Vivek Katju

अफगानिस्तान पर अटैक : क्या बड़ी रणनीतिक भूल कर रहा है पाकिस्तान?


अफगानिस्तान पर अटैक : क्या बड़ी रणनीतिक भूल कर रहा है पाकिस्तान?
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पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भीषण लड़ाई छिड़ गई है। 26 फरवरी की रात और अगली सुबह तड़के पाकिस्तान ने अफगान राजधानी काबुल, वर्तमान आध्यात्मिक राजधानी कंधार, जहां तालिबान प्रमुख मुल्ला हैबतुल्लाह रहते हैं और पक्तिका पर बमबारी की। पाकिस्तान ने केवल सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि रिहायशी इलाकों को भी निशाना बनाया। पाकिस्तानी हमलों से हुए नुकसान की पूरी जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है। साथ ही, किसी वरिष्ठ तालिबान नेता के मारे जाने की भी कोई खबर नहीं है।

इस दौर की तीव्र लड़ाई की शुरुआत 22 फरवरी को पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा ड्यूरंड रेखा के आसपास और उसके पार अफगानिस्तान में सत्रह स्थानों पर बमबारी से हुई। पाकिस्तान ने दावा किया कि यह कार्रवाई पिछले कुछ हफ्तों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी; जिसे पाकिस्तान अब ‘फितना अल खवारिज’ कहता है) द्वारा किए गए आत्मघाती हमलों के जवाब में की गई। पाकिस्तान अक्सर यह आरोप लगाता है कि टीटीपी को भारत का समर्थन प्राप्त है और अफगान अधिकारियों पर उसे काबू में न रखने का आरोप लगाता है। पाकिस्तानी बमबारी में कई महिलाओं और बच्चों की मौत हुई।

दो दिन पहले काबुल ने ड्यूरंड रेखा पर स्थित पाकिस्तानी चौकियों पर भारी हथियारों से जवाबी गोलीबारी की। उसने दावा किया कि पाकिस्तानी बलों को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। हालांकि, पाकिस्तान ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि उसकी सेना ने अफगान बलों को भारी क्षति पहुंचाई है।

क्या यह आंख के बदले आंख वाली लड़ाई दोनों देशों की सेनाओं के ड्यूरंड रेखा पार करने तक बढ़ सकती है? पाकिस्तानी पक्ष की ओर से काफी आक्रामक बयानबाजी देखने को मिल रही है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 27 फरवरी को कहा, “हमारे सब्र का प्याला भर चुका है। अब यह हमारे और आपके (अफगानिस्तान) बीच खुला युद्ध है।”

हालांकि, ख्वाजा आसिफ अपने तीखे बयानों के लिए जाने जाते हैं और उनके शब्दों को पाकिस्तान में युद्ध और शांति का अंतिम फैसला लेने वाले सैन्य जनरलों की सोच का सटीक संकेत नहीं माना जा सकता। दरअसल, उनके बयान हताशा का संकेत अधिक हैं। उन्हें नागरिक सरकार भी गंभीरता से नहीं लेती। निश्चित रूप से ये पाकिस्तान की वास्तविक मंशा और नीति का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

अफगानिस्तान के प्रति पाकिस्तान के रुख को अधिक संतुलित ढंग से पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने व्यक्त किया।

26 फरवरी को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता ने एक मीडिया ब्रीफिंग में अफगानिस्तान के प्रति पाकिस्तान के रुख को लेकर कहा, “जहां तक पाकिस्तान की सैन्य प्रतिक्रिया का सवाल है, हम आत्मरक्षा के अपने अधिकार का उपयोग करते हुए त्वरित और कड़ी प्रतिक्रिया देंगे। यह संदेश सभी अंतरराष्ट्रीय पक्षकारों तक पहुंचा दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, अन्य विदेशी सरकारों और संस्थाओं को विश्वास में लेने के संबंध में हमारी दो स्तरों पर बातचीत होती है। पहला, द्विपक्षीय संपर्क के माध्यम से-विशेष रूप से अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों के साथ, जिनके साथ हमारे द्विपक्षीय या त्रिपक्षीय संवाद तंत्र मौजूद हैं। इन मुद्दों को वहां उठाया जाता है। दूसरा, जैसा कि आप जानते हैं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद-रोधी समितियां-अल-कायदा और तालिबान प्रतिबंध समिति-भी इस मामले पर विचार कर रही हैं। यह मुद्दा वहां नियमित रूप से उठाया जाता है। आप सुरक्षा परिषद में दिए गए हमारे बयानों का अनुसरण कर सकते हैं। हम अफगान धरती से खुलकर और दंडमुक्ति के साथ काम कर रहे इन आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हैं।"

प्रवक्ता ने आगे कहा," जहां तक बातचीत (संवाद) के सवाल का संबंध है, मुझे किसी औपचारिक संरचित संवाद की जानकारी नहीं है। लोगों के आपसी संबंधों के मामले में, हमें अफगान जनता से कोई आपत्ति नहीं है। विवाद का मुद्दा वे आतंकवादी संगठन हैं जो अफगानिस्तान में सक्रिय हैं और जिन्हें आधिकारिक समर्थन तथा दंडमुक्ति मिल रही है। अफगान जनता के प्रति हमारे मन में सम्मान है और हमारे उनके साथ पारंपरिक, ऐतिहासिक और भाषाई संबंध हैं। हम अफगान लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते।”

लेखक ने जानबूझकर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान को विस्तार से उद्धृत किया है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान वैश्विक समुदाय को यह समझाने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है कि वह अफगानिस्तान के प्रति एक संतुलित नीति अपना रहा है।

पाकिस्तान अपने साझेदार देशों और अन्य पक्षों के साथ संपर्क में है ताकि यह विश्वास दिला सके कि अफगानिस्तान के खिलाफ उसका बल प्रयोग उचित है और अफगान तालिबान पाकिस्तान में हमले करने के लिए अफगान धरती से सक्रिय आतंकवादी समूहों को समर्थन दे रहे हैं। स्पष्ट है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से काबुल पर दबाव बढ़ाने की मांग कर रहा है।

हालांकि, यह संभावना कम है कि प्रमुख वैश्विक शक्तियां पाकिस्तान के कहने पर तालिबान से दूरी बना लेंगी। वे अफगान तालिबान को टीटीपी की गतिविधियां रोकने के लिए समझाने की कोशिश कर सकती हैं, लेकिन उससे आगे नहीं बढ़ेंगी। वे जानती हैं कि अफगान तालिबान अपने तरीके से चलते हैं और दबाव स्वीकार नहीं करते, खासकर टीटीपी के मामले में, जिसे वे अपने ही ढांचे का हिस्सा मानते हैं।

अगर पाकिस्तान यह सोच रहा है कि सिर्फ हवाई हमले करके वह तालिबान पर इतना दबाव बना देगा कि वे टीटीपी को उसके हवाले कर दें या उनकी गतिविधियां बंद कर दें, तो यह उसकी गलतफहमी है। यानी केवल बमबारी से तालिबान झुक जाएंगे, ऐसा मानना हकीकत को ठीक से न समझना है।

क्या फील्ड मार्शल आसिम मुनीर अफगानिस्तान में जमीनी सैनिक भेजेंगे? पाकिस्तान सेना ने अतीत में रणनीतिक गलतियां की हैं- कारगिल इसका प्रमुख उदाहरण है। यदि वह अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजती है तो यह भी वैसी ही गलती होगी।

मुनीर यह सोच सकते हैं कि अफगान तालिबान केवल पाकिस्तान के समर्थन के कारण ही अमेरिका का मुकाबला कर सके और उसके बिना वे पराजित हो जाते। इसलिए अब जब उन्हें कोई विदेशी समर्थन नहीं है, तो वे पाकिस्तान का सामना नहीं कर पाएंगे। यह सच है कि पाकिस्तान के समर्थन के बिना अफगान तालिबान अमेरिका को नहीं हरा पाते। लेकिन पाकिस्तान, अमेरिका नहीं है।

इसके अलावा, पश्तून समुदाय के मन में पंजाबियों के प्रति गहरी शंकाएं हैं और पाकिस्तान सेना को मुख्यतः पंजाबी सेना माना जाता है। इसलिए यदि पाकिस्तानी सेना अफगानिस्तान में घुसपैठ करती है, तो उसे तीव्र और उग्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।

संभावना यही है कि पाकिस्तान ड्यूरंड रेखा के पार गोलीबारी जारी रखेगा और अफगान शहरों पर बमबारी करेगा। इसका तालिबान पर बहुत अधिक असर पड़ने की संभावना नहीं है। उल्टा, इससे वे टीटीपी को और अधिक खुली छूट दे सकते हैं।

पाकिस्तान ने तीन दशकों से अधिक समय तक भारत के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल किया है। अब वह स्वयं टीटीपी द्वारा छेड़े गए असामान्य (गुरिल्ला) युद्ध का सामना कर रहा है। हालांकि, इससे यह संभावना नहीं है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद का सहारा लेना छोड़ देगा।

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