
बिहार चुनाव 2025 में SIR, रिश्वतनुमा योजनाओं और चुनाव आयोग की निष्क्रियता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। नतीजे चौंकाने वाले और चिंताजनक रहे।
हाल ही हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों को चकित करने वाला कहना आसान है। एनडीए की जीत को इसी तरह परिभाषित किया जा सकता है, लेकिन यह एक सतही, शाब्दिक व्याख्या भर होगी जो पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। इससे उस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की समझ नहीं बढ़ती, जो आने वाले समय में देश की राजनीति पर गहरा असर डाल सकता है।
जमीनी माहौल और जनता के मूड को देखते हुए यह नतीजा लोगों के लिए चौंकाने वाला था। चुनाव से पहले का माहौल इतना स्पष्ट नहीं था और कई राजनीतिक विश्लेषक इस मुकाबले को बेहद कड़ा मान रहे थे। पत्रकार भी कह रहे थे कि नतीजा बताना मुश्किल है, खासकर इसलिए क्योंकि इस चुनाव में SIR लागू किया गया था, जिसका असर किसी को नहीं मालूम था।
नीतीश की सरकार में नैतिक पतन
यह बात भी साफ थी कि बिहार की आम जनता गहरी आर्थिक परेशानियों से गुजर रही है। पिछले एक दशक में नीतीश कुमार के शासन में जीवन की स्थितियां बहुत खराब हुई हैं और इस गिरावट में नैतिक पतन का तत्व भी दिखाई देता है। चुनाव प्रक्रिया ने भारत की राजनीति को पीछे धकेला है। बिहार भारत का एक बड़ा राज्य है। आबादी, क्षेत्रफल और इतिहास तीनों ही मायनों में। यह वही राज्य है जिसका देश की स्वतंत्रता संग्राम में विशेष योगदान रहा है। इसी बिहार में मतदाताओं को खुलेआम रिश्वत देने, वह भी मतदान के दौरान, जैसी घटनाएँ हुईं—जो कई बनाना रिपब्लिक को भी शर्मिंदा कर दें।भारतीय चुनावों के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं सुना गया था।
लोकतंत्र बचाने की पुकार
बिहार चुनाव की प्रक्रिया को एक तरह से लोकतंत्र को बचाने की पुकार कहा जा सकता है। कई देशों में जब सत्ताधारी अहंकार में सीमा पार कर जाते हैं, तो चुनावों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी जरूरी हो जाती है। भारत वहां नहीं पहुंचा है, बिहार भी नहीं लेकिन अगर बिहार एक स्वतंत्र गणराज्य होता, तो इस बार की चुनावी प्रक्रिया निश्चित रूप से लोकतांत्रिक मानकों पर खरी नहीं उतरती।
क्या सुप्रीम कोर्ट SIR को बरकरार रखेगा?
यह संभावना अधिक है कि सर्वोच्च न्यायालय SIR को लागू रहने देगा—क्योंकि बिहार में इसे अनुमति दी जा चुकी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अदालत बिहार के अनुभव के नकारात्मक पहलुओं को ध्यान में रखेगी? SIR के जरिए मतदाता सूची में भारी बदलाव और लाखों नामों की कटौती ने एक राष्ट्रीय खतरे का संकेत दिया है—जो दूसरे राज्यों में भी दोहराया जा सकता है।
चुनाव आयोग ने आंखें मूंद लीं
बिहार चुनाव एनडीए के लिए कोई माइनफील्ड नहीं था। बीजेपी और जेडीयू सत्ता में थे, और वे खुलेआम मतदाताओं को चुनाव अवधि के दौरान नकद लाभ योजनाएं देकर चुनाव को प्रभावित कर रहे थे। चुनाव आयोग ने सब देखा और नजरअंदाज कर दिया। ऐसा भी नहीं कि SIR लागू करके उन्हें पूरा भरोसा हो गया था। इसके बाद भी नीतीश सरकार ने बड़े पैमाने पर रिश्वतनुमा योजनाएं चलाईं। चुनाव तिथियों की घोषणा से 4 हफ्ते पहले पेंशन बढ़ाई गई, बिजली बिल एक सीमा तक मुफ्त किया गया, युवाओं के लिए प्रोत्साहन राशि और सबसे प्रभावशाली—महिला उद्यमिता योजनाजिसमें 10,000 रुपये सीधे खातों में डाले गए, वह भी चुनाव घोषणा से सिर्फ 3 दिन पहले। इसका असर करोड़ों महिला वोटरों पर स्वाभाविक रूप से पड़ा।
2010 और 2025 का अंतर
2010 में भी एनडीए ने बिहार में 206 सीटें जीती थीं। लेकिन तब किसी ने नतीजे पर सवाल नहीं उठाया। 2025 में SIR पहली बार लागू हुआ, और इसलिए इसका भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुप्रीम कोर्ट में SIR पर सुनवाई जारी
ADR और अन्य संगठनों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट SIR की वैधता पर सुनवाई कर रहा है। फिर भी, हाल के समय में जनता का उच्च न्यायपालिका पर भरोसा थोड़ा डगमगाया है क्योंकि अदालतें सरकार की संवेदनशीलताओं को लेकर अधिक सतर्क दिखती हैं।
बिहार में SIR पूरी तरह पक्षपाती रहा
SIR को लागू करने में कई गंभीर गड़बड़ियाँ सामने आईं। BLO घर-घर जाकर सत्यापन नहीं कर रहे थे, जबकि नियम यही था। फॉर्म्स कार्यालयों में बैठकर भरे जा रहे थे, जैसा कि पत्रकार अजीत अंजुम ने बताया। इसके लिए उनके खिलाफ FIR भी दर्ज कराई गई। कई BLO राजनीतिक दलों—खासकर बीजेपी से जुड़े थे, जिससे डाटा पक्षपाती हो गया।
क्या सुप्रीम कोर्ट इन वास्तविकताओं को देखकर SIR पर पुनर्विचार करेगा?
ECI ने सरकार के निर्देश पर “मिशन मोड” में काम किया। 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री ने “घुसपैठियों की पहचान” की बात कही और सिर्फ दो हफ्तों के अंदर ECI ने SIR स्कीम की घोषणा कर दी और सिर्फ एक महीने में पूरा भी कर दिया। यह एक स्वतंत्र संस्था का नहीं, बल्कि शासन के आदेशों पर चलने वाली इकाई का व्यवहार था।
SIR राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू—बिना कानूनी आधार के
मतदाता सूची अपडेट करने के लिए पहले से ही Special Summary Revision मौजूद है।ऐसे में SIR जैसी नई प्रक्रिया की कानूनी आवश्यकता नहीं थी फिर भी इसे राष्ट्रीय स्तर पर थोप दिया गया। ECI का कहना है कि किसी भी मतदाता ने शिकायत नहीं की। लेकिन ग्रामीण, गरीब क्षेत्रों में लोग शिकायत दर्ज करवाने की स्थिति में होते ही कहाँ हैं? अक्सर वे मतदान केंद्र पर नाम गायब मिलने के बाद चुपचाप घर लौट जाते हैं।
भारत का चुनाव आयोग अब दुनिया की ईर्ष्या नहीं रहा
1990 और 2000 के दशक में भारत का चुनाव आयोग दुनिया में सबसे सम्मानित संस्थाओं में था।लेकिन दिसंबर 2023 में कानून बदलकर CJI को चयन समिति से हटाया गया और ECI सरकार के सीधे नियंत्रण में आ गया। अब आयोग की नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री के अधीन हैं। इससे आयोग की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंची है।
‘अतिरिक्त 3 लाख मतदाता’ और बैलेट स्टफिंग का शक
SIR पूरा होने के बाद CEC ने कहा कि 7.42 करोड़ मतदाता योग्य पाए गए। लेकिन मतदान के समय 7.45 करोड़ मतदाता सूची में थे। ये 3 लाख अतिरिक्त नाम आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किए गए। सरकार के PIB ने चुनाव आयोग की जगह मीडिया को ये आंकड़ा बताया। जो ECI–GOI के अस्वस्थ गठजोड़ का संकेत है।
बिहार चुनाव न सिर्फ एक राज्य का चुनाव था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की दिशा को दिखाने वाली एक चेतावनी भी था। SIR, सरकारी हस्तक्षेप, चुनाव आयोग की निष्क्रियता, और खुलेआम रिश्वत इन सबने चुनाव प्रक्रिया को गंभीर रूप से दूषित किया है।
(जारी रहेगा…)
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