Vivek Katju

Diego Garcia : जहां ट्रंप की ज़िद से टकरा गया अंतरराष्ट्रीय कानून


Diego Garcia : जहां ट्रंप की ज़िद से टकरा गया अंतरराष्ट्रीय कानून
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ट्रंप एक नए किस्म के अंतरराष्ट्रीय तंत्र की वापसी चाहते हैं, जिसमें ताकतवर देश जो चाहें कर सकें और कमजोर देशों को उनकी इच्छा स्वीकार करनी पड़े

कुछ दिन पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर ब्रिटेन पर हमला करते हुए लिखा,“हैरान करने वाली बात है कि हमारा ‘शानदार’ नाटो सहयोगी यूनाइटेड किंगडम (UK) इस समय डिएगो गार्सिया (Diego Garcia) द्वीप,जहां अमेरिका का एक बेहद महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा स्थित है, को मॉरीशस (Mauritius) को सौंपने की योजना बना रहा है, और वह भी बिना किसी वजह के। इसमें कोई शक नहीं कि चीन और रूस ने इस पूरी कमजोरी के कृत्य पर ध्यान दिया होगा। ये अंतरराष्ट्रीय शक्तियां केवल ‘ताकत’ को ही पहचानती हैं, और इसी वजह से मेरे नेतृत्व में अमेरिका अब, सिर्फ एक साल में ही, पहले से कहीं ज्यादा सम्मानित हो गया है। ब्रिटेन का इतनी अहम ज़मीन यूं ही सौंप देना घोर मूर्खता है, और यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी उन अनेक वजहों में एक और है, जिनके कारण ग्रीनलैंड को हासिल किया जाना जरूरी है। डेनमार्क और उसके यूरोपीय सहयोगियों को सही कदम उठाना होगा।”

इस लेखक ने जानबूझकर ट्रंप की पूरी ‘ट्रुथ सोशल’ पोस्ट को उद्धृत किया है, क्योंकि यह उनके वर्तमान सोचने के तरीके, उनकी प्रवृत्तियों और सच कहें तो उनके मन की स्थिति को उजागर करता है। उन्होंने मौजूदा विश्व व्यवस्था के मानदंडों के प्रति पूरी तरह से तिरस्कार विकसित कर लिया है। एक ऐसी व्यवस्था जो संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, देशों के समान अधिकारों और औपनिवेशिक प्रशासन के तहत लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर आधारित है।

ट्रंप अब भूमि हासिल करने पर केंद्रित हैं और लोगों के अधिकारों को लेकर चिंतित नहीं हैं। वह अपने देश के हितों के लिए इन अधिकारों को कुचलने को तैयार हैं। यह ग्रीनलैंड (Greenland) के मामले में भी सच है और डिएगो गार्सिया के संदर्भ में भी। यही रवैया कुछ हद तक वेनेजुएला में भी देखने को मिला, जहां ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों को तोड़ते हुए निकोलस मादुरो (Nicolas Maduro) और उनकी पत्नी को अमेरिका ले जाने के लिए कदम उठाए।

हिंद महासागर में स्थित मॉरीशस की आबादी का बहुमत भारतीय मूल का है। ये लोग भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों के वंशज हैं, जिन्हें पहले फ्रांसीसियों और बाद में ब्रिटिश शासकों ने गन्ने के बागानों में काम करने के लिए मॉरीशस ले जाया था। ब्रिटेन ने 1815 में मॉरीशस को फ्रांस से अपने कब्जे में लिया और इसे अपनी कॉलोनी बना लिया।

1950 के दशक में जब उपनिवेशवाद समाप्त करने की प्रक्रिया ने गंभीर रूप से गति पकड़ी और 1960 के दशक में आगे बढ़ी, तो यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों को अपनी कॉलोनियां छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस प्रक्रिया से मॉरीशस भी अछूता नहीं रह सका। लेकिन ब्रिटेन के सामने समस्या यह थी कि जहां पूरा मॉरीशस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था, वहीं ब्रिटेन और अमेरिका दोनों की नजर में चागोस द्वीप समूह (Chagos island chain), जिसका सबसे बड़ा द्वीप डिएगो गार्सिया था, बेहद अहम था। वे डिएगो गार्सिया में एक सैन्य अड्डा स्थापित करना चाहते थे।

ब्रिटेन को यह अच्छी तरह पता था कि आज़ादी के बाद मॉरीशस में भारतीय मूल के नेताओं के नेतृत्व वाली सरकार बनेगी। वह भारतीय समुदाय और भारत के बीच गहरे संबंधों से भी वाकिफ था। चूंकि भारत गुटनिरपेक्ष नीति का पालन करता था, इसलिए ब्रिटेन को आशंका थी कि मॉरीशस के नेता भारत की नीति का अनुसरण करेंगे और संभव है कि वे डिएगो गार्सिया को सैन्य अड्डा स्थापित करने के लिए लीज़ पर देने को तैयार न हों।

इसी वजह से ब्रिटेन ने फैसला किया कि वह चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग कर देगा और इन द्वीपों तथा मॉरीशस के कुछ अन्य हिस्सों को मिलाकर एक नया क्षेत्र बनाएगा, जिसे ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी (BIOT) कहा जाएगा। यह फैसला नवंबर 1965 में लागू किया गया, जब ब्रिटेन ने ‘स्वशासी’ कॉलोनी मॉरीशस के प्रशासन, जिसका नेतृत्व तत्कालीन मुख्यमंत्री सर सीवूसागर रामगूलाम (Sir Seewoosagur Ramgoolam) कर रहे थे, को तीन मिलियन पाउंड की राशि के बदले BIOT के गठन पर सहमत होने के लिए मजबूर किया।

ब्रिटेन ने मॉरीशस के नेताओं को उनकी स्वतंत्रता पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया, लेकिन यह आमंत्रण ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी (BIOT) के गठन के बाद ही दिया गया। उन्हें इस अलगाव के मुद्दे पर मूल रूप से चुप रहने के लिए दबाव में रखा गया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उनसे कहा गया था कि यदि उन्होंने चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग किए जाने पर खुलकर विरोध किया, तो उनकी स्वतंत्रता में देरी कर दी जाएगी।

मार्च 1968 में मॉरीशस स्वतंत्र हुआ। हालांकि, चागोस का अलग किया जाना देश के नेतृत्व को लगातार खटकता रहा। एहतियातन मॉरीशस ने अपने संविधान में चागोस पर अपने दावे को दर्ज कर लिया। इसके बावजूद ब्रिटेन ने इस दावे को नजरअंदाज किया और अमेरिका के साथ मिलकर 1967 से 1973 के बीच डिएगो गार्सिया में एक विशाल सैन्य अड्डा स्थापित कर दिया। इसके साथ ही, ब्रिटेन ने चागोस द्वीपों में रहने वाले मूल निवासियों को जबरन वहां से हटा दिया, ताकि सैन्य अड्डा बिना किसी बाधा के संचालित हो सके।

अब बात 2017 की। मॉरीशस ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सामने चागोस पर अपने दावे को जोर-शोर से उठाया। इस प्रयास में उसे भारत का समर्थन भी मिला। महासभा ने भारी बहुमत से दो सवालों को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की राय के लिए भेजा। ये सवाल थे—

(i) “क्या 1968 में मॉरीशस को स्वतंत्रता दिए जाने के साथ, चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग करने के बाद, अंतरराष्ट्रीय कानून को ध्यान में रखते हुए, मॉरीशस की उपनिवेशवाद-उन्मूलन प्रक्रिया कानूनी रूप से पूरी हुई थी?”

और

(ii) “अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत, जिनमें उपर्युक्त प्रस्तावों में निहित दायित्व भी शामिल हैं, यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दर्न आयरलैंड द्वारा चागोस द्वीप समूह के निरंतर प्रशासन से क्या परिणाम उत्पन्न होते हैं—खासकर इस संदर्भ में कि मॉरीशस अपने नागरिकों, विशेष रूप से चागोसियन मूल के लोगों, के पुनर्वास कार्यक्रम को लागू करने में असमर्थ रहा है?”

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने 2019 में अपने फैसले में कहा कि “जब मॉरीशस ने स्वतंत्रता प्राप्त की, तब उसकी उपनिवेशवाद-उन्मूलन (डीकोलोनाइज़ेशन) की प्रक्रिया कानूनी रूप से पूरी नहीं हुई थी” और यह कि “यूनाइटेड किंगडम पर यह दायित्व है कि वह चागोस द्वीपसमूह पर अपने प्रशासन को यथाशीघ्र समाप्त करे।”

न्यायालय ने आगे कहा कि “सभी सदस्य देशों को मॉरीशस के उपनिवेशवाद-उन्मूलन की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग करना चाहिए।” इसके अलावा, आईसीजे ने यह भी राय दी कि “चागोस द्वीपसमूह में मॉरीशस के नागरिकों, विशेषकर चागोसियन मूल के लोगों, के पुनर्वास का मुद्दा संबंधित लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़ा है और इसे मॉरीशस के उपनिवेशवाद-उन्मूलन की प्रक्रिया पूरी करते समय महासभा द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए।”

आईसीजे की इस राय के बाद, मई 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया कि चागोस द्वीप मॉरीशस का हिस्सा हैं, ब्रिटेन को छह महीनों के भीतर चागोस द्वीपों से अपने औपनिवेशिक प्रशासन को बिना किसी शर्त के वापस लेना चाहिए, और सभी देशों को इस प्रक्रिया में सहयोग करना चाहिए। यह स्पष्ट रूप से अमेरिका की ओर संकेत था, जो डिएगो गार्सिया में अपने सैन्य अड्डे को बनाए हुए था।

हालांकि, अमेरिका के समर्थन के साथ ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस प्रस्ताव को नजरअंदाज कर दिया। लेकिन जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय जनमत लगातार मॉरीशस के पक्ष में मजबूत होता गया, ब्रिटेन ने अंततः 2022 में इस मुद्दे पर द्वीपीय देश मॉरीशस के साथ बातचीत करने का फैसला किया।

ये बातचीतें बेहद जटिल और लंबी रहीं, लेकिन ब्रिटेन जानता था कि अंततः उसे यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि चागोस द्वीप मॉरीशस का हिस्सा हैं। वहीं दूसरी ओर, मॉरीशस भी यह समझता था कि उसे उस भूमि को पट्टे पर देने पर सहमत होना पड़ेगा, जहां डिएगो गार्सिया में अमेरिका और ब्रिटेन का हवाई सैन्य अड्डा स्थित है। पिछले वर्ष फरवरी में ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता को स्वीकार किया था।

पिछले साल मई में ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत ब्रिटेन चागोस द्वीपों पर अपनी संप्रभुता छोड़ देगा और मॉरीशस डिएगो गार्सिया में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे को 99 वर्षों के लिए पट्टे पर देने पर सहमत होगा। इस पट्टे को आगे 40 वर्षों के लिए नवीनीकृत भी किया जा सकता है।

गौरतलब है कि ट्रंप ने पिछले साल ही डिएगो गार्सिया को पट्टे पर देने के इस समझौते पर सहमति जताई थी। हालांकि, यह साफ है कि ग्रीनलैंड के मामले में, जिसे वह खरीदना चाहते हैं, और डिएगो गार्सिया के मुद्दे पर एक जैसी स्थिति दिखाने के लिए अब वह ब्रिटेन पर डिएगो गार्सिया पर अपनी ‘संप्रभुता’ छोड़ने का आरोप लगा रहे हैं। ऐसा करते हुए वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की राय और संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के प्रस्ताव को नजरअंदाज कर रहे हैं। यह एक और स्पष्ट प्रमाण है कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून और नियमों के प्रति कोई सम्मान नहीं है।

ट्रंप की ‘ट्रुथ सोशल’ पोस्ट का निहितार्थ यह है कि वह एक ऐसे नए किस्म के अंतरराष्ट्रीय तंत्र की वापसी चाहते हैं, जिसमें ताकतवर देश जो चाहें कर सकें और कमजोर देशों को उनकी इच्छा स्वीकार करनी पड़े। संभव है कि दुनिया में यह स्थिति पहले भी किसी न किसी रूप में रही हो, लेकिन ट्रंप के दौर में यह रवैया पूरी तरह खुले और बेबाक रूप में सामने आ गया है।

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