
कैथोलिकोस बेसिलियोस मैथ्यूज ने ईसाइयों पर हमलों पर सरकार की चुप्पी को बहुसंख्यकवादी एजेंडा बताया और संविधान को ईश्वर के समकक्ष रखते हुए प्रतिरोध का संदेश दिया।
कभी-कभी व्यक्तियों और समुदायों के राजनीतिक जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब तमाम कोशिशों के बावजूद सच्चाई से मुंह मोड़ना संभव नहीं रह जाता। चाहे जितना अनदेखा किया जाए, वास्तविकता इतनी कड़वी स्पष्टता के साथ सामने आती है कि उसे नकारा नहीं जा सकता। ऐसा ही एक क्षण इन दिनों पूर्व के कैथोलिकोस और मलंकरी मेट्रोपॉलिटन, तथा भारतीय ऑर्थोडॉक्स चर्च के सर्वोच्च धर्मगुरु कैथोलिकोस बेसिलियोस मार्थोमा मैथ्यूज तृतीय के वक्तव्य में दिखाई देता है।
देश के विभिन्न हिस्सों में ईसाइयों और क्रिसमस समारोहों पर हुए हालिया हमलों के खिलाफ उनका मुखर होकर बोलना, उनके पहले के रुख से एक स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है। उन्होंने ईश्वर और संविधान को एक ही नैतिक धरातल पर रखते हुए संविधान को एक ऐसे पवित्र और नैतिक दस्तावेज़ के रूप में स्थापित किया, जो किसी भी अस्थायी राजनीतिक बहुमत से ऊपर है।
2 जनवरी को केरल के कोट्टायम स्थित पनयमपाला के सेंट मैरी चर्च में पर्व संदेश देते हुए उन्होंने केंद्र सरकार की चुप्पी पर तीखा हमला किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ‘शासकों’ की यह चुप्पी न केवल आतंकी समूहों को नियंत्रित करने में विफलता दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले सत्ता में बैठे लोगों के व्यापक बहुसंख्यकवादी एजेंडे का हिस्सा हैं।
एक चेतावनी और जागृति का क्षण
इसमें कोई संदेह नहीं कि यह भाषण बीजेपी-आरएसएस और उनसे जुड़े संगठनों के प्रति ऑर्थोडॉक्स चर्च के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात और केरल में ईसाइयों तक पहुंच बनाने की बीजेपी की कोशिशों के बावजूद, अब चर्च को यह एहसास हो गया है कि हिंदुत्व-प्रधान भारत में ईसाई समुदाय की स्थिति लगातार असुरक्षित होती जा रही है।
हालांकि शुरुआती दौर में कैथोलिकोस द्वारा अपनाई गई कूटनीति को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता। एक अल्पसंख्यक समुदाय के धर्मगुरु के रूप में हिंसक बहुमत से टकराव से बचना और अपने अनुयायियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी स्वाभाविक जिम्मेदारी थी। फिर भी, उन्हें यह भ्रम नहीं था कि वे किससे बातचीत कर रहे हैं। इससे पहले भी उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि ज़रूरत पड़ने पर वे आलोचना करने से पीछे नहीं हटेंगे।
छत्तीसगढ़ में दो केरल की कैथोलिक ननों की गिरफ्तारी पर उन्होंने कहा था कि एक साथ तुष्टीकरण और उत्पीड़न की नीति विरोधाभासी है। लेकिन इस बार उनकी आलोचना कहीं अधिक तीखी और सीधी है।
सरकार को ठहराया जिम्मेदार
सरकार को हिंसा के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराकर कैथोलिकोस ने यह संकेत दे दिया कि अब खतरे को चुपचाप सहने या केवल कूटनीति से संभालने का समय खत्म हो चुका है। उनका वक्तव्य हिंदुत्व की पूरी वैचारिक संरचना पर एक तीखा प्रहार है, जो अब तक किसी भी आधिकारिक ईसाई मंच से शायद सबसे मजबूत आलोचना है।
संघ की इतिहास व्याख्या पर सवाल
कैथोलिकोस ने संघ परिवार के एकरूपी भारतीय इतिहास के दावे को सिरे से खारिज किया। भारत में कोई विदेशी नहीं जैसे नारों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा—आखिर विदेशी कौन है?
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म का विकास आर्यों के ईरान से लगभग 2000 ईसा पूर्व भारत आगमन के बाद हुआ और कोई भी आर्य या हिंदू ऐसा नहीं है जो केवल भारत का मूल निवासी हो। उन्होंने ‘आर्य आक्रमण’ नहीं बल्कि ‘आर्य प्रवासन’ शब्द का प्रयोग कर आधुनिक इतिहास लेखन की समझ भी दिखाई।
उनके अनुसार, द्रविड़ समुदाय, जो लगभग 4000 ईसा पूर्व अफ्रीका से ईरान होते हुए भारत पहुंचे, दक्षिण भारत की भाषाओं—तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम के मूल वक्ता हैं।
संविधान को ईश्वर के समकक्ष बताया
कैथोलिकोस ने संविधान को भारत राष्ट्र की नींव बताते हुए कहा कि हर नागरिक को धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का समान अधिकार है। उन्होंने कहा कि यह अधिकार ईश्वर और संविधान दोनों द्वारा प्रदत्त है। इस वक्तव्य के जरिए उन्होंने धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाया और कहा कि प्रचार का अधिकार छीना नहीं जा सकता।
हिंसा के लिए राज्य की जिम्मेदारी
उन्होंने बजरंग दल जैसे संगठनों का नाम लिए बिना उन्हें ‘चरमपंथी’ और ‘आतंकी’ बताते हुए कहा कि अगर सरकार उन्हें नियंत्रित नहीं करती और चुप रहती है, तो अल्पसंख्यक इसे सत्ता का कार्यक्रम ही समझेंगे।
ईसाई और मुस्लिम: समान पीड़ा के साथी
एक ऐतिहासिक बदलाव के तहत उन्होंने कहा कि ईसाई और मुस्लिम दोनों भारत में जन्मे हैं, यहीं पले-बढ़े हैं और दोनों को समान रूप से अस्तित्व का अधिकार है। न कोई ईसाई इज़राइल से आया है, न कोई मुस्लिम मध्य-पूर्व से। यह बयान केरल के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है, जहां कभी-कभी ईसाई समुदाय के कुछ हिस्से हिंदुत्व के करीब दिखते रहे हैं। कैथोलिकोस का यह वक्तव्य उस भ्रम को तोड़ता है कि किसी एक अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक सत्ता से समझौता कर सुरक्षा मिल सकती है।
स्पष्ट चेतावनी और प्रतिरोध का संदेश
कैथोलिकोस ने कहा कि अगर RSS का नारा ‘भारत हिंदुओं के लिए’ है, तो यह भारत में कभी सफल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ईसाई समुदाय शहादत से पीछे नहीं हटेगा, क्योंकि उसका इतिहास ही उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष से बना है। उन्होंने साफ किया कि चर्च किसी भी सत्ता से लंबी उम्र वाला है और उत्पीड़न के आगे झुकने वाला नहीं। यह बयान राज्य के लिए एक चेतावनी है कि दमन से समर्पण नहीं, बल्कि संगठित प्रतिरोध जन्म लेगा।
आगे का रास्ता
क्या यह अल्पसंख्यक राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत है, जहां समुदाय बहुसंख्यक की मेज पर जगह मांगने के बजाय अपने अधिकारों का दावा करेगा यह वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है कि चर्च के एक शीर्ष नेता का इस तरह सरकार को सीधे चुनौती देना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचेगा। हालांकि यह संदिग्ध है कि इससे बहुसंख्यकवादी राजनीति की दिशा बदलेगी, लेकिन यह निश्चित है कि भारत की वैश्विक छवि पर इसका असर पड़ेगा।
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