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वैश्विक एकता अभी दूर, क्या म्यूनिख सम्मेलन ने नई शीत जंग की आहट दी?


वैश्विक एकता अभी दूर, क्या म्यूनिख सम्मेलन ने नई शीत जंग की आहट दी?
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म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन 2026 ने दिखाया कि वैश्विक राजनीति अब केवल देशों या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। सम्मेलन में यह स्पष्ट हुआ कि दुनिया संस्कृति और सभ्यता आधारित समूहों में बंट रही है।

मार्को रूबियो ने 'बड़े पैमाने पर प्रवासन (mass migration)' को पश्चिमी समाजों के लिए एक ऐसा संकट बताया जो उन्हें अस्थिर कर रहा है। उनका यह विचार प्रसिद्ध विद्वान सैमुअल हंटिंगटन की चेतावनी से मेल खाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि बड़े पैमाने पर आप्रवासन किसी समाज की मूल सांस्कृतिक पहचान को कमजोर कर सकता है। दुनिया में विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच, 62वां म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (Munich Security Conference) रविवार, 15 फरवरी को जर्मनी के शहर म्यूनिख में संपन्न हुआ। यह सम्मेलन केवल यूक्रेन, गाजा या प्रतिबंधों पर चर्चा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक गहरी विचारधारा की टक्कर का प्रदर्शन था: पश्चिम में फिर से उभरती सभ्यता आधारित सोच और दूसरी ओर संप्रभुता, बहुध्रुवीयता और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित दृष्टिकोण।

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की ओर से एक स्पष्ट संदेश आया, जिसे केवल 'सभ्यतात्मक दृष्टिकोण' कहा जा सकता है। अमेरिका के विदेश सचिव के रूप में बोलते हुए मार्को रूबियो ने अटलांटिक संबंधों को मुख्य रूप से रणनीतिक या आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझाया। उन्होंने कहा: 'हम एक सभ्यता का हिस्सा हैं, पश्चिमी सभ्यता।' उन्होंने अटलांटिक गठबंधन को ईसाई धर्म, संस्कृति, विरासत, भाषा और पूर्वजों से जोड़ा। यह सोच हंटिंगटन के सिद्धांत से अमेरिकी कूटनीति की ओर बढ़ती हुई लगती है।

उनकी बात लगभग बिल्कुल उसी विचारधारा थी, जिसे तीन दशकों पहले सैमुअल हंटिंगटन ने अपनी किताब 'द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस (The Clash of Civilizations)' में पेश किया था। हंटिंगटन का तर्क था कि शीत युद्ध के बाद, वैश्विक राजनीति अब केवल विचारधारा या अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि बड़ी सभ्यताओं के बीच की खाई (fault lines) से प्रभावित होगी- जैसे पश्चिमी, इस्लामी, चीनी (सिनिक), हिंदू और अन्य सभ्यताएं। हंटिंगटन के अनुसार, सभ्यता वह 'लोगों का सबसे ऊँचा सांस्कृतिक समूह और सबसे व्यापक स्तर की सांस्कृतिक पहचान है, जो केवल मानव और अन्य प्राणियों के अंतर से कम हो'।

म्यूनिख में रूबियो का भाषण इस शैक्षणिक विचार को कूटनीति में बदलने जैसा था। उन्होंने NATO को एक सैन्य गठबंधन या यूरोपीय संघ को एक नियामक महाशक्ति के रूप में नहीं बताया। इसके बजाय उन्होंने इसे एक आध्यात्मिक और पूर्वजो से जुड़े रिश्ते के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोप 'आध्यात्मिक रूप से जुड़े हैं' और उनका 'भाग्य हमेशा आपस में जुड़ा रहेगा।'

रूबियो ने इसे एक व्यक्तिगत उदाहरण से समझाया। उन्होंने अपने इतालवी और स्पेनिश पूर्वजों लॉरेन्ज़ो और कैटालिना जिराल्डी और जोसे और मैनुएला रेयना की यात्राओं का ज़िक्र किया और कहा कि उनकी खुद की अमेरिका की शीर्ष कूटनीतिक पद तक पहुँच यूरोप के एक बच्चे की प्रतीकात्मक 'घर वापसी' जैसी है।

जहाँ तक India का सवाल है, उसने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) बनाए रखने की कोशिश की। लेकिन रूबियो के बयान से संकेत मिला कि अमेरिका नई दिल्ली पर रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को लेकर दबाव बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा, 'अमेरिका ने रूस पर अतिरिक्त प्रतिबंध भी लगाए हैं। हमारी भारत से हुई बातचीत में हमें यह सुनिश्चित मिला है कि वे अतिरिक्त रूसी तेल की खरीद रोकेंगे।' यह सिर्फ बयानबाजी नहीं है। हंटिंगटन का मानना था कि एक ऐसी दुनिया में जो सभ्यताओं के टकराव से बनती है, देश स्वाभाविक रूप से 'सांस्कृतिक रिश्तेदार देशों' के साथ जुड़ेंगे- यानी वे देश जिनकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी हों।

रूबियो ने अटलांटिक एकता पर जोर दिया और कहा कि पश्चिमी देशों को वैश्विक दक्षिण की अर्थव्यवस्थाओं में बाजार हिस्सेदारी सुरक्षित करने और महत्वपूर्ण खनिजों के लिए एक ऐसा पश्चिमी आपूर्ति तंत्र बनाने की आवश्यकता है जो अन्य शक्तियों की ब्लैकमेलिंग के लिए कमजोर न हो। उन्होंने आर्थिक प्रतिस्पर्धा को भी एक बड़े सभ्यतागत संघर्ष का हिस्सा बताया।

हालाँकि China को हमेशा सीधे नाम से नहीं लिया गया, फिर भी इसे इस दृष्टिकोण में मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा गया। रूबियो ने पहचान (identity) और आंतरिक एकजुटता पर भी जोर दिया। उन्होंने सुरक्षा को केवल बजट या उपकरण खरीद की तकनीकी बातें मानने वाली सोच (technocratic framing) को चुनौती दी और पूछा: 'हम वास्तव में किसकी रक्षा कर रहे हैं?' उनका जवाब न तो केवल लोकतंत्र था और न ही औपचारिक उदारवाद। बल्कि यह एक ऐतिहासिक रूप से जुड़ी जीवन शैली (way of life) थी। उन्होंने सांस्कृतिक प्रतीकों का उदाहरण देते हुए- एजैसे मोजार्ट, सिस्टिन चैपल और कोलोन कैथेड्रल- कानून और शासन के साथ जोड़ा, और कहा कि राजनीतिक संस्थाएँ एक गहरी सभ्यतागत विरासत (civilizational inheritance) का हिस्सा हैं।

प्रवासन के संदर्भ में, रूबियो ने 'बड़े पैमाने पर प्रवासन (mass migration)' को एक ऐसा संकट बताया जो 'पश्चिमी समाजों को अस्थिर कर रहा है”। यह भाषा हंटिंगटन की सबसे विवादित चेतावनी से मेल खाती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि बड़े पैमाने पर आप्रवासन किसी समाज की मूल सांस्कृतिक पहचान को कमजोर कर सकता है। इस दृष्टिकोण में जनसंख्या में बदलाव सिर्फ मानवतावादी या श्रम बाज़ार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सभ्यता की अस्तित्व की चुनौती (civilizational survival) बन जाता है।

इस बीच, यूरोप के नेताओं ने सम्मेलन में अपनी रक्षा और सैन्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजनाओं पर जोर दिया। इसका मकसद रूस के यूक्रेन युद्ध के जवाब में एक मजबूत सैन्य रुख अपनाना था। यूरोपीय संघ और इंग्लैंड ने घरेलू हथियार उत्पादन बढ़ाने पर चर्चा की ताकि वे विदेशों पर निर्भरता कम कर सकें और अपनी रक्षा क्षमता (deterrence) मजबूत कर सकें। इसे रूस की कार्रवाइयों के जवाब में आवश्यक कदम के रूप में देखा गया।

वहीं, इसके बिल्कुल विपरीत, China ने सम्मेलन में अपनी रणनीति पेश की। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और वैश्विक उत्पादन में एक केंद्रीय देश के रूप में, बीजिंग ने गाजा और ईरान में 'शांति' की अपील की और संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानून की प्राथमिकता को दोहराया।

यह बहुपक्षीयता (multilateralism) और हस्तक्षेप न करने की अपील पश्चिम की सभ्यतागत एकता और चीन की राष्ट्र संप्रभुता और बातचीत के माध्यम से समाधान की स्थिति के बीच बढ़ते अंतर को दिखाती है।

भारत की स्वायत्तता पर प्रतिबंधों का दबाव

जहाँ तक India का सवाल है, उसने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) बनाए रखने की कोशिश की। लेकिन रूबियो के बयान से संकेत मिला कि अमेरिका नई दिल्ली पर रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को लेकर दबाव बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा:

'अमेरिका ने रूस पर अतिरिक्त प्रतिबंध भी लगाए हैं। हमारी भारत से हुई बातचीत में हमें यह सुनिश्चित मिला कि वे अतिरिक्त रूसी तेल की खरीद रोकेंगे। भारत कुछ रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाएगा। भारत ने इस पर सहमति दी।' अगर यह सही है, तो यह उस देश के लिए एक बड़ा बदलाव होगा, जिसने दोनों -वाशिंगटन और मॉस्को के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं।

'हार्ड इकोनॉमी, हार्ड कल्चर' राजनीति का उदय

इस समय की विचारधारा सिर्फ हंटिंगटन तक सीमित नहीं है। इतिहासकार क्विन स्लोबोडियन अपनी किताब 'Hayek’s Bastards' में बताते हैं कि कैसे नवउदारवादी विचारधारा से तीन “H” विकसित हुए:

Hard Economy (कड़ी अर्थव्यवस्था)

Hard Immigration (कड़ी प्रवासन नीति)

Hard Culture (कड़ी सांस्कृतिक पहचान)

रूबियो का म्यूनिख में हस्तक्षेप यह भी दिखाता है कि पश्चिमी देशों ने लिबरल सार्वभौमिकता (liberal universalism) से आंशिक दूरी बनाई है। पहले पश्चिमी नीति निर्माताओं ने लोकतंत्र और मानवाधिकार को सार्वभौमिक लक्ष्य माना, लेकिन रूबियो ने यह विचार खारिज कर दिया कि पश्चिम को अपनी संस्कृति और विरासत पर शर्मिंदा होना चाहिए या अपनी जीवन शैली को “सिर्फ एक विकल्प” के रूप में देखना चाहिए।

इस तीन-स्तरीय विचारधारा (Hard economy, Hard immigration, Hard culture) के विभिन्न रूप नेताओं की राजनीति में देखे जा सकते हैं, जैसे Narendra Modi, Donald Trump और Benjamin Netanyahu। ये नेता आर्थिक राष्ट्रवाद (economic nationalism) पर जोर देते हैं। वहीं मोदी का स्पष्ट रूप से नवउदारवादी (neo-liberal) रुख उनके मंत्र 'Reform Express', सख्त सीमा नियंत्रण और सांस्कृतिक बहुसंख्यकता (cultural majoritarianism) पर आधारित है।

म्यूनिख में रूबियो का हस्तक्षेप भी यह दिखाता है कि पश्चिमी देशों ने लिबरल सार्वभौमिकता (liberal universalism) से आंशिक दूरी बनाई है। पहले पश्चिमी नीति निर्माता लोकतंत्र और मानवाधिकार को सार्वभौमिक लक्ष्य मानते थे, लेकिन रूबियो ने यह विचार खारिज किया कि पश्चिम को अपनी संस्कृति और विरासत पर शर्मिंदा होना चाहिए या अपनी जीवन शैली को “सिर्फ एक विकल्प” के रूप में देखना चाहिए।

उनका कहना था कि पश्चिम को अपनी विरासत पर गर्व (unapologetic) होना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया के बाकी हिस्सों से संवाद या सहयोग छोड़ दिया जाए। लेकिन इसका अर्थ है कि अब दुनिया को समान विचारों की सार्वभौमिकता की बजाय अलग-अलग सभ्यताओं के बीच सह-अस्तित्व को मजबूत स्थिति से प्रबंधित करना होगा।

प्रसिद्ध विद्वान सैमुअल हंटिंगटन ने स्वयं पश्चिमी देशों को सलाह दी थी कि वे यह भ्रम छोड़ दें कि उनके मूल्य सभी जगह अपनाए जाएंगे। इसके बजाय उन्हें अपनी आंतरिक एकजुटता और रणनीतिक समझदारी (strategic prudence) पर ध्यान देना चाहिए, खासकर एक बहुध्रुवीय (multipolar) दुनिया में।

म्यूनिख सम्मेलन ने केवल नीतिगत मतभेद ही नहीं दिखाए, बल्कि यह दुनिया के भविष्य और वैश्विक व्यवस्था की गहरी दार्शनिक अलगाव को भी उजागर करता है। सवाल यह है: क्या दुनिया संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत साझा मानकों की ओर बढ़ रही है, जैसा कि चीन कहता है? या फिर यह संस्कृति आधारित अलग-अलग समूहों में बंट रही है, जो प्रभुत्व और अस्तित्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, जैसा रूबियो की बातों से लगता है? अगर दूसरी सोच (सभ्यताओं के आधार पर बंटवारा) मजबूत होता है, तो म्यूनिख 2026 केवल एक सुरक्षा सम्मेलन के रूप में याद नहीं किया जाएगा। बल्कि यह वह समय होगा जब 'पश्चिमी सभ्यता' की भाषा शैक्षणिक सिद्धांत से बाहर आकर पश्चिमी विदेश नीति के केंद्र में आ गई- और 21वीं सदी को वैश्वीकरण के युग की बजाय सभ्यताओं के आत्म-सम्मान के युग के रूप में देखा जाएगा।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

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