
विदेशी डेटा भंडारण से भारत का एआई विकास नहीं होगा। असली जरूरत घरेलू डेटा, उन्नत चिप निर्माण और ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की है।
भारत में विदेशी डेटा का भंडारण न तो भारतीय एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के विकास के लिए आवश्यक है और न ही पर्याप्त। उलटे, यह बिजली की भारी कमी पैदा करने और दिल्ली जैसी वायु प्रदूषण की समस्या को पूरे देश में फैलाने की गारंटी देता है।
भारत इस समय एआई इम्पैक्ट समिट की मेज़बानी कर रहा है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को अपना डेटा भारत में संग्रहीत करने का खुला निमंत्रण दिया। यह एक प्रभावशाली घोषणा अवश्य है, लेकिन यदि इसे भारतीय एआई क्षमता के विकास या भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध कराने के उपाय के रूप में देखा जाए बिना दिल्ली की सर्दियों जैसी प्रदूषित हवा को पूरे देश का सामान्य मानक बनाए तो यह दृष्टिकोण भ्रामक है।
क्या भारत में बड़ी मात्रा में डेटा संग्रहीत होने से भारत की एआई क्षमता स्वतः विकसित हो जाएगी? यह प्रश्न वैसा ही है जैसे पूछा जाए कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी आबादी होने से किसी देश का जीवन स्तर भी सबसे ऊँचा हो जाता है। लोग ही आय और संपत्ति का सृजन करते हैं, इसलिए अधिक आबादी का अर्थ अधिक संपत्ति होना चाहिए परंतु वास्तविकता यह है कि भारत की आबादी अमेरिका से 4.4 गुना अधिक है, फिर भी अमेरिका की जीडीपी भारत से 7.5 गुना बड़ी है।
दुनिया का डेटा भारत में: क्या इससे एआई बनेगा?
दुनिया का डेटा भारत में संग्रहीत होना न तो आवश्यक है और न ही पर्याप्त, ताकि भारत एआई क्षमता विकसित कर सके। पहले ‘पर्याप्त’ होने के पहलू पर विचार करें। मान लीजिए कुछ यूरोपीय देश यह तय करते हैं कि अपने यहाँ डेटा संग्रहीत करना अत्यधिक खर्चीला और जटिल है जिसमें बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन, स्थिर आपूर्ति, डेटा केंद्रों की भौतिक सुरक्षा और साइबर सुरक्षा सॉफ़्टवेयर का निरंतर उन्नयन शामिल है और वे यह जिम्मेदारी भारत को सौंप देते हैं।
क्या भारत उस डेटा का उपयोग अपने एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने में कर सकता है? बिल्कुल नहीं। यूरोपीय संघ (EU) केवल उन्हीं देशों को डेटा हस्तांतरण की अनुमति देता है जिनके पास उसके जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) के समान या उससे अधिक कठोर डेटा सुरक्षा कानून हों और जिनका अनुपालन रिकॉर्ड विश्वसनीय हो। यदि यूरोपीय डेटा भारत आता भी है, तो वह कड़े कानूनी प्रावधानों के साथ आएगा, जो उसकी गोपनीयता और अखंडता की रक्षा सुनिश्चित करेंगे।
स्पष्ट है कि विदेशी डेटा का स्थानीय भंडारण, डेटा उपलब्धता के सीमित दृष्टिकोण से भी, भारतीय डेवलपर्स को फाउंडेशन मॉडल बनाने में मददगार नहीं होगा।
क्या डेटा आवश्यक है?
एआई मॉडल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा आवश्यक है। लेकिन भारत स्वयं दुनिया के सबसे बड़े डेटा उत्पादकों में से एक है चाहे वह व्यक्तिगत डेटा हो, इंजीनियरिंग, वित्तीय, खेल, कृषि या वन्यजीवन संबंधी। यदि इस डेटा तक व्यवस्थित रूप से पहुंच बनाई जाए, तो यह एआई मॉडल निर्माण की किसी भी आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा।
भारतीय एआई डेवलपर्स को बड़े भाषा मॉडल (LLM) विकसित करने के लिए विदेशी डेटा की आवश्यकता नहीं है। लेकिन डेटा का सृजन और उसकी उपलब्धता दो अलग बातें हैं। लाखों भारतीय स्वास्थ्य ट्रैकिंग उपकरण पहनते हैं, जो उनके व्यायाम, हृदयगति आदि का डेटा रिकॉर्ड करते हैं। फिर भी हमने ऐसा कोई सशक्त तंत्र विकसित नहीं किया है जो इस डेटा को संग्रहित और विश्लेषित कर संभावित स्वास्थ्य जोखिमों का पूर्वानुमान लगा सके। विदेशी डेटा केंद्रों की भरमार से यह स्थिति नहीं बदलेगी।
क्या भारत को अपना फाउंडेशन मॉडल चाहिए?
क्या भारत को अपना स्वयं का फाउंडेशन मॉडल विकसित करना चाहिए, या अमेरिका और चीन की कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराए गए ओपन-सोर्स या स्वामित्व वाले मॉडल का उपयोग करना पर्याप्त होगा?
भारत को अपने एआई मॉडल की आवश्यकता है। एआई का उपयोग केवल व्यापार में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में भी होता है जैसे आधुनिक सैन्य हथियार प्रणालियों के नियंत्रण में। उदाहरण के लिए, ऐसे ड्रोन झुंड (स्वॉर्म) जो दुश्मन की मिसाइल रक्षा प्रणाली को भेद सकें और एआई द्वारा नियंत्रित हों। एआई केवल क्लाउड में नहीं रहता; इसे एंबेडेड सिस्टम या एज कंप्यूटिंग संरचनाओं में भी स्थापित किया जा सकता है। यदि किसी टैंक-शिकारी ड्रोन के नेविगेशन संकेत जैम कर दिए जाएँ, तो वही ड्रोन अपने अंदर मौजूद एज एआई की मदद से लक्ष्य का अनुमान लगाकर हमला कर सकता है।
रणनीतिक उद्देश्यों के लिए एआई विदेशी मॉडल पर आधारित नहीं हो सकता चाहे वे ओपन-सोर्स ही क्यों न हों। तथाकथित ओपन-सोर्स मॉडल में भी ‘बैकडोर’ हो सकते हैं या पूर्ण अनुकूलन पर प्रतिबंध हो सकते हैं, विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा उपयोगों के लिए।
असली बाधा: उन्नत चिप्स
मान लें कि डेटा और प्रतिभा दोनों उपलब्ध हैं, तब भी सबसे बड़ी बाधा उच्च-स्तरीय सेमीकंडक्टर चिप्स की उपलब्धता है। आर्थिक सर्वेक्षण में भी एआई पर एक अध्याय है, जिसमें हर परिदृश्य में हाई-स्पीड प्रोसेसिंग चिप्स की कमी को प्रमुख चुनौती बताया गया है। हाई-बैंडविड्थ मेमोरी चिप्स भी इसी समस्या का हिस्सा हैं।
चीन ने निजी कंपनियों, सरकार और विश्वविद्यालयों के भारी निवेश से अपनी चिप निर्माण क्षमता विकसित कर ली है। भारत भी विदेशी चिप निर्माताओं को लगभग 10 अरब डॉलर की सब्सिडी देकर उन्हें यहाँ फैब्रिकेशन इकाइयाँ स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। लेकिन यदि कोई उन्नत चिप भारत में निर्मित भी हो, तो यह जरूरी नहीं कि वह भारतीय उपयोग के लिए उपलब्ध हो। जिस देश की कंपनी उस चिप की बौद्धिक संपदा की मालिक है, वह किसी भी कारण से उसकी आपूर्ति रोक सकती है।
इस चुनौती का समाधान केवल भारतीय संसाधनों और प्रतिभा से उन्नत सिलिकॉन तकनीक विकसित करना है। केवल विशाल डेटा केंद्र स्थापित कर लेने से यह समस्या हल नहीं होगी।
बिजली और प्रदूषण का संकट
डेटा केंद्र पूंजी-प्रधान होते हैं, श्रम-प्रधान नहीं। निर्माण के दौरान कुछ रोजगार पैदा होते हैं, लेकिन संचालन में अपेक्षाकृत कम। इन्हें चलाने के लिए गीगावॉट स्तर की बिजली चाहिए, जिसके लिए नए बिजली संयंत्र और कोयला खनन की आवश्यकता होगी।
भारत के पास अतिरिक्त बिजली क्षमता नहीं है। देश अभी तक इतनी बिजली भी नहीं बना पा रहा कि घरों में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध हो सके और आयातित ईंधन पर निर्भरता समाप्त हो। यदि भारत अपने विनिर्माण लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे विशाल अतिरिक्त बिजली उत्पादन की आवश्यकता होगी।
यदि डेटा केंद्रों को कोयला-आधारित तापीय संयंत्रों से बिजली मिलेगी जबकि कुल उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत अभी भी तापीय स्रोतों से आता है तो वायु प्रदूषण बढ़ेगा। अपूर्ण जले कोयले के कण, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में फैलेंगे और हवाएँ इन्हें दूर-दूर तक ले जाएँगी।
विदेशी डेटा को भारत में संग्रहीत करने का आकर्षण तर्कसंगत नीति का आधार नहीं हो सकता। इससे न तो भारतीय एआई का वास्तविक विकास सुनिश्चित होगा और न ही ऊर्जा या पर्यावरण संबंधी चुनौतियाँ सुलझेंगी। भारत को अपनी एआई क्षमता विकसित करने के लिए अपने डेटा, अपनी प्रतिभा और अपनी उन्नत चिप निर्माण क्षमता पर निवेश करना होगा न कि केवल डेटा केंद्रों की संख्या बढ़ाने पर।
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