T K Arun

संदेह का लाभ मतदाता को मिलना चाहिए, चुनाव आयोग को नहीं


संदेह का लाभ मतदाता को मिलना चाहिए, चुनाव आयोग को नहीं
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले कोलकाता में एक दुकानदार अपनी दुकान पर TMC और CPM के झंडे प्रदर्शित करता हुआ।
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आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने की इच्छा रखने वाले करीब 60 लाख बंगाली मतदाता अब भी इस अनिश्चितता में हैं कि वे 23 या 29 अप्रैल को मतदान कर पाएंगे या नहीं। उनकी पात्रता अभी जांच के अधीन है।

भारत की न्यायिक व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है। यह सिद्धांत सही है और इसे उन लोगों पर भी लागू होना चाहिए जिनकी मतदाता पात्रता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। जब तक उनकी अपात्रता के संदेह के ठोस आधार साबित न हो जाएं, उन्हें पात्र माना जाना चाहिए। संदेह का लाभ मतदाता को मिलना चाहिए।

चुनाव आयोग का स्वच्छ मतदाता सूची बनाए रखने पर जोर देना बिल्कुल सही है। लेकिन यह काम सालभर लगातार चलने वाली प्रक्रिया होना चाहिए, न कि चुनाव से ठीक पहले अचानक शुरू किया जाने वाला अभियान।

मतदाता सूची संशोधन एक सतत प्रक्रिया होनी चाहिए

मतदाता सूची में संशोधन का काम निरंतर होना चाहिए और पृष्ठभूमि में चलता रहना चाहिए। इसमें जन्म-मृत्यु के पंजीकरण, आधार में पते में बदलाव, राशन कार्ड के स्थानांतरण, वाहन पंजीकरण और ट्रांसफर, मनरेगा में अनुपस्थिति, पेंशन निकासी बंद होना जैसी सूचनाओं को जोड़कर विश्लेषण किया जा सकता है।

आज तकनीक के जरिए इन सभी आंकड़ों को इकट्ठा कर विश्लेषित करना संभव है। जैसे आयकर विभाग किसी व्यक्ति की आय, खर्च, बचत, पूंजीगत लाभ और नुकसान आदि का समग्र विश्लेषण कर उसकी कर देनदारी का आकलन करता है, वैसे ही चुनाव आयोग भी डेटा का बेहतर उपयोग कर सकता है।

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जो यूनिक पहचान प्रणाली पर आधारित है, आज गर्व का विषय बन चुका है—हालांकि शुरुआत में कई नेताओं और अधिकारियों ने इसका विरोध किया था। लेकिन इसका उद्देश्य केवल राजनीतिक प्रचार नहीं, बल्कि बेहतर शासन में मदद करना है।

अगर चूक हुई है, तो दोष मतदाता का नहीं

यदि चुनाव आयोग सालभर अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूक करता है और चुनाव से ठीक पहले बड़े पैमाने पर मतदाता सूची सुधार अभियान शुरू करता है, तो इसका खामियाजा मतदाताओं को नहीं भुगतना चाहिए।

क्या इसका मतलब यह है कि हम निगरानी (surveillance) राज्य की वकालत कर रहे हैं? बिल्कुल नहीं। एक आधुनिक राज्य अपने नागरिकों के बड़े डेटा का उपयोग जनहित के लिए करता है।

उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम में सरकारी प्रयोगशालाएं सीवेज की नियमित जांच करती हैं ताकि नए रोगजनकों का पता लगाया जा सके। इससे यह भी जानकारी मिलती है कि किन क्षेत्रों में किस प्रकार के नशीले पदार्थों का कितना उपयोग हो रहा है। यह सब बेहतर स्वास्थ्य और जनकल्याण के लिए किया जाता है, न कि नियंत्रण या दमन के लिए।

डेटा-आधारित प्रशासन और निगरानी (surveillance) के बीच अंतर क्या है, यह एक अलग विषय है; यहां इतना समझना पर्याप्त है कि मंशा, निगरानी तंत्र और जनता के प्रति जवाबदेही ही अच्छे शासन और निगरानी राज्य के बीच की रेखा तय करते हैं।

यदि चुनाव आयोग (EC) सालभर सक्रिय नहीं रहा और चुनाव से ठीक पहले अचानक जागकर मतदाता सूची को साफ करने का अभियान शुरू करता है—वह भी अपनी प्रशासनिक क्षमता से अधिक बड़े स्तर पर—तो इसका दोष मतदाताओं पर नहीं डाला जा सकता।

क्या भारत में मतदान का अधिकार किस्मत के भरोसे होना चाहिए? चुनाव आयोग की अपनी चूकों के कारण मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित करना उतना ही अनुचित है, जितना औद्योगिक क्रांति के दौरान विकसित देशों द्वारा किए गए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का असर आज विकासशील देशों के गरीबों पर पड़ रहा है—जहां जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं और उनका जीवन प्रभावित हो रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स में मतदाता पात्रता पर संदेह के जो कारण सामने आ रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। उदाहरण के तौर पर, एक मुस्लिम दंपति—दोनों शिक्षक—ने 1980 के दशक में अपनी बेटी का नाम “अमृता प्रियदर्शिनी” रखा। मतदाता सूची की जांच करने वाले सॉफ्टवेयर ने इसे उपनाम (surname) में असंगति मानकर संदिग्ध मामला मान लिया और नाम जांच सूची में डाल दिया।

जब यह मामला जांच में आएगा, तो भ्रम दूर हो जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच उस समय से पहले हो पाएगी, जब मतदाता सूची को अंतिम रूप देना जरूरी है—यानी नामांकन की अंतिम तिथि से पहले? यह पूरी तरह किस्मत पर निर्भर है।

क्या भारत में मतदान का अधिकार सॉफ्टवेयर की कमजोरी और प्रशासनिक उदासीनता पर निर्भर होना चाहिए? यह मानने में क्या कठिनाई है कि संदेह का लाभ मतदाता को मिलना चाहिए?

उद्देश्य-आधारित नागरिकता जैसी कोई चीज नहीं

क्या चुनाव आयोग को गैर-नागरिकों को मतदान की अनुमति देनी चाहिए? बिल्कुल नहीं। यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह ठोस शिकायत मिलती है कि वह विदेशी है और किसी तरह मतदाता सूची में शामिल हो गया है, तो चुनाव आयोग को जांच करनी चाहिए। जांच के आधार पर या तो आपत्ति खारिज की जाए या उस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाए।

किसी की नागरिकता स्थापित करना या उस पर विवाद करना चुनाव आयोग का काम नहीं है। यहां भी “दोषी साबित होने तक निर्दोष” का सिद्धांत ही मार्गदर्शक होना चाहिए।

देश के बहुत कम राज्यों में प्रशासनिक व्यवस्था इतनी विकसित है कि कोई व्यक्ति बिना परेशानी के अपनी नागरिकता साबित करने के लिए भरोसेमंद दस्तावेज पेश कर सके। आज भी स्थिति यही है। किसी मतदाता की पात्रता तय करने के लिए अक्सर उसके वंश (lineage) से जुड़े पुराने और कई बार दस्तावेज़हीन रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती है। न तो चुनाव आयोग और न ही उसके लिए प्रतिनियुक्त (deputation) पर आए अधिकारी इतने जटिल और लंबे समय तक फैली जांच करने में सक्षम हैं।

चुनाव आयोग का यह कहना कि वह केवल मतदान के उद्देश्य से नागरिकता तय करता है—यह तर्क भी सही नहीं है। आयोग का काम किसी भी उद्देश्य के लिए नागरिकता तय करना नहीं है। यदि किसी व्यक्ति के गैर-नागरिक होने के ठोस प्रमाण सामने आते हैं, तो आयोग को उस आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन किसी की नागरिकता स्थापित करना उसकी सीमा और क्षमता दोनों से बाहर है।

और “उद्देश्य-आधारित नागरिकता” जैसी कोई चीज नहीं होती। कोई व्यक्ति या तो नागरिक है या नहीं है। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति मतदान के लिए गैर-नागरिक माना जाए, लेकिन सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए नागरिक हो।

शेक्सपियर के नाटक The Merchant of Venice का पात्र शाइलॉक यह मान बैठा था कि वह अपना “एक पौंड मांस” ले सकता है और इससे होने वाले खून-खराबे की कोई परवाह नहीं करेगा। लेकिन अंततः वह सफल नहीं हुआ।

क्या चुनाव आयोग भी इसी तरह जनता के मतदान अधिकार पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को नजरअंदाज करते हुए बेहतर परिणाम की उम्मीद कर सकता है?

(यह लेख लेखक के विचार हैं। इसमें व्यक्त जानकारी, सोच या राय संबंधित लेखक की है और जरूरी नहीं कि प्रकाशक उनसे सहमत हो।)

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