवाद उस एक महीने लंबे पूर्ण प्रतिबंध के बाद सामने आया है, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144) के तहत लागू किया गया था। यह प्रतिबंध विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी रेगुलेशन 2026 के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान लगाया गया था। इस आदेश में पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक थी। इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, जहां अदालत ने कहा कि बिना ठोस कारणों के “पूर्ण प्रतिबंध” उचित नहीं है।

‘एक कदम पीछे’

कई शिक्षकों का मानना है कि नया आदेश उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की सचिव आभा देव हबीब ने कहा कि पहले का सर्कुलर “सब कुछ बंद” कर देता था, और वर्तमान आदेश अदालत के हस्तक्षेप के बाद लिया गया कदम है। उन्होंने कहा, “यह भी खराब है, लेकिन यह विश्वविद्यालय का पूर्ण प्रतिबंध से एक कदम पीछे हटना है।”

हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि अनुमति आधारित प्रणाली चयनात्मक हो सकती है। उनके अनुसार, “विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देना है, लेकिन हमने देखा है कि कार्यक्रमों के लिए स्थान देना पहले से ही चयनात्मक हो गया है। अब इसका उपयोग कुछ कार्यक्रमों को रोकने और कुछ को अनुमति देने के लिए किया जा सकता है।”

‘लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला’

एकेडमिक्स फॉर एक्शन एंड डेवलपमेंट टीचर्स एसोसिएशन से जुड़े राजेश झा ने इसे विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक परंपरा से जोड़ा। उन्होंने कहा, “डीयू में हमेशा से शिक्षकों और छात्रों को अभिव्यक्ति का स्थान मिला है। ज्ञान केवल कक्षाओं से नहीं मिलता, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं से भी आता है। यह आदेश सीधे तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला है।”

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) ने भी इस आदेश की आवश्यकता पर सवाल उठाया है। इसके अध्यक्ष वीएस नेगी ने कहा कि विश्वविद्यालय का शैक्षणिक माहौल पहले से ठीक था और ऐसे आदेश अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं।

छात्रों की प्रतिक्रिया

छात्र संगठनों ने भी इसी तरह की चिंता जताई है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने इसे “परमिशन राज” करार देते हुए कहा कि यह प्रगतिशील आवाजों को दबाने की कोशिश है। संगठन ने इसे सामाजिक न्याय और UGC इक्विटी नियमों के खिलाफ चल रहे आंदोलनों से जोड़ते हुए विरोध के अधिकार पर सीधा हमला बताया।

प्रशासन का पक्ष

हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह कदम प्रतिबंधात्मक नहीं बल्कि एहतियाती है। डीयू के प्रॉक्टर मनोज कुमार सिंह ने कहा, “पहले लोग सोशल मीडिया पर बिना अनुमति के कार्यक्रम घोषित कर देते थे। हाल ही में हिंसा की घटनाएं हुई थीं, जिन्हें रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। हमारा उद्देश्य विरोध को रोकना नहीं, बल्कि सभी गतिविधियों का रिकॉर्ड रखना है।”

डूसू की चेतावनी

इस बीच, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के उपाध्यक्ष राहुल झांसला ने इस आदेश को वापस न लेने पर “परिणाम भुगतने” की चेतावनी दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह देश में नरेंद्र मोदी सरकार युवाओं की आवाज दबा रही है, उसी तरह विश्वविद्यालय प्रशासन भी छात्रों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रहा है।

उन्होंने इस आदेश को “तुगलकी और हिटलरशाही” बताते हुए कहा कि यदि इसे वापस नहीं लिया गया तो छात्र संगठन इसका कड़ा विरोध करेंगे।कुल मिलाकर, दिल्ली विश्वविद्यालय का यह नया आदेश एक नई बहस को जन्म देता है—क्या यह कदम परिसर में व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है, या यह छात्रों और शिक्षकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की दिशा में उठाया गया कदम है।

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