
धुरंधर सिर्फ स्पाई फिल्म नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी नजरिए से पाकिस्तान को ‘अन्य’ और अराजक रूप में गढ़ने वाली सिनेमाई कल्पना का विश्लेषण है।
स्पाई’ फिल्म धुरंधर पर व्यापक रूप से समीक्षाएँ लिखी गई हैं, किंतु यह लेख किसी समीक्षा के रूप में नहीं है। फिल्म सतही तौर पर एक भारतीय एजेंट (रणवीर सिंह) की कहानी प्रस्तुत करती है, जो बलोच बनकर कराची के एक आपराधिक गिरोह में घुसपैठ करता है और भारत-विरोधी गतिविधियों की महत्वपूर्ण सूचनाएँ पहुँचाता है। लेकिन यह कथानक भारतीयों को पाकिस्तान की एक निर्बाध कल्पना करने का अवसर भर देता है। जिस प्रकार नरक की कल्पना एक प्यूरीटन के दबी हुई मानसिकता को मुक्त करती है, उसी प्रकार पाकिस्तान की कल्पना शायद एक भारतीय राष्ट्रवादी मानस को खुला अवकाश देती है। यदि पाकिस्तान ‘कुछ भी करने में सक्षम’ है, तो तर्क यह भी हो सकता है कि पाकिस्तान में आधारित एक भारतीय फिल्म ‘सब कुछ’ दिखा सकती है।
फिल्म कराची के आपराधिक गिरोहों के बीच स्थापित है और इसमें अनावश्यक रक्तपात तथा यातनाएं दिखाई गई हैं ऐसी हिंसा, जो यदि भारत में आधारित किसी फिल्म में दिखाई जाती, तो संभवतः प्रतिबंध का कारण बनती। एक्शन दृश्य अत्यधिक भव्य हैं, किंतु अधिकांश का कोई ठोस उद्देश्य नहीं है। लोगों के सिर उड़ा दिए जाते हैं, उँगलियाँ काट दी जाती हैं; एक गैंगस्टर को मसूर दाल जैसी उबलती वस्तु में डाला जाता है; कुछ को मोटरसाइकिल से गर्दन में बाँधकर व्यस्त सड़कों पर घसीटा जाता है; और पकड़े गए भारतीय एजेंट के चेहरे की त्वचा में अनेक छोटे काँटे फँसाकर यातना दी जाती है।
जिस प्रकार नरक ईश्वर की सृष्टि का ‘अन्य’ (other) है, उसी प्रकार पाकिस्तान, मेरी समझ में, भारत का ‘अन्य’ है। ‘अन्य’ वह है जो स्वभावतः हमसे भिन्न होता है, किंतु हमारे साथ बंधा भी रहता है और हमारी आत्म-परिभाषा के लिए आवश्यक भी होता है। साहित्य में ‘दुष्ट जुड़वां’ का रूपक परिचित है, और भारतीय राष्ट्रवादी कल्पना में पाकिस्तान कुछ वैसा ही हो सकता है क्योंकि दोनों का जन्म साथ हुआ।
फिल्म को प्रामाणिक कहा गया है, किंतु इसमें रोमांटिक दृश्य हैं जहाँ भारतीय एजेंट एक कनिष्ठ गैंग सदस्य के रूप में एक शक्तिशाली राजनेता की बेटी से खुलेआम सड़कों पर प्रेम करता है और किसी मुसीबत में नहीं पड़ता। जासूसी तब सुगम हो जाती है जब 26/11 जैसी प्रमुख भारत-विरोधी घटनाएँ संयोगवश उसकी उपस्थिति में आयोजित होती दिखाई जाती हैं, और हम अजमल कसाब को वास्तव में बंदूक थमाई जाती देख लेते हैं। पाकिस्तान में सुंदर महिलाएँ सिर ढके बिना दिखाई गई हैं—जबकि इंटरनेट पर कराची की सड़कों की तस्वीरें कुछ और ही दर्शाती हैं। पाकिस्तानी धारावाहिक भी ऐसा करते हैं, पर इससे वह ‘प्रामाणिक’ नहीं हो जाता।
पाकिस्तान एक ‘अन्य’ के रूप में
2014 के बाद पाकिस्तान को फिल्मों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाया जाने लगा, जबकि पहले वह संकेतों में उपस्थित रहता था। पाकिस्तान को ‘अन्य’ के रूप में रूपायित करने वाली शुरुआती फिल्मों में मनोज कुमार की उपकार (1967) थी, जिसमें 1965 के युद्ध की पृष्ठभूमि के साथ दो भाइयों की कहानी भी थी—एक सज्जन और दूसरा पथभ्रष्ट—जो पारिवारिक ज़मीन के बँटवारे पर विवाद करते हैं। यही रूपक बाद में दो रास्ते (1969) में दोहराया गया, जहाँ एक शांतिवादी बड़े भाई (बलराज साहनी) के साथ एक छोटा भाई भी है, जो स्वार्थी भाई के प्रति अधिक कठोर है। इस छोटे भाई को नेहरू की तुलना में अधिक दृढ़ शास्त्री के रूप में देखा जा सकता है।
स्पष्ट है कि पाकिस्तान की छवियाँ भारत की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती रही हैं। अधिक उग्र गदर: एक प्रेम कथा (2001) तब आई जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। इस फिल्म में तारा सिंह अपनी प्रिय सकीना के पीछे नवगठित पाकिस्तान जाता है। उसे सार्वजनिक रूप से धर्मांतरण कर पाकिस्तान को अपनाना पड़ता है, जिसके लिए वह तैयार है, किंतु ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगाने से वह इंकार कर देता हैऔर यही सीमा बन जाती है।
बाद की नरमी
यहां यह धारणा दिखाई देती है कि पाकिस्तान का अस्तित्व केवल उसके भारत-विरोधी भाव से ही न्यायोचित है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि भारतीय राष्ट्रवाद को भी पाकिस्तान एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में चाहिए, और इसलिए वह पाकिस्तान को भी भारत-विरोध पर निर्भर मानता है। किंतु बाद की फिल्मों में कुछ नरमी दिखाई देती है। वीर-ज़ारा (2004) अधिक संतुलित थी, क्योंकि उसमें एक उदार पाकिस्तानी महिला को सहिष्णु और लोकतांत्रिक भारत में आते दिखाया गया।
2014 के बाद धार्मिक पहचान एक केंद्रीय मुद्दा बन गई। राज़ी में कश्मीर की एक मुस्लिम महिला जानबूझकर पाकिस्तान के एक सैन्य परिवार में विवाह करती है और देशभक्ति सिद्ध करने के लिए उसे धोखा देती है। जिन लोगों ने उसका कोई अहित नहीं किया, उनकी मृत्यु को ‘कोलैटरल डैमेज’ की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
अव्यवस्था बनाम व्यवस्था
धुरंधर में पाकिस्तान और भारत को क्रमशः अव्यवस्था और व्यवस्था के रूप में दिखाया गया है। भारत में लोग सूट पहनकर मेज़ों पर बैठकर योजनाएँ बनाते हैं, जबकि पाकिस्तान को लंबे बालों और दाढ़ी वाले उग्र पुरुषों के रूप में दिखाया गया है, जो स्वचालित हथियार लिए घूमते हैं और पुलिस से अप्रभावित रहते हैं। एकमात्र प्रभावशाली पुलिस अधिकारी (संजय दत्त) भी कुर्ता-पायजामा और खुले बालों में छोटे अपराधियों को दंडित करता दिखता है।
फिल्म अत्यधिक हिंसक है, किंतु सब कुछ बनावटी प्रतीत होता है; कोई भी खलनायक अभिनेता से अधिक वास्तविक नहीं लगता, जिससे वास्तविक रोमांच बाधित होता है। धुरंधर पाकिस्तान को इस प्रकार तीखे रूप में क्यों चित्रित करती है, इस पर केवल अनुमान लगाया जा सकता है। इसका कारण केवल भारतीय राष्ट्रवाद नहीं है। पाकिस्तान वर्तमान में निर्वाचित नेतृत्व के अधीन नहीं है, और एक सर्वोच्च जनरल—जो स्वयं को धार्मिक उन्मादी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है उसकी अराजक छवि को बढ़ा रहा है। संभव है कि फिल्म ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया हो।
यह भी भारतीय मानस की एक विचित्र कमजोरी को उजागर करता है कि एक ऐसा पड़ोसी, जिसकी जीडीपी भारत की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत है, भारतीय कल्पना को इतना व्यस्त रखता है कि फिल्म अत्यंत सफल हो जाती है।
‘अखंड भारत’ और संबंधों का प्रश्न
यह परिघटना गहन अध्ययन की मांग करती है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान केवल भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं, विशेषकर ‘अखंड भारत’ की प्रिय अवधारणा के संदर्भ में। हिंदू दक्षिणपंथ जिस नॉस्टेल्जिया के साथ ‘अखंड भारत’ (अविभाजित भारत) की बात करता है, वह केवल पाकिस्तानी भूभाग पर अधिकार की इच्छा नहीं, बल्कि उन लोगों से पुनर्मिलन की भावना भी है, जो कुछ सांस्कृतिक प्रथाएँ साझा करते हैं यद्यपि वे प्रथाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं।
यदि इस्लामी आक्रमणकारियों और शासकों ने ‘अन्य’ को बाहर रखा और परिणामस्वरूप विविध प्रथाओं से एक संगठित हिंदू धर्म का निर्माण हुआ, तो आज अनेक हिंदू राष्ट्रवादी पाकिस्तान को अपने ही लोगों का ‘भटका हुआ’ रूप मानते हैं। यह दृष्टिकोण भारत-पाकिस्तान संबंधों को एक अलग अर्थ देता है और इस भावना को पुष्ट करता है कि पाकिस्तान भारत का ‘अन्य’ है।
आज पाकिस्तान जिस अस्थिर और उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रहा है, वह धुरंधर और उसकी सफलता को समझाने में सहायक है। फिल्म अपने चित्रण के माध्यम से मानो घोषित करती है कि पाकिस्तान अभी भी एक अनियंत्रित समूह है, जिसे राष्ट्र-राज्य की परिभाषा ने पूरी तरह संयमित नहीं किया है।
भारतीय सिनेमा में बांग्लादेश
आज पूर्व में एक और संभावित चुनौती के रूप में बांग्लादेश का प्रश्न उभर रहा है। पूर्वी सीमा को पश्चिम जैसी अर्थवत्ता नहीं मिली, संभवतः बंगाल में वाम-उदार राजनीति के प्रभुत्व और अवामी लीग की मित्रवत भूमिका के कारण। किंतु यदि बांग्लादेश की राजनीति भारत से अलग दिशा में जाती है, तो यह विचारणीय है कि भविष्य के सिनेमा में उसके बारे में कैसी मिथकीय छवियाँ गढ़ी जाएँगी और उसे किस रूप में देखा जाएगा।


