Raghotham S

बोइंग डील से टैरिफ तक, भारत की व्यापार नीति पर गहराता विवाद


बोइंग डील से टैरिफ तक, भारत की व्यापार नीति पर गहराता विवाद
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WTO में सख्त रुख के बावजूद अमेरिका संग व्यापार में भारत का रुख नरम दिख रहा है। इसकी वजह से नीति, संप्रभुता और रणनीतिक संतुलन पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल कैमरून में आयोजित विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंत्रीस्तरीय सम्मेलन से लौटे, जहाँ उन्होंने WTO सुधारों और मत्स्य सब्सिडी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारत की स्थिति का मजबूती से बचाव किया। उन्होंने चीन के नेतृत्व वाले निवेश सुविधा विकास समझौते (IFD) को भी रोका, खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण के मुद्दे पर दृढ़ रुख बनाए रखा और ई-कॉमर्स शुल्कों पर कुछ लचीलापन दिखाया।

भारत शायद अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए यूरोपीय संघ के नेतृत्व वाले मल्टी-पार्टी इंटरिम अपील आर्बिट्रेशन अरेंजमेंट (MPIA) में शामिल हो सकता था, जिससे एक व्यापक रणनीतिक समूह का निर्माण होता, जो WTO के गतिरोधपूर्ण विवाद निपटान तंत्र से आगे जाकर महत्वपूर्ण होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुल मिलाकर, बहुपक्षीय मंच पर भारत ने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए कड़ा रुख अपनाया, भले ही उसे खाली हाथ लौटना पड़ा और संभावित निवेश प्रवाह से हाथ धोना पड़ा।

हालाँकि, यही भारतीय सरकार द्विपक्षीय स्तर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्यवहार करते समय नरम पड़ती दिखाई देती है। हाल ही में एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत और अमेरिका एक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के करीब हैं।

भारत की व्यापार रणनीति

अब पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि भारत अमेरिका के साथ एक अंतरिम व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार है, बशर्ते उसे अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहतर टैरिफ दर मिले। मंत्री ने बताया कि फरवरी की शुरुआत में जारी भारत-अमेरिका संयुक्त बयान का यही आधार था।

ट्रंप द्वारा पाकिस्तान को 19 प्रतिशत टैरिफ दर देने के बाद भारत 18 प्रतिशत पर सहमत होने को तैयार दिखा। यह चिंता का विषय है कि सरकार उसी संयुक्त बयान की तर्कशक्ति पर टिके रहना चाहती है, जबकि यह समझौता अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से पहले हुआ था, जिसमें ट्रंप के पारस्परिक टैरिफ को अवैध करार दिया गया।

अदालत के इस फैसले ने देशों को ट्रंप के दबाव का विरोध करने और व्यापार मामलों को फिर से बहुपक्षीय ढाँचे में लाने का अवसर दिया। यूरोपीय संघ ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपने समझौते में कई सुरक्षा उपाय जोड़ दिए।

इनमें ‘सनराइज क्लॉज’ (अमेरिका के अनुपालन से जुड़ी शर्त), ‘सनसेट क्लॉज’ (समझौते की समयसीमा) और ‘एंटी-कोएर्शन क्लॉज’ (दबाव की स्थिति में समझौता निलंबित करने का अधिकार) शामिल हैं। इसके अलावा, यूरोपीय संघ ने अन्य देशों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक वैश्विक व्यापार ढाँचा भी विकसित करना शुरू किया है।

भारत पर अमेरिकी दबाव

इसके विपरीत, भारत ने अमेरिकी अदालत के फैसले से पहले ही एक असंतुलित समझौते को स्वीकार कर लिया था, जिसमें भारतीय निर्यात पर 18 प्रतिशत टैरिफ और पाँच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की प्रतिबद्धता शामिल थी।सरकार इस समझौते को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही थी, लेकिन आलोचकों के अनुसार यह उत्साह समय से पहले और अतिरंजित था।

अदालत के फैसले के बाद भारत को पुनः बातचीत करनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय ट्रंप ने वैश्विक अस्थायी टैरिफ लागू कर दिया और भारत पर अनुचित व्यापार प्रथाओं की जाँच शुरू कर दी। ऐसे माहौल में भी समझौते को आगे बढ़ाना चिंताजनक है।

बोइंग विमानों की खरीद पर सवाल

इस समझौते का सबसे चिंताजनक पहलू 500 अरब डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता को पूरा करने का तरीका है। गोयल ने भारत द्वारा अधिक बोइंग विमानों की खरीद की बात उत्साह से कही।यह उस समय कहा गया जब भारत एक बोइंग 787 विमान दुर्घटना की जाँच कर रहा है, जो भारत और अमेरिका के बीच एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। ऐसे समय में बड़े पैमाने पर खरीद को बढ़ावा देना न केवल अनुचित बल्कि आत्मघाती भी प्रतीत होता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दुर्घटना के लिए पायलट को जिम्मेदार ठहराने का दबाव भी भारत पर डाला जा रहा है, जबकि संकेत मिल रहे हैं कि समस्या विमान के डिजाइन, निर्माण और तकनीकी खामियों से जुड़ी हो सकती है।

FAA की भूमिका पर सवाल

अमेरिकी विमानन नियामक संस्था (FAA) लंबे समय से वैश्विक मानक मानी जाती रही है। लेकिन हाल के वर्षों में बोइंग विमानों की स्वीकृति और प्रमाणन प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ सामने आई हैं।FAA ने कई मामलों में स्वयं बोइंग को ही अपने विमानों का प्रमाणन करने की अनुमति दी, जो हितों के टकराव का स्पष्ट उदाहरण है। 2013 में बैटरी आग की घटनाओं के बाद 787 विमानों को ग्राउंड किया गया था, लेकिन मूल समस्या का समाधान किए बिना उन्हें फिर से सेवा में आने दिया गया।इसी तरह, कई तकनीकी खामियों को लेकर जारी सलाह को अनिवार्य निर्देश के बजाय वैकल्पिक बताया गया, जिससे जोखिम बढ़ गया।

‘अमेरिकी मानकों’ का दबाव

भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में “गैर-टैरिफ बाधाओं” के नाम पर एक महत्वपूर्ण शर्त शामिल है, जिसके तहत भारत को छह महीने के भीतर यह तय करना है कि अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय मानकों को स्वीकार किया जा सकता है या नहीं—और वह भी “सकारात्मक परिणाम” की दिशा में।यह वस्तुतः एक दबाव है कि भारत अमेरिकी मानकों को स्वीकार करे। FAA की विफलताओं को देखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या भारत को विमानन या अन्य क्षेत्रों में अमेरिकी मानकों पर भरोसा करना चाहिए।

यह चिंता केवल विमानन तक सीमित नहीं है—खाद्य, दवा और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी अमेरिकी नियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।भारत को यह समझना होगा कि किसी महाशक्ति के साथ आर्थिक एकीकरण कभी-कभी उसकी अधीनता का कारण बन सकता है।एक ओर, WTO में भारत का कठोर रुख सिद्धांतों की रक्षा करता है, लेकिन दूसरी ओर, अमेरिका के साथ द्विपक्षीय समझौतों में अत्यधिक नरमी रणनीतिक रूप से खतरनाक हो सकती है। अंततः, भारत का यह विरोधाभास स्पष्ट होता है जहाँ उसे कठोर होना चाहिए, वहाँ वह नरम पड़ रहा है, और जहाँ लचीलापन दिखाना चाहिए, वहाँ वह कठोर बना हुआ है।

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