
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पांच दिन के विराम ने ईरान युद्ध में ठहराव दिया है। बढ़ते दबाव और असफल हमलों के बीच यह कदम शांति की दिशा या नई रणनीति का संकेत हो सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के बिजली संयंत्रों और ऊर्जा केंद्रों पर हमले रोकने की पाँच दिनों की घोषणा आश्चर्य से अधिक राहत देने वाली प्रतीत होती है। राहत इसलिए क्योंकि ट्रंप ने ईरान को होरमुज़ जलडमरूमध्य को मुक्त करने के लिए दिए गए 48 घंटे के अल्टीमेटम से पीछे हटने का फैसला किया। और यह आश्चर्यजनक भी नहीं है, क्योंकि ट्रंप पहले भी ऐसे अचानक फैसले लेते रहे हैं।
इस पाँच-दिवसीय विराम के साथ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह अस्थायी ठहराव लंबे समय या स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करेगा? संभावना यही है कि यह विराम दीर्घकालिक शांति की दिशा में कदम बन सकता है, क्योंकि पिछले चार हफ्तों में अमेरिका और इज़राइल को ईरान पर किए गए सैन्य हमलों से कोई ठोस सफलता नहीं मिली है। इसके विपरीत, ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई करता रहा है।
ट्रंप और इज़राइल के कुछ कट्टर समर्थकों को छोड़कर दुनिया के अधिकांश देशों ने इन हमलों को मनमाना, अवैध और बिना किसी उकसावे के माना। इन सैन्य कार्रवाइयों के उद्देश्य भी अस्पष्ट और अव्यावहारिक नजर आए। जैसा कि कहा जाता है कि जब दो हाथियों की लड़ाई होती है, तो नीचे की घास कुचल जाती है। यही स्थिति अरब खाड़ी देशों की रही, जो ईरान द्वारा उनके देशों में अमेरिकी हितों को निशाना बनाए जाने से पूरी तरह अचंभित रह गए। सऊदी अरब, कतर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत कोई भी इससे अछूता नहीं रहा।
अमेरिका की तथाकथित “सुरक्षा छत्रछाया” के बावजूद इन तेल-समृद्ध देशों को पहली बार एहसास हुआ कि उनकी सुरक्षा उतनी मजबूत नहीं जितनी मानी जाती थी। अमेरिका से उनकी नजदीकी ही उनके लिए खतरा बन गई, क्योंकि इससे वे ईरान के हमलों के सीधे निशाने पर आ गए।
इस दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन जैसे नेताओं ने खाड़ी देशों के शासकों से संपर्क बनाए रखा और स्पष्ट किया कि उनका निशाना वे नहीं, बल्कि उनके देशों में मौजूद अमेरिकी हित हैं। इसके बावजूद ये देश एक ऐसी भयावह स्थिति में फंस गए, जहां वे हमलों का शिकार तो बने, लेकिन कुछ कर नहीं सके।
28 फरवरी से शुरू हुए इस संघर्ष के चार हफ्तों में खाड़ी देशों ने लगातार अमेरिका और ईरान दोनों से तनाव कम करने की अपील की। वे अमेरिका पर हमले रोकने का दबाव भी डाल रहे थे, जिसे अमेरिका नजरअंदाज नहीं कर सका।स्थिति तब और बिगड़ गई जब इज़राइल ने साउथ पार्स गैस सुविधा पर हमला किया, जो ईरान और कतर की साझा संपत्ति है। कतर इससे स्तब्ध रह गया। इसके जवाब में ईरान ने रस लाफान पर हमला किया, जो कतर की ऊर्जा व्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। इससे अमेरिका और इज़राइल के बीच दरार साफ दिखाई देने लगी और ट्रंप ने खुद को इस हमले से अलग करते हुए नेतन्याहू को ईरान की गैस संरचना पर हमला न करने का निर्देश दिया।
ट्रंप द्वारा दिया गया अल्टीमेटम और होरमुज़ जलडमरूमध्य को लेकर दी गई धमकी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। ईरान ने चेतावनी दी कि यदि उस पर हमला हुआ तो वह खाड़ी देशों में अमेरिकी ऊर्जा ढांचे और जल शोधन संयंत्रों को निशाना बनाएगा, जो इस क्षेत्र की जीवनरेखा हैं। दुनिया सांस थामे 23 मार्च (सोमवार) की समयसीमा का इंतजार कर रही थी, लेकिन ट्रंप पीछे हट गए। यदि वे अपने धमकी पर अमल करते, तो यह पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित होता। इसलिए यह विराम स्थायी होना ही बेहतर है, क्योंकि आगे युद्ध जारी रहना विनाश को आमंत्रण देने जैसा होगा।
ट्रंप को शायद यह उम्मीद थी कि उनके यूरोपीय सहयोगी उनका साथ देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने सार्वजनिक रूप से नाटो और अन्य मित्र देशों की आलोचना भी की, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ चुका है।एक और कारण जिसने ट्रंप को पीछे हटने पर मजबूर किया, वह था इस युद्ध का मानवीय प्रभाव। ईरान में अस्पताल, स्कूल और मॉल तक निशाने पर आए, हजारों लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। लेकिन इसके बावजूद ईरान की जवाबी क्षमता और इच्छाशक्ति में कमी नहीं आई।
इज़राइल के लिए भी यह युद्ध उल्टा पड़ता नजर आया। ईरान के जवाबी हमलों ने इज़राइल की प्रसिद्ध “आयरन डोम” रक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया। अब इज़राइली अधिकारी अपनी सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा कर रहे हैं।इस संघर्ष ने इज़राइल की सैन्य छवि को नुकसान पहुंचाया, उसकी अजेयता की धारणा टूटी और उसका डिमोना परमाणु केंद्र भी खतरे में आ गया। कुल मिलाकर, इज़राइल को इस युद्ध से कोई ठोस लाभ नहीं मिला।
इन सब परिस्थितियों ने ट्रंप को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। खास बात यह है कि यह विराम ऐसे समय में आया है जब ट्रंप पहले ही युद्ध को “समाप्त करने” की बात कर चुके थे, इसलिए शांति की दिशा में यह एक तार्किक कदम लगता है।हालांकि, यह भी संभव है कि यह विराम केवल एक रणनीतिक चाल हो, ताकि अमेरिका भविष्य में फिर से हमला करने की तैयारी कर सके। ट्रंप की विश्वसनीयता ऐसी है कि उनके बयानों पर पूरी तरह भरोसा करना मुश्किल है। फिर भी, यह संभावना कम ही है कि अमेरिका दोबारा बड़े स्तर पर हमला करेगा, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि तथाकथित “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” वास्तव में एक व्यर्थ प्रयास था।


