
राफेल पर भारत के नए निर्णय ने ‘मेड-इन-इंडिया’ लड़ाकू विमानों में देरी पर बड़े सवाल खड़े किए हैं।
अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने घोषणा की थी कि भारत पहले से तय 126 राफेल लड़ाकू विमानों के बजाय 36 राफेल जेट विमानों को फ्लाई-अवे स्थिति में खरीदेगा। इसे सरकार-से-सरकार समझौता बताया गया था। इस अचानक की गई घोषणा के कारणों की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। लागत बढ़ गई क्योंकि भारत-विशिष्ट सुधार अब 126 के बजाय केवल 36 विमानों तक सीमित हो गए थे। समझौते पर सितंबर 2016 में हस्ताक्षर हुए और आपूर्ति 2019 से 2022 के बीच पूरी की गई।
तत्कालीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ विपिन रावत ने वायुसेना के पूर्व अधिकारियों के उस तर्क का खंडन किया था कि मिसाइलों के युग में लड़ाकू विमानों की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब ऐसा लगता है कि मिसाइलों की भूमिका भी मिनी-बॉम्बर के रूप में काम करने वाले ड्रोन से चुनौती का सामना कर रही है।
126 राफेल विमानों की खरीद का निर्णय रद्द किए जाने के दस वर्ष बाद, 13 फरवरी को रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने वायुसेना के 114 राफेल विमानों की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इनमें से 20 विमान फ्लाई-अवे स्थिति में खरीदे जाएंगे और 2030 तक वायुसेना में शामिल कर लिए जाएंगे। शेष विमान भारत में बेंगलुरु स्थित हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के सहयोग से बनाए जाएंगे।
यह विचार ऐसा है जिस पर आपत्ति नहीं की जा सकती, लेकिन यदि सरकार आवश्यक अनुसंधान और विकास ढांचे के निर्माण के लिए ठोस कदम नहीं उठाती, तो यह अधूरा ही रहेगा। 2016 में 36 लड़ाकू विमानों की लागत 59,000 करोड़ रुपये थी, जबकि 114 विमानों की अनुमानित लागत 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। भारत चाहता है कि राफेल में 50 से 60 प्रतिशत स्थानीय पुर्जों का उपयोग हो। तब यह रक्षा खरीद नीति के मानकों के अनुसार ‘मेड-इन-इंडिया’ राफेल जेट कहलाएगा।
राफेल-तेजस दुविधा
2015 में 126 राफेल सौदा रद्द होने और 2026 में 114 राफेल खरीद प्रस्ताव के बीच के दशक में यह चर्चा थी कि भारत का अपना हल्का लड़ाकू विमान तेजस राफेल की जगह ले सकता है। तेजस परियोजना 1980 के दशक से चली आ रही है। हालांकि, HAL की सीमित उत्पादन क्षमता के कारण वायुसेना के घटते स्क्वाड्रन बल को पर्याप्त तेजस विमान उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण रहा है। इसके अलावा, तेजस मार्क 1A और मार्क II दोनों को GE इंजन की आवश्यकता है। अब नई सोच यह प्रतीत होती है कि वायुसेना अपनी लड़ाकू क्षमता को मजबूत करने के लिए तेजस और राफेल दोनों विमानों का उपयोग करेगी। 2030 के दशक के उत्तरार्ध में एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।
संभव है कि तेजस और राफेल के बीच चयन को लेकर आंतरिक स्तर पर गहन विचार-विमर्श हुआ हो और यह निष्कर्ष निकला हो कि वायुसेना राफेल जैसे बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान के बिना काम नहीं चला सकती। साथ ही, राफेल के अधिग्रहण और उत्पादन से होने वाला तकनीकी उन्नयन भी आवश्यक समझा गया होगा।
यह भी स्पष्ट है कि लड़ाकू विमानों की खरीद के संबंध में सरकार के रुख में बदलाव आया है। राफेल को अंतिम रूप देने से पहले स्वीडन के ग्रिपेन, रूस के मिग-35 और अमेरिका के सुपर हॉर्नेट जैसे विकल्पों पर विचार किया गया था। 2012 में भारतीय वायुसेना ने राफेल को चुना था, लेकिन 2014 में सत्ता परिवर्तन के समय तक खरीद वार्ता अंतिम रूप नहीं ले सकी थी। उस समय की नीति के अनुसार 18 विमान फ्लाई-अवे स्थिति में खरीदे जाने थे और बाकी HAL के सहयोग से भारत में बनाए जाने थे। 2012 के समझौते के अनुसार HAL में राफेल का उत्पादन 2017 तक शुरू हो जाना था।
‘मेड-इन-इंडिया’ रक्षा निर्माण
126 राफेल विमानों को न खरीदने के अचानक निर्णय की पूरी व्याख्या न तो सरकार ने की और न ही रक्षा विशेषज्ञों ने। सरकार ने 2015 के अपने फैसले को लागत कारक का हवाला देकर उचित ठहराया। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका के जवाब में सरकार ने कहा कि ‘इन-बिल्ट मुद्रास्फीति’ और रुपये-यूरो विनिमय दर में उतार-चढ़ाव ने लागत को प्रभावित किया। यह तर्क कुछ कमजोर प्रतीत होता है।
सरकार की सोच यह थी कि विदेशों से हथियार खरीदने की परंपरा को तोड़कर घरेलू उत्पादन को विकसित किया जाए। विचार अच्छा है, लेकिन यदि आवश्यक अनुसंधान और विकास ढांचे के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर निवेश न किया जाए तो यह अधूरा रहेगा।भारत ने अपने नौसैनिक पोतों का निर्माण किया है और उसकी मिसाइल परियोजनाएँ सफल रही हैं, जिसका उदाहरण फिलीपींस को 370 मिलियन डॉलर में ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री है।
ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार स्वदेशी विमानन क्षमता विकसित करना चाहती थी और तेजस परियोजना को आधार बनाना चाहती थी। हालांकि, वायुसेना के पूर्व अधिकारी अधिक उन्नत और शक्तिशाली लड़ाकू विमान की आवश्यकता पर जोर देते रहे। यह तर्क भी दिया गया कि लड़ाकू विमानों का युग समाप्त हो चुका है।
114 राफेल विमानों के नए प्रस्ताव को 2007 की उस मूल सोच की ओर वापसी के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें मध्यम बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान की आवश्यकता बताई गई थी। दीर्घकाल में भारत को अपने स्वयं के लड़ाकू विमान विकसित करने ही होंगे।
रक्षा स्वदेशीकरण की चुनौती
घरेलू उत्पादन के माध्यम से सैन्य शक्ति निर्माण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता स्पष्ट है, लेकिन यह अभी व्यापक अनुसंधान और औद्योगिक ढांचे के निर्माण में पूरी तरह परिलक्षित नहीं होती। टाटा, अंबानी और अडानी जैसे बड़े औद्योगिक समूह विनिर्माण क्षेत्र में अग्रणी हो सकते हैं, लेकिन रक्षा उत्पादन के जटिल क्षेत्र में वे अभी शुरुआती चरण में हैं।
डिज़ाइन और इंजीनियरिंग से लेकर उत्पादन सुविधाओं तक संपूर्ण क्षमता विकसित करने की दिशा में ठोस पहल की आवश्यकता है। केवल इच्छा और संकल्प पर्याप्त नहीं होते। राफेल सौदे पर यू-टर्न को एक नीतिगत सुधार कहा जा सकता है, लेकिन समय और लागत के लिहाज से यह महंगा साबित हुआ है।
भारत को रक्षा निर्माण के क्षेत्र में अपनी वास्तविक क्षमताओं और सीमाओं का ईमानदार आकलन करना चाहिए। सरकार और बाहरी विशेषज्ञ चुनौतियों से अवगत हैं। आवश्यक है कि चुप्पी के बजाय एक स्पष्ट योजना सामने आए, जिसमें रक्षा अनुसंधान एवं विकास को सुदृढ़ करने की रणनीति हो। विश्वविद्यालयों के विज्ञान विभागों को भी इन परियोजनाओं से जोड़ा जाना चाहिए। निजी क्षेत्र के रक्षा निर्माता अनुसंधान केंद्रों के साथ समन्वय स्थापित कर सकते हैं।
वर्तमान व्यवस्था यह है कि लड़ाकू विमानों की खरीद के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की शर्त पर निर्भर रहा जाए और फिर उन्हें स्वदेशीकरण की दिशा में आगे बढ़ाया जाए। लेकिन दीर्घकालीन आत्मनिर्भरता के लिए इससे आगे बढ़कर ठोस अनुसंधान, विकास और औद्योगिक आधार तैयार करना अनिवार्य होगा।
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