Nilanjan Mukhopadhyay

कांग्रेस पर वार और सहयोगियों पर चुप्पी, वंशवाद पर भाजपा का दोहरा राग


कांग्रेस पर वार और सहयोगियों पर चुप्पी, वंशवाद पर भाजपा का दोहरा राग
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अजित पवार की मृत्यु के बाद भारतीय राजनीति में वंशवाद और पितृसत्ता की सच्चाई सामने आती है, जहां भाजपा का विपक्ष पर हमला उसके अपने सहयोगियों से टकराता है।

पिछले सप्ताह अजित पवार की दुखद मृत्यु के बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय राजनीति के दो पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं। पहला ऐसा विषय है, जिस पर भाजपा और उसके नेता परस्पर विरोधी कथा या अभियान चलाते रहे हैं। दूसरा वह मुद्दा है, जिस पर भारतीय समाज सामूहिक रूप से इनकार की स्थिति में बना हुआ है।

जब भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए अपना अभियान शुरू किया था, तब कांग्रेस पार्टी पर लगाए गए प्रमुख आरोपों में से एक यह था कि वह एक वंशवादी (डायनेस्टी) पार्टी है। कांग्रेस के कई सहयोगी दलों और अन्य विपक्षी दलों पर भी इसी तरह के आरोप लगाए गए। वंशवाद के खिलाफ अभियान आज भी भाजपा द्वारा अपने विरोधियों को घेरने का एक केंद्रीय मुद्दा बना हुआ है।

भाजपा के वंशवादी सहयोगी

भाजपा अपने उन सहयोगी दलों के बारे में उल्लेखनीय रूप से चुप रहती है, जो उसी तरह वंशवादी हैं, जैसे आरोप वह कांग्रेस पर लगाती है। यानी जिनकी नेतृत्व संरचना एक ‘परिवार’ के हाथों में केंद्रित है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मेरी राय में, भले ही मल्लिकार्जुन खड़गे अक्टूबर 2022 से कांग्रेस अध्यक्ष हैं, लेकिन सत्ता संतुलन गांधी परिवार की ओर झुका हुआ है; कोई भी महत्वपूर्ण फैसला खड़गे अकेले नहीं लेते।

इससे इतर, भाजपा के ‘वंशवादी सहयोगियों’ की सूची अपने आप में दिलचस्प है। तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी): एन. चंद्रबाबू नायडू पार्टी के संस्थापक एनटी रामाराव के दामाद थे। अब उनके बेटे नारा लोकेश आंध्र प्रदेश में कई अहम विभागों के मंत्री होने के साथ-साथ पार्टी के महासचिव भी हैं।

लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी): रामविलास पासवान द्वारा स्थापित इस पार्टी की विरासत उनके निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान ने अपने चाचा पशुपति कुमार पारस के साथ कड़वे संघर्ष के बाद संभाली। 2021 में पार्टी विभाजित हुई — पशुपति राष्ट्रीय एलजेपी के प्रमुख बने और चिराग एलजेपी (रामविलास) के। चिराग अब केंद्रीय मंत्री भी हैं।

राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी): पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह द्वारा स्थापित पार्टी अब उनके बेटे जयंत चौधरी द्वारा संचालित है, जो केंद्रीय मंत्री और मई 2021 से पार्टी अध्यक्ष भी हैं।

जनता दल (सेक्युलर): पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा द्वारा स्थापित इस पार्टी में उनके बेटे एच.डी. कुमारस्वामी केंद्रीय मंत्री और राज्य अध्यक्ष हैं, जबकि 1999 से देवगौड़ा स्वयं पार्टी अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य बने हुए हैं। कुमारस्वामी के बेटे निखिल देवगौड़ा कई बार सांसद और विधायक बनने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन सफल नहीं हुए।

अपना दल (सोनेलाल): 1995 में सोनेलाल पटेल द्वारा स्थापित इस पार्टी की कमान 2009 में उनके निधन के बाद उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल ने संभाली। वे अब केंद्रीय मंत्री और पार्टी अध्यक्ष हैं।

पट्टाली मक्कल काची (पीएमके): 1989 में एस. रामदास द्वारा स्थापित यह पार्टी अब उनके ‘अलग रह रहे’ बेटे अंबुमणि रामदास द्वारा चलाई जा रही है, जो पहले केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।

एनसीपी में पारिवारिक शासन

ऊपर दी गई सूची में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) शामिल नहीं है, जबकि वह भी एक वंशवादी पार्टी है। 1999 में शरद पवार द्वारा स्थापित इस पार्टी में उन्होंने लगभग दो दशक पहले ही अपने भतीजे अजित पवार को राजनीति में आगे बढ़ाया था। शुरुआत में अजित पवार को उत्तराधिकारी माना जा रहा था, लेकिन जब शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले की ओर झुकाव बढ़ा, तो अजित पवार ने पार्टी से अलग राह चुन ली।

भाजपा अपने वंशवादी सहयोगियों पर चुप रहती है, जबकि कांग्रेस पर वही आरोप लगाती है। अजित पवार की मृत्यु के बाद भी पार्टी वंशवादी ही बनी रही, क्योंकि वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद नेतृत्व उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को सौंप दिया गया।

भाजपा और वंशवाद

भाजपा का यह दावा कि केवल विपक्षी दल ही वंशवादी हैं, दो कारणों से कमजोर पड़ता है। पहला, भाजपा के पास देशभर में वंशवादी सहयोगी दलों की लंबी सूची है। दूसरा, हाल ही में उसने स्वयं एक वंशवादी नेता को अपना नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया। निश्चित रूप से नितिन नवीन अप्रैल 2006 में विधायक नहीं बनते, यदि उनके पिता जो पटना पश्चिम सीट से मौजूदा विधायक थे का अचानक निधन न हुआ होता।

भाजपा में नितिन नवीन अकेले वंशवादी नहीं हैं। केंद्रीय मंत्रिपरिषद में भी कई ऐसे उदाहरण हैं:

पीयूष गोयल (जिनके पिता वी.पी. गोयल भाजपा के कोषाध्यक्ष थे), ज्योतिरादित्य सिंधिया (एक राजनीतिक और शाही परिवार से), राव इंद्रजीत सिंह (पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री राव बीरेंद्र सिंह के पुत्र), जितिन प्रसाद (पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र प्रसाद के पुत्र), कीर्ति वर्धन सिंह (पूर्व सांसद के पुत्र), और रक्षा खडसे (पूर्व भाजपा नेता एकनाथ खडसे की बहू)।

भारतीय राजनीति में वंशवाद: एक पुरानी कहानी

भारतीय राजनीति में वंशवाद कोई नई बात नहीं है। स्वतंत्रता से पहले भी कई राष्ट्रवादी नेताओं के बच्चे राजनीति में आए। स्वतंत्रता के बाद, रियासतों के विलय के साथ, कई शाही परिवारों के वंशज राजनीति में सक्रिय हुए।

राजनीतिक वैज्ञानिकों के लिए वंशवाद लंबे समय से अध्ययन का विषय रहा है। पैट्रिक फ्रेंच, कंचन चंद्रा और रोमेन कारलेवां जैसे विद्वानों के शोध बताते हैं कि 2009–14 की 15वीं लोकसभा में लगभग 30 प्रतिशत सांसद राजनीतिक वंश से थे। भाजपा के 2014 के अभियान के बावजूद, संसद में वंशवादी सांसदों की संख्या में मामूली ही गिरावट आई, और उनमें सबसे बड़ा हिस्सा भाजपा का ही था।

पितृसत्ता और ‘प्रतिनिधि’ महिलाएं

अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी में सुनेत्रा पवार का उभार भारतीय राजनीति की एक असहज सच्चाई को उजागर करता है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था का वर्चस्व। किसी नेता की विधवा को उसके स्थान पर बैठाना उसकी राजनीतिक क्षमता की मान्यता नहीं, बल्कि पुरुष-प्रधान सोच का विस्तार है। 1990 के दशक में पंचायत राज में महिला आरक्षण के बाद भी कई जगह महिलाओं को केवल ‘डमी’ के रूप में आगे किया गया, जबकि वास्तविक सत्ता पुरुषों के हाथ में रही।

भाजपा कांग्रेस पर सोनिया गांधी के नेतृत्व को लेकर वंशवाद का आरोप लगाती है, लेकिन स्वयं उसने 2024 में सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी स्वराज को टिकट देकर वही रास्ता अपनाया। सच यह है कि भारतीय राजनीति में वंशवाद और पितृसत्ता गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं। चाहे वह किसी भी पार्टी में क्यों न हो।

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