
इन मामलों की कानूनी बारीकियों पर बहस हो सकती है। लेकिन मूल सवाल यही है कि जब जांच एजेंसी सीधे आपको रिपोर्ट करती हो और वही आपको क्लीन चिट दे तो क्या उसे निष्पक्ष माना जा सकता है।
राजनीति में विशेषाधिकार कोई नई बात नहीं है। जनता की सेवा के नाम पर सड़कों पर वीवीआईपी काफिलों से आम लोगों की आवाजाही रोकना हो या जनहित की योजनाओं को निजी एहसान की तरह पेश करना, राजनेताओं की यह प्रवृत्ति अब आम हो चुकी है। लेकिन सत्ता में आने के बाद जो सबसे बड़ा विशेषाधिकार नेता खुद को देते हैं, वह है अपने ऊपर लगे आरोपों में खुद ही जज, जूरी और जल्लाद बन जाना, चाहे मामला भ्रष्टाचार का ही क्यों न हो।
भारत में ऐसे मुख्यमंत्रियों का इतिहास रहा है। ताजा उदाहरण देश के दो दक्षिणी राज्यों आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से सामने आए हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों में अदालतों में मुकदमे झेल चुके थे, लेकिन सत्ता में लौटते ही वही मामले बंद हो गए। अदालतें वही रहीं, पुलिस वही रही—बदला तो सिर्फ़ इतना कि नेता विपक्ष से सत्ता में आ गए। सवाल यह है कि क्या विपक्ष में रहते हुए ये नेता राजनीतिक साज़िश का शिकार थे? या फिर सत्ता में आने के बाद उन्हें पावर के फायदे मिले?
चंद्रबाबू नायडू से जुड़े तीन मामले
पिछले कुछ महीनों में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू से जुड़े तीन बड़े मामले बंद कर दिए गए।
1. स्किल डेवलपमेंट घोटाला
9 सितंबर 2023 को तत्कालीन जगन मोहन रेड्डी सरकार की सीआईडी ने चंद्रबाबू नायडू को स्किल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में कथित 371 करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया था। सीआईडी का आरोप था कि नायडू सरकारी अधिकारियों और निजी कंपनियों सीमेंस व डिजाइनटेक ने मिलकर परियोजना की लागत बढ़ाई और धन की हेराफेरी की। नायडू को 53 दिन जेल में रहना पड़ा। स्वास्थ्य आधार पर आंध्र हाई कोर्ट से उन्हें जमानत मिली। 2024 के विधानसभा चुनाव में नायडू की पार्टी ने जगन की पार्टी को करारी शिकस्त दी और वे फिर से सत्ता में लौट आए। जनवरी 2026 में, जब सीआईडी सीधे नायडू सरकार को रिपोर्ट करने लगी, एजेंसी ने “सबूतों के अभाव” का हवाला देते हुए क्लोज़र रिपोर्ट दाख़िल कर दी। अदालत ने रिपोर्ट स्वीकार कर नायडू को क्लीन चिट दे दी।
2. शराब घोटाला मामला
दिसंबर 2025 में विजयवाड़ा की एसीबी अदालत ने नायडू के ख़िलाफ़ दर्ज शराब घोटाले का मामला बंद कर दिया। यह मामला जगन सरकार के दौरान दर्ज किया गया था, जिसमें कुछ डिस्टिलरी को अनुमति देने में अनियमितताओं का आरोप था और सरकारी खजाने को 1,300 करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही गई थी। अक्टूबर 2023 में दर्ज इस केस में ठीक दो साल सत्ता में रहने के बाद, नायडू सरकार के अधीन काम कर रही सीआईडी ने उन्हें दोषमुक्त बताते हुए एनओसी दे दी।
3. फ़ाइबरनेट घोटाला
दिसंबर 2025 में ही विजयवाड़ा एसीबी कोर्ट ने एपी फ़ाइबरनेट घोटाले में भी नायडू और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। इस मामले में 114 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप था। फरवरी 2024 में जगन सरकार की सीआईडी ने नायडू को मुख्य आरोपी बनाते हुए चार्जशीट दाख़िल की थी। आरोप था कि टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी कर कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद वही सीआईडी “मजबूत सबूत न होने” की बात कहने लगी। जहां जगन की पार्टी इन “स्वयं-क्लीन चिट” के ख़िलाफ राज्य में प्रदर्शन कर रही है, वहीं नायडू की पार्टी इन्हें चुनाव से पहले राजनीतिक प्रताड़ना बताकर ख़ारिज कर रही है।
सिद्धारमैया और मुडा मामला
कर्नाटक से भी ऐसा ही एक उदाहरण सामने आया। जुलाई 2024 में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर आरोप लगा कि मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) ने उनकी पत्नी को 14 कीमती प्लॉट आवंटित किए। विवाद बढ़ने पर मुख्यमंत्री ने खुद ही न्यायिक आयोग गठित कर दिया, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस पीएन देसाई ने की। इसके समानांतर लोकायुक्त और ईडी ने भी जांच शुरू की, लेकिन राज्य सरकार ने अपनी ही गठित न्यायिक समिति की रिपोर्ट को प्राथमिकता दी। सितंबर 2025 में आई रिपोर्ट ने मुख्यमंत्री को राहत दी। आयोग ने कहा कि कोई अवैधता नहीं हुई और नियमों की गलत व्याख्या निचले स्तर के अधिकारियों की गलती थी। कर्नाटक कैबिनेट ने रिपोर्ट स्वीकार कर ली और राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री पर मंडरा रहा संकट समाप्त हो गया।
कानूनी तौर पर भी सिद्धारमैया को बड़ी राहत मिली—पहले हाई कोर्ट ने ईडी के समन को रद्द किया और फिर जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को “राजनीतिक लड़ाइयों में इस्तेमाल होने” पर फटकार लगाई। पिछले हफ्ते लोकायुक्त पुलिस की “क्लोज़र रिपोर्ट” पर विशेष अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस रिपोर्ट में भी वही कारण—सबूतों की कमी। फैसला 22 जनवरी को आने की संभावना है।
योगी आदित्यनाथ और गायब होते मामले
दक्षिण के मामलों के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उदाहरण भी भुलाया नहीं जा सकता। सत्ता में आते ही उन्होंने 2007 के एक कथित हेट स्पीच केस में अपने ख़िलाफ अभियोजन की अनुमति वापस ले ली। इसके बाद यूपी विधानसभा में उत्तर प्रदेश आपराधिक कानून संशोधन विधेयक लाया गया, जिसके तहत 20,000 “राजनीतिक” मामलों को वापस लेने का प्रावधान किया गया। कानून बनते ही योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ 22 साल पुराने मामले मिनटों में खत्म हो गए।
‘वॉशिंग मशीन’ राजनीति
यह कहानी सिर्फ मुख्यमंत्रियों तक सीमित नहीं है। जैसे ही कोई नेता विपक्ष छोड़कर सत्तारूढ़ बीजेपी में शामिल होता है, ईडी-सीबीआई के मामले “धुल” जाने की चर्चा आम हो जाती है। प्रफुल्ल पटेल से लेकर हिमंता बिस्वा सरमा और सुवेंदु अधिकारी तक सूची लंबी है।
असली सवाल
इन मामलों की कानूनी बारीकियों पर बहस हो सकती है। लेकिन मूल सवाल यही है कि जब जांच एजेंसी सीधे आपको रिपोर्ट करती हो और वही आपको क्लीन चिट दे तो क्या उसे निष्पक्ष माना जा सकता है या फिर नेताओं को अपने ख़िलाफ मामलों की जांच स्वतंत्र और तटस्थ एजेंसियों को सौंपनी चाहिए, ताकि न सिर्फ़ काग़जों पर बल्कि जनता के मन में भी सच्चाई साफ हो सके? आज देश इन मामलों पर मज़ाक करने लगा है, लेकिन असल में यह मज़ाक हम सब पर है। क्या हमें कभी पूरी सच्चाई पता चलेगी या फिर राजनीतिक मामलों की यह चक्रीय प्रकृति हमें कभी सच्ची तस्वीर देखने ही नहीं देगी?
(द फेडरल सभी पक्षों के विचार और राय पेश करने की कोशिश करता है। लेखों में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक के हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)


