
ईरान संकट पर ट्रंप की सैन्य दखल की धमकी मानवाधिकार से ज्यादा सत्ता परिवर्तन की रणनीति दिखती है। इराक जैसा मॉडल दोहराया गया तो परिणाम वैश्विक होंगे।
Donald Trump Iran Crisis News: ईरान अतीत में कई संकटों का सामना कर चुका है। अमेरिका के नेतृत्व वाले सहयोगी देश समय-समय पर इस्लामिक गणराज्य की सरकार को गिराने की कोशिश करते रहे हैं। इन प्रयासों में अक्सर ईरान के भीतर मौजूद असंतुष्ट तत्वों का इस्तेमाल किया गया। लेकिन ईरान में जारी मौजूदा उथल-पुथल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दखल की धमकी सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है। चौंकाने वाली सिर्फ उनकी आक्रामकता नहीं, बल्कि यह भी है कि दुनिया के बाकी हिस्सों ने इसे लगभग सामान्य मान लिया है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत चाहे ट्रंप का कदम कितना ही अवैध क्यों न हो, अब उसे स्वीकार्यता मिलती दिख रही है।
मानवाधिकार या बहाना?
ट्रंप ने ईरान में प्रदर्शनकारियों की मौतों को दखल का कारण बताया है, लेकिन यह तर्क बेहद कमजोर लगता है। यह तो उस आरोप से भी हल्का है, जिसके तहत वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को ड्रग तस्करी गिरोह का सरगना बताकर अपहरण की कोशिश की गई थी। मादुरो के अपहरण के बाद ड्रग तस्करी का आरोप धीरे-धीरे गायब हो गया और ट्रंप का ध्यान वेनेजुएला के तेल पर केंद्रित हो गया उसके उत्पादन और व्यापार को नियंत्रित करने की मंशा के साथ। यह रवैया संप्रभुता की अवधारणा के प्रति ट्रंप की खुली अवहेलना को दर्शाता है।
ईरान में बीते कुछ दिनों में पुलिस कार्रवाई में 2,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों के मारे जाने और सैकड़ों की गिरफ्तारी की खबरें हैं। यदि ट्रंप वास्तव में मानव जीवन को लेकर चिंतित होते, तो वे म्यांमार, सूडान और यमन जैसे देशों पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे, जहां आंतरिक संघर्षों में हजारों लोग मारे गए हैं और अब भी मर रहे हैं।
जब 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद गाजा में इजरायल के भीषण हमले हो रहे थे, तब ट्रंप ने 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से “काम पूरा करने” की अपील की थी। यानी मानव जीवन के प्रति उनकी संवेदनशीलता का यही स्तर है। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने युद्धविराम जरूर कराया, लेकिन तब तक गाजा तबाह हो चुका था और करीब 70,000 फिलिस्तीनियों की जान जा चुकी थी। इसके बावजूद, अब मीडिया में ट्रंप का अगला निशाना ईरान ऐसे पेश किया जा रहा है मानो अमेरिका का हस्तक्षेप सबसे स्वाभाविक कदम हो।
इराक बनाम ईरान: बदला हुआ रवैया
2003 में इराक पर हमले से पहले तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने लंबा नैरेटिव तैयार किया था। इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर सामूहिक विनाश के हथियार रखने का आरोप लगाया गया। अल-कायदा, ओसामा बिन लादेन और 9/11 हमलों से सद्दाम को जोड़कर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश हुई। अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक गया, हालांकि रूस और फ्रांस के विरोध के बावजूद उसने इराक पर हमला कर दिया।बाद में साबित हुआ कि ये सारे तर्क झूठे थे। असल मकसद था सत्ता परिवर्तन।
इसके विपरीत, ट्रंप ने बिना किसी भूमिका के खुलेआम ईरान में सैन्य हस्तक्षेप की घोषणा कर दी है। संभावित हमला अयातुल्ला खामेनेई की व्यवस्था, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है। यह हमला जून 2025 में फोर्डो स्थित परमाणु रिएक्टर पर किए गए अमेरिकी मिसाइल हमले जैसा हो सकता है, जिसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को गंभीर नुकसान पहुंचाया था।
मोसाद की खुली भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की खुली भूमिका भी चौंकाने वाली है। आमतौर पर पर्दे के पीछे काम करने वाली मोसाद ने पहली बार खुले तौर पर ईरानी प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक पोस्ट में मोसाद ने कहा, सड़कों पर उतरिए, समय आ गया है। हम आपके साथ हैं सिर्फ शब्दों में नहीं, मैदान में भी।
बीते दो महीनों में 10 कथित मोसाद एजेंटों को फांसी दी जा चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 12 दिनों के युद्ध से पहले करीब 100 एजेंटों ने ईरान की वायु रक्षा प्रणाली और मिसाइल लॉन्चरों को नष्ट करने की तैयारी की थी।
ईरान पूरी तरह अलग-थलग
यूरोपीय देश, जो अमेरिका के सहयोगी हैं, ट्रंप का विरोध करने के मूड में नहीं दिखते। 2016 में ईरान परमाणु समझौता तोड़ने के वक्त भी उन्होंने विरोध नहीं किया। अब यूरोपीय संघ ने अमेरिकी प्रतिबंधों में और इजाफा करने की घोषणा कर दी है। रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा है, जबकि चीन सिर्फ औपचारिक विरोध तक सीमित रहने की संभावना रखता है। ऐसे में ईरान पूरी तरह अलग-थलग पड़ता दिख रहा है।
पहले भी नाकाम रहे हैं सत्ता परिवर्तन के प्रयास
ईरान में पहले भी कई बार सत्ता परिवर्तन की कोशिशें हुई हैं। 1980 में अमेरिकी उकसावे पर इराक के सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया, जिससे आठ साल लंबा युद्ध हुआ। इसके बावजूद इस्लामिक शासन न सिर्फ बचा रहा, बल्कि और मजबूत हुआ। हिजाब विवाद, महसा अमिनी की मौत के बाद महिलाओं के आंदोलन जैसे कई विरोध प्रदर्शन हुए, जिनकी वजहें वास्तविक और लोकतांत्रिक थीं। लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगियों ने हर बार इन्हें सत्ता परिवर्तन के औजार में बदलने की कोशिश की, जो अब तक विफल रही।
इस बार हालात अलग?
इस बार ईरान पहले से ज्यादा कमजोर जरूर दिख रहा है। वर्षों के आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय सहयोगियों को नुकसान और आंतरिक आर्थिक संकट ने सरकार की पकड़ ढीली की है। पर ट्रंप की यह धारणा कि सैन्य हस्तक्षेप से शासन गिर जाएगा, बेहद सतही है। ईरान की राजनीतिक संरचना गहरी और संस्थागत है। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स सिर्फ सैनिक नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध हैं। 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद भी व्यवस्था नहीं टूटी तुरंत नया नेतृत्व सामने आ गया।
इतिहास से सबक
इराक में अमेरिका को सद्दाम के बाद स्वागत की उम्मीद थी, लेकिन नतीजा अराजकता, गृहयुद्ध और इस्लामिक स्टेट का उदय रहा। आज खुद अमेरिका इराक युद्ध को रणनीतिक भूल मानता है। ईरान में अगर ट्रंप ने सैन्य दखल दिया, तो परिणाम भयावह हो सकते हैं। लगभग 50 साल बाद भी ईरान की बड़ी आबादी अमेरिका विरोधी है। इतिहास बताता है कि अंदरूनी जनआंदोलन से आया सत्ता परिवर्तन और बाहर से थोपा गया परिवर्तन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। ट्रंप को यह बात समझनी होगी।


