Anand K Sahay

BMC Result: बीजेपी की ताकत के बीच भी शिवसेना की पकड़ मुंबई में नहीं हुई कम


BMC Result: बीजेपी की ताकत के बीच भी शिवसेना की पकड़ मुंबई में नहीं हुई कम
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Mumbai Mayor post: NCP के कमजोर पड़ने और BJP के सहयोगी पर निर्भर रहने की मजबूरी के बीच महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है।

BMC election results: 16 जनवरी को जब बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव के नतीजे आए तो मुख्यधारा के मीडिया में BJP की जीत को लेकर काफी उत्साह दिखा। 227 सीटों वाली BMC में BJP ने 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने का दावा किया और कई रिपोर्ट्स में इसे 'BJP की बड़ी जीत' बताया गया। हालांकि, नतीजों के कुछ ही समय बाद जमीनी हकीकत सामने आने लगी।

BJP–शिंदे सेना में खींचतान

मेयर पद को लेकर BJP अपने सहयोगी महायुति दल, शिंदे गुट की शिवसेना, पर अपनी शर्तें थोपने की स्थिति में नहीं है। भले ही संख्या के लिहाज से शिंदे सेना जूनियर पार्टनर हो, लेकिन मुंबई के इतिहास में पहली बार BJP का मेयर बनने की संभावना अभी भी पूरी तरह पक्की नहीं है। BJP और शिंदे सेना मिलकर 118 सीटों के साथ बहुमत के आंकड़े को पार कर चुके हैं, लेकिन मेयर पद को लेकर दोनों के बीच कड़ी बातचीत चल रही है। हालात ऐसे हैं कि शिंदे सेना ने अपने 29 पार्षदों को कथित तौर पर एक लग्जरी होटल में ठहरा दिया है, ताकि किसी भी तरह की तोड़फोड़ या दल-बदल से बचा जा सके।

BJP को याद है 2019 का अनुभव

यह खींचतान BJP के लिए हल्की बात नहीं है। पार्टी को 2019 की यादें परेशान कर सकती हैं, जब अविभाजित शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद को लेकर BJP से नाता तोड़ लिया था, जबकि विधानसभा में BJP के विधायक ज्यादा थे। इसके बाद महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव हुए और उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली। उस वक्त BJP की मुंबई में दबदबा बनाने की योजना को झटका लगा था।

दांव बहुत ऊंचे

BJP ने लंबे समय की रणनीति के तहत शिवसेना को तोड़ा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट के साथ गठबंधन किया। शिंदे को कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री पद दिया गया, लेकिन बाद में BJP ने वह पद भी अपने पास ले लिया। अब शिंदे गुट की नजर मुंबई के मेयर पद पर है। BJP के भीतर यह डर भी है कि कहीं शिंदे वही न कर दें, जो उन्होंने पहले उद्धव ठाकरे के साथ किया था। BMC का बजट करीब 75,000 करोड़ रुपये है, जो कई राज्यों के बजट से भी ज्यादा है। ऐसे में इस पर नियंत्रण किसका होगा, यह सवाल बेहद अहम है।

BMC में तीन-तीन शिवसेनाएं

BMC में उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना ने 65 सीटें जीतकर दूसरा स्थान हासिल किया है। मीडिया में किए गए दावों के उलट ठाकरे गुट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बल्कि, उद्धव ठाकरे का नेतृत्व इस चुनाव में प्रभावी माना जा रहा है। फिलहाल शिवसेना के तीन धड़े हैं:—

राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS)

एकनाथ शिंदे गुट

उद्धव ठाकरे गुट

अगर ये तीनों गुट BMC में साथ आ जाएं तो उनके पास कुल 100 पार्षद होंगे, जो BJP की ताकत से कहीं ज्यादा है।

कांग्रेस के साथ समीकरण

अगर इस समीकरण में कांग्रेस को भी जोड़ दिया जाए, जो राष्ट्रीय स्तर पर ठाकरे गुट की सहयोगी रही है तो कुल सीटें 124 तक पहुंच सकती हैं। यह संख्या BJP और शिंदे सेना के गठबंधन से कहीं ज्यादा होगी। हालांकि, कांग्रेस ने BMC चुनाव अकेले लड़ा, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक रणनीतिक चूक मान रहे हैं।

2022 से BJP के प्रभाव में रही BMC

यह भी गौर करने वाली बात है कि 2022 से BMC पर निर्वाचित निकाय नहीं बल्कि प्रशासक का शासन है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पिछली शिवसेना सरकार का कार्यकाल खत्म होने के बाद से, BMC पर नौकरशाही का नियंत्रण रहा है, जिसे परोक्ष रूप से BJP का प्रभाव माना जाता है। इसके बावजूद 2026 के चुनाव में BJP को 2017 के मुकाबले केवल कुछ ही सीटों का फायदा मिला।

महाराष्ट्र में BJP की स्थिति

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद BJP ने महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ हद तक वापसी की है। फिलहाल पार्टी के पास राज्य में सबसे ज्यादा विधायक हैं और वह आधे से ज्यादा नगर निगमों पर काबिज है। लेकिन BJP की एक बड़ी कमजोरी यह रही है कि वह महाराष्ट्र में बिना किसी क्षेत्रीय सहयोगी के सत्ता नहीं संभाल पाती।

NCP की गिरावट, कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरी

नगर निगम चुनावों में एनसीपी के दोनों गुट अजित पवार और शरद पवार का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। पुणे जैसे उनके गढ़ में भी पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। वहीं, कांग्रेस को संगठनात्मक सुस्ती और दूरदृष्टि की कमी से जूझता माना जा रहा है। हालांकि पार्टी ने पांच नगर निगमों में मेयर पद जीते हैं, लेकिन राज्य स्तर पर कोई ठोस रणनीति नजर नहीं आई।

मुस्लिम और दलित वोट पर संकट

महाराष्ट्र में कांग्रेस के सामने मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा AIMIM की ओर खिसकने का खतरा भी है। वहीं, दलित समुदाय में भी पार्टी का जनाधार पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है।

आगे क्या?

तीनों शिवसेना गुटों का आपसी रिश्ता, BJP की रणनीति और कांग्रेस–NCP की भूमिका—इन सब पर अब सबकी नजर है। NCP के कमजोर पड़ने और BJP के सहयोगी पर निर्भर रहने की मजबूरी के बीच, महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि कौन सी पार्टी लंबी रणनीति के साथ मैदान में टिक पाती है और कौन पीछे छूट जाती है।

(फेडरल सभी पक्षों से विचार और राय प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। लेख में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और जरूरी नहीं कि वे फेडरल के विचारों को प्रतिबिंबित करें।)

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