Nilanjan Mukhopadhyay

बीजेपी क्यों बदलती है जगहों के नाम? ध्यान भटकाने की कोशिश या इतिहास मिटाने की रणनीति


बीजेपी क्यों बदलती है जगहों के नाम? ध्यान भटकाने की कोशिश या इतिहास मिटाने की रणनीति
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भाजपा द्वारा किए गए वादों को पूरा करने की कोशिश करने के बजाय कई विधायकों और एक मंत्री ने इलाकों का नाम बदलने के अभियान को प्राथमिकता दी है.

हिंदुत्व बलों द्वारा उत्तर और पश्चिम भारत में इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देने के लिए एक नया और संगठित अभियान शुरू किया गया है. इस अभियान का एक प्रमुख हिस्सा विभिन्न स्थानों और स्थलों के नाम बदलने की योजना है. इस प्रयास का उद्देश्य आम जनता का ध्यान मौजूदा और रोजमर्रा की चुनौतियों से हटा कर एक नया विवाद खड़ा करना है, जिससे लोग गुस्से में आकर एक वैकल्पिक मुद्दे पर ध्यान केंद्रित कर सके.

हाल ही में कुछ घटनाएं, जैसे कि हिंदू पर्व होली के दौरान मुसलमानों को दोपहर तक अपने घरों में रहने के लिए मजबूर किया जाना और शुक्रवार को मस्जिदों में नमाज पढ़ने में देरी, कई शहरों को हिंसा की कगार पर ले आईं. इसके अतिरिक्त, मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की कब्र को उखाड़ने को लेकर भी विवादों ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है. हालांकि, इन घटनाओं के बावजूद "नाम बदलने का अभियान" पहले से ही चल रहा था और अब और तेज़ हो गया है.

दिल्ली में नामकरण की राजनीति

दिल्ली में, जहां भाजपा ने 27 वर्षों के बाद अपनी राजनीतिक वापसी की है, पार्टी के नेताओं ने अपने चुनावी वादों के बजाय, कई इलाकों के नाम बदलने पर ध्यान केंद्रित किया है. दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग (PWD) मंत्री और भाजपा नेता प्रवेश साहिब सिंह ने हाल ही में घोषणा की कि वह तालकटोरा स्टेडियम का नाम बदलकर भगवान महर्षि वाल्मीकि स्टेडियम रखने का प्रस्ताव करेंगे. तालकटोरा स्टेडियम का नाम मुग़ल काल के एक बगीचे से लिया गया है. "तालकटोरा" शब्द फारसी भाषा से आया है, जिसमें "ताल" का अर्थ है तालाब और "कटोरा" का अर्थ है कटोरी आकार की प्राकृतिक गहरी जगह. इस स्टेडियम का नाम महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखने का उद्देश्य दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के वाल्मीकि कॉलोनी के दलित समुदाय को संतुष्ट करना है.

इस्लामी अतीत को मिटाने की कोशिश

नाम बदलने की यह प्रक्रिया भारत के इस्लामी अतीत को नकारने और मिटाने की दिशा में एक कदम है. यह प्रयास "हम" और "वे" के बीच संघर्ष को बढ़ावा देने का प्रयास करता है. जबकि इतिहास में यह दोनों ही समूह एक-दूसरे के साथ समन्वय से जुड़े हुए थे. हाल ही में भाजपा के नेताओं ने दिल्ली के तुगलक लेन का नाम बदलने की अपील की थी, ताकि इस क्षेत्र के नाम को हिंदू आस्थाओं से जोड़ा जा सके. भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने तुगलक लेन का नाम बदलकर स्वामी विवेकानंद मार्ग रखने का कदम उठाया और इसे अपने घर के पते के रूप में भी बदल दिया. इस प्रकार भाजपा के नेता एक ओर प्रयास कर रहे हैं, जिससे सामूहिक पहचान में बदलाव लाया जा सके.

नजफगढ़, मुस्तफाबाद और मोहम्मदपुर के नाम बदलने की मांग

दिल्ली के तीन भाजपा विधायकों ने नजफगढ़, मुस्तफाबाद और मोहम्मदपुर जैसे स्थानों के नाम बदलने की मांग की है. नीलम पहलवान, जो नजफगढ़ का प्रतिनिधित्व करती हैं, ने इस इलाके का नाम बदलकर "नाहरगढ़" रखने का प्रस्ताव दिया. मोहन सिंह बिष्ट, मुस्तफाबाद से विधायक, ने इसे "शिव विहार" या "शिव पुरी" में बदलने की बात की है. वहीं, आरके पुरम के विधायक अनिल शर्मा ने मोहम्मदपुर का नाम बदलकर "माधवपुरम" करने का समर्थन किया है. ये नाम परिवर्तन स्थानीय हिंदू समुदाय के हितों को सामने रखते हुए किए जा रहे हैं, जिनका कहना है कि इन क्षेत्रों के नाम मुग़ल शासकों से जुड़े हुए हैं और उनके नाम हिंदू आस्थाओं के अनुरूप नहीं हैं.

बहुसंख्यकवाद की ओर एक कदम

भाजपा नेताओं का तर्क यह है कि ये नाम परिवर्तन हिंदू बहुसंख्यक समुदाय के संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए किए जा रहे हैं. पहलवान का कहना है कि मुग़ल सम्राट शाह आलम II के समय नजफगढ़ क्षेत्र में लोग कठिनाइयों का सामना कर रहे थे और राजा नाहर सिंह ने 1857 के विद्रोह के दौरान इस क्षेत्र को दिल्ली में शामिल किया था.

इतिहास की गलत व्याख्या

यह अभियान इतिहास की एक बहुत ही पक्षपाती और गलत व्याख्या पेश करता है. मोदी सरकार द्वारा मध्यकालीन भारत को "गुलामी का युग" घोषित किया गया है, जिसे उन्होंने 2023 में अमेरिकी कांग्रेस में भी दोहराया था. यह दृष्टिकोण पूरी तरह से गलत है. क्योंकि यह मुस्लिम शासकों को ब्रिटिश उपनिवेशियों के समान मानता है. जबकि इन शासकों ने भारत की संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि इसे समाहित भी किया.

इस प्रकार के कदम, जैसे मुसलमानों को उनके घरों में सीमित रखना, उन्हें शुक्रवार को सामूहिक नमाज पढ़ने से रोकना और स्थानों के नाम बदलने की प्रक्रिया, भारत में गेट्टोइज़ेशन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. यदि हिंदुत्व बलों द्वारा चलाए गए इन अभियानों को सफलता मिलती है तो भारत में गेट्टो जैसी बस्तियां तेजी से फैल सकती हैं, विशेषकर उत्तर और पश्चिम भारत में. यह स्थिति समुदायों के बीच दूरी और असहमति को बढ़ावा दे सकती है, जिससे समरसता और सामाजिक सौहार्द्र को भारी नुकसान हो सकता है.

(द फेडरल सभी पक्षों से विचार और राय प्रस्तुत करने का प्रयास करता है. लेख में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे फेडरल के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)

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