Binoo K John

जिमखाना क्लब पर सरकार का एक्शन, लुटियंस दिल्ली की विरासत पर घमासान


जिमखाना क्लब पर सरकार का एक्शन, लुटियंस दिल्ली की विरासत पर घमासान
x

115 साल पुराने दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली कराने के आदेश से विरासत, राजनीति और लुटियंस दिल्ली की पहचान पर नई बहस छिड़ गई है।

दिल्ली के प्रतिष्ठित 115 साल पुराने जिमखाना क्लब को खाली कराने का मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि लुटियंस दिल्ली की औपनिवेशिक पहचान को खत्म करने की व्यापक राजनीतिक और वैचारिक परियोजना से जुड़ा माना जा रहा है। पंजाबी अभिजात वर्ग, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों के लिए लंबे समय से सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र रहे इस क्लब पर आखिरकार केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) की तलवार गिर ही गई। यह कार्यालय लुटियंस दिल्ली की जमीन का प्रशासन देखता है। जारी आदेश में कहा गया कि “यह भूमि तत्काल संस्थागत जरूरतों, प्रशासनिक ढांचे और जनहित परियोजनाओं के लिए आवश्यक है, जिसे आसपास की सरकारी जमीनों के पुनः अधिग्रहण के साथ जोड़ा गया है।” क्लब को 5 जून तक जमीन खाली करने का निर्देश दिया गया है।

2014 से ही मंडरा रहा था खतरा

2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से ही जिमखाना क्लब पर खतरा मंडरा रहा था। यह क्लब प्रधानमंत्री आवास, पहले 7 रेस कोर्स रोड और अब लोक कल्याण मार्ग, के बिल्कुल पास स्थित है। क्लब जिस जमीन पर संचालित होता है, वह कथित तौर पर स्थायी लीज पर दी गई थी, हालांकि क्लब इस दावे को चुनौती देता रहा है। इसी वजह से सरकार के लिए जमीन वापस लेने का रास्ता आसान हो गया।

यह समझना मुश्किल है कि कोई सरकार एक क्लब को खाली कराने में इतना समय और संसाधन क्यों लगाएगी, लेकिन इसे आरएसएस की उस व्यापक “शुद्धिकरण” मुहिम का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत राजधानी से इस्लामी और औपनिवेशिक विरासत के प्रतीकों को हटाने की कोशिश की जा रही है।

दरअसल, क्लब को बंद करने की कोई ठोस प्रशासनिक वजह नहीं बताई गई। लेख में दावा किया गया है कि बीजेपी नेतृत्व और आरएसएस से जुड़े लोगों के बीच अंग्रेजी बोलने वाले उस उच्चवर्ग को लेकर लंबे समय से संदेह और विरोध रहा है, जो देर रात तक क्लब संस्कृति का हिस्सा बना रहता है। यह भी माना जाता रहा कि यहां राजनीतिक साजिशें रची जाती हैं, हालांकि इसका कोई प्रमाण कभी सामने नहीं आया।

लुटियंस दिल्ली को ‘नई हिंदुत्व राजधानी’ बनाने की कोशिश

बीजेपी और आरएसएस लंबे समय से लुटियंस दिल्ली के स्वरूप को बदलकर उसे एक कल्पित हिंदुत्ववादी राजधानी के रूप में ढालना चाहते हैं, जिसे कुछ लोग “इंद्रप्रस्थ” जैसी अवधारणा से जोड़कर देखते हैं।

2020 के बाद से जिमखाना क्लब के प्रबंधन पर नियंत्रण पाने की कई कोशिशें की गईं। क्लब पर वित्तीय कुप्रबंधन के आरोप लगाए गए और उसकी संचालन समिति में सरकारी नामित सदस्यों का हस्तक्षेप बढ़ा। इसके बावजूद क्लब की गतिविधियां जारी रहीं। क्रिसमस के दौरान बॉलरूम पार्टियां होती रहीं और कई पुराने सदस्य रोजाना यहां आते रहे। क्लब के टेनिस और स्क्वैश कोर्ट, जिन्होंने पिछले 115 वर्षों में कई चैंपियन खिलाड़ी दिए, सक्रिय बने रहे।लेकिन आखिरकार 23 मई को सरकार ने वह आदेश जारी कर दिया, जिसका डर लंबे समय से बना हुआ था।

अब छोटी लड़ाइयों की कोई जगह नहीं बची है और हर मोर्चे पर जीत हासिल करना राजनीतिक परियोजना का हिस्सा बन चुका है। जिमखाना क्लब को एक तरह से रूपकात्मक मदरसा माना गया, जो उभरती हुई “हिंदुत्ववादी लुटियंस दिल्ली” के बीच मौजूद था, और आखिरकार उस पर कार्रवाई कर दी गई।

दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही अपने नए “सेवा तीर्थ” परिसर में आंशिक या पूर्ण रूप से शिफ्ट हो चुके हैं, जिसे उनके पसंदीदा वास्तुकार बिमल पटेल ने डिजाइन किया है। इसे कुछ लोग जिमखाना क्लब के लिए राहत का संकेत मान रहे थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

लेख में दावा किया गया है कि बीजेपी के शीर्ष नेता सार्वजनिक रूप से क्लब को पसंद नहीं करते थे, लेकिन कई बार भोजन के लिए वहां जाते रहे। इसे लेख ने “टोही मिशन” जैसा बताया है।

खेल और विरासत का केंद्र रहा क्लब

जिमखाना क्लब अपनी ऐतिहासिक इमारतों और विरासत बंगलों के अलावा दिल्ली के कुछ बचे हुए घास वाले लॉन टेनिस कोर्ट्स के लिए भी प्रसिद्ध है। मशहूर लेखक खुशवंत सिंह यहां रोज टेनिस खेलते थे।2022 में भारत और डेनमार्क के बीच डेविस कप मुकाबला भी इसी क्लब के घास वाले कोर्ट पर आयोजित किया गया था। आयोजन का प्रबंधन एक ऐसे व्यक्ति ने किया था जिसे बीजेपी से करीबी रखने वाला पूर्व उत्तर प्रदेश नौकरशाह बताया गया है।लेख के मुताबिक बीजेपी समर्थित नेताओं ने देश की लगभग सभी खेल संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है।

आदेश से नाराज सदस्य

क्लब के सदस्य इस आदेश से बेहद नाराज हैं। उनका कहना है कि यह फैसला अनावश्यक और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है। कई लोगों का मानना है कि सरकार एक विशेष सामाजिक वर्ग को निशाना बना रही है और अपने “कल्पित दुश्मनों” के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है।पूर्व रॉ प्रमुख और क्लब के पूर्व अध्यक्ष एएस दुलत ने कहा, “कई बुजुर्ग लोगों के लिए यह जगह घर जैसी बन चुकी है। यह किसी मंदिर से कम नहीं है। अगर दिल्ली जिमखाना को कहीं और भेज दिया गया, तो वह दिल्ली जिमखाना नहीं रहेगा।”

क्लब के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि सरकार का आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है, क्योंकि क्लब ने वर्षों पहले जमीन के लिए भुगतान कर दिया था। उनका तर्क है कि उस समय स्वामित्व दस्तावेज की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी, इसलिए तकनीकी रूप से क्लब ही जमीन का मालिक है।

कानूनी लड़ाई और सरकार से टकराव

जिमखाना क्लब और सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा था। राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) तक ने इसमें हस्तक्षेप किया और फंड प्रबंधन में कथित गड़बड़ियों की बात कही। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इन आरोपों की न्यायिक जांच में स्थिति अलग हो सकती है।

क्लब के सदस्य इस बात से नाराज हैं कि जब देश महंगाई, गिरते रुपये और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब सरकार एक क्लब को खाली कराने में इतनी ऊर्जा खर्च कर रही है। इसे फिर से आरएसएस की उस विचारधारा से जोड़ा गया है, जिसके तहत राजधानी को इस्लामी और औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने की कोशिश की जा रही है।

इतिहास से भरा हुआ है जिमखाना क्लब

सफदरजंग रोड पर स्थित यह क्लब उस घर के सामने है, जहां पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सुरक्षाकर्मियों ने हत्या कर दी थी। क्लब औपनिवेशिक दौर और स्वतंत्रता के बाद के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।2013 में क्लब की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी समारोह में शामिल हुए थे। 1931 के गांधी-इरविन समझौते से जुड़ी चर्चाएं भी यहीं हुई थीं। ब्रिटिश अधिकारी यहां नियमित रूप से आते थे और बॉलरूम डांस इसकी पहचान हुआ करता था, जिसे मशहूर फोटोग्राफर होमाई व्यारावाला ने अपने कैमरे में कैद किया था। लेकिन लेख में कहा गया है कि मौजूदा सरकार के लिए इतिहास और विरासत का महत्व कम होकर सिर्फ रियल एस्टेट तक सीमित हो गया है, जिसे वर्गफुट में मापा जा रहा है।

अगला निशाना नेशनल प्रेस क्लब?

आशंका जताई गई है कि अब अगला निशाना रायसीना रोड स्थित नेशनल प्रेस क्लब हो सकता है। यह दिल्ली में उन पुराने उदारवादी और वामपंथी समूहों का आखिरी प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां बैठकें और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित होती हैं।चूंकि नया संसद भवन अब उसके ठीक सामने स्थित है, इसलिए लेख के अनुसार सरकार के लिए उसे बंद करने का “राजनीतिक कारण” पर्याप्त माना जा सकता है। वहां राजनीतिक चर्चाएं, अंदरूनी किस्से और सामाजिक मेलजोल लंबे समय से राजधानी की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करना चाहता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों)

Next Story