D Ravikanth

शून्य टैरिफ का खतरा, क्या भारत अमेरिकी दबाव में गंवा रहा है अपनी स्वायत्तता?


शून्य टैरिफ का खतरा, क्या भारत अमेरिकी दबाव में गंवा रहा है अपनी स्वायत्तता?
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भारत-अमेरिका ट्रेड डील में शून्य टैरिफ और रणनीतिक रियायतों को लेकर चिंता बढ़ी है। आलोचकों का कहना है कि अल्पकालिक राहत के बदले भारत अपनी स्वायत्तता खो सकता है।

शून्य टैरिफ अमेरिकी एग्रीबिज़नेस को भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक अभूतपूर्व पहुंच देगा। अमेरिकी कॉरपोरेट हित भारत की वित्तीय प्रणाली में गहराई से पैठ बना रहे हैं; और भारत को राहत के भ्रम में अपनी स्वायत्तता नहीं बेचनी चाहिए। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा हाल ही में घोषित भारत–अमेरिका ट्रेड डील एक ऐतिहासिक आत्मसमर्पण का संकेत देती है। सिर्फ टैरिफ संप्रभुता का नहीं, बल्कि व्यापारिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का भी। जिस सरकार ने ‘मजबूत राष्ट्रवाद’ के वादे के साथ सत्ता हासिल की, उसके लिए यह दृश्य चौंकाने वाला है: भारत उस समझौते का जश्न मना रहा है, जो तेजी से वॉशिंगटन द्वारा थोपे गए एकतरफा आर्थिक सौदे जैसा दिखता है।

उदारता के नाम पर असमानता

2 फरवरी को समझौते की घोषणा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि भारत अमेरिकी कृषि और विनिर्मित उत्पादों पर टैरिफ और नॉन-टैरिफ बाधाएं शून्य कर देगा। इसके बदले अमेरिका भारतीय निर्यात पर लगने वाला तथाकथित “रेसिप्रोकल टैरिफ” 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा। यह पारस्परिकता नहीं है। यह असमानता को उदारता के रूप में पेश करना है।

ट्रंप ने 2 फरवरी को ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को बड़े पैमाने पर “BUY AMERICAN” के लिए प्रतिबद्ध किया है — जिसमें 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी ऊर्जा, तकनीक, कृषि उत्पाद, कोयला और अन्य सामानों की खरीद शामिल है। इसका अर्थ साफ है: अमेरिका के घरेलू राजनीतिक दबाव के दौर में भारत को अमेरिकी अतिरिक्त उत्पादन के लिए एक गारंटीड बाजार के रूप में स्थापित किया जा रहा है।

भारत की विदेश और ऊर्जा नीति में दखल

इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला ट्रंप का यह दावा था कि मोदी ने रूस से तेल खरीद रोकने और आयात को अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला की ओर मोड़ने पर सहमति जताई है। यह भारत की विदेश और ऊर्जा नीति में सीधा हस्तक्षेप है। ट्रंप ने यहां तक कहा कि इससे यूक्रेन युद्ध खत्म करने में मदद मिलेगी। यह बयान भू-राजनीति से ज्यादा भारत से अमेरिकी आज्ञाकारिता की अपेक्षाओं को दर्शाता है।

इन अपेक्षाओं की पुष्टि जल्द ही हो गई। नई दिल्ली में अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर ने स्पष्ट कर दिया कि रूस से तेल न खरीदने की भारत की सहमति के बदले ही 25 प्रतिशत का दंडात्मक टैरिफ हटाया गया जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हुआ। संदेश साफ था: ऊर्जा नीति, व्यापार पहुंच और विदेश नीति अब एक ही पैकेज में बांध दी गई हैं। रणनीतिक स्वायत्तता पर गर्व करने वाला भारत अब दशकों पुराने साझेदारों को छोड़कर एक अस्थिर अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकताओं के आगे झुकता दिख रहा है।

आभार लेकिन खुलासे नहीं

प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिक्रिया त्वरित और अत्यंत आभारपूर्ण थी। उन्होंने X पर पोस्ट कर “भारत के 1.4 अरब लोगों की ओर से” ट्रंप को धन्यवाद दिया और मेड इन इंडिया उत्पादों पर कम हुए टैरिफ का जश्न मनाया। लेकिन जो उन्होंने नहीं कहा, वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

मोदी ने शून्य टैरिफ और नॉन-टैरिफ बाधाओं को खत्म करने की कथित भारतीय प्रतिबद्धता का कोई जिक्र नहीं किया। बौद्धिक संपदा अधिकार, सेवाओं के व्यापार या इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी के मोरेटोरियम जैसे विवादित मुद्दों पर भी कोई स्पष्टता नहीं दी। जबकि इन पर बातचीत की पुष्टि वार्ता से जुड़े अधिकारियों ने की है।

सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने अमेरिकी कृषि आयात पर शून्य टैरिफ की बात पर चुप्पी साधे रखी। ऐसे देश में जहां 80 करोड़ से अधिक लोग खेती पर निर्भर हैं, जिनमें से अधिकांश के पास कुछ एकड़ से भी कम जमीन है। इसके उलट, अमेरिकी कृषि क्षेत्र लगभग 30,000 बड़े, भारी सब्सिडी पाने वाले उत्पादकों के हाथ में है, जो हर साल सैकड़ों अरब डॉलर का उत्पादन करते हैं। भारतीय कृषि — जो देश का सबसे बड़ा रोजगार क्षेत्र है आजीविका की असुरक्षा, कर्ज और कीमतों के झटकों से जूझ रही है।

एकतरफा सौदा

सात महीनों तक लगाए गए दंडात्मक टैरिफ पहले 25 प्रतिशत व्यापार अधिशेष के नाम पर और फिर रूस से तेल खरीदने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत के बाद अब 18 प्रतिशत टैरिफ को रियायत के तौर पर पेश किया जा रहा है। हकीकत यह है कि यह मनमाना और असंगत है। ट्रंप के MAGA गणित में पाकिस्तान पर 19 प्रतिशत, बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत और इंडोनेशिया पर 19 प्रतिशत टैरिफ है। भारत को मिली मामूली राहत उसके किए गए त्यागों से मेल नहीं खाती।अमेरिकी कृषि उत्पादों को शून्य टैरिफ देना जबकि पोल्ट्री जैसे उत्पादों पर लंबे समय से विवाद रहा है। उदारीकरण नहीं, बल्कि एकतरफा निरस्त्रीकरण है। एक पूर्व भारतीय व्यापार वार्ताकार ने चेताया कि अमेरिकी अनाज, डेयरी, पोल्ट्री, बकरी और भेड़ उत्पाद, जेनेटिकली मॉडिफाइड मक्का और सोया, फल और सब्जियों पर शून्य टैरिफ ग्रामीण भारत को तबाह कर सकता है। यह विचारधारात्मक डर नहीं, बल्कि आर्थिक गणना है।

शुरुआती असर दिखने लगा

इसके नतीजे सामने आने लगे हैं। नई दिल्ली ने कपास आयात शुल्क 11 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया है आधिकारिक तौर पर वस्त्र निर्यातकों की मदद के लिए। लेकिन इसका संभावित परिणाम गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना के लाखों छोटे कपास किसानों की तबाही हो सकता है, जबकि भारतीय वस्त्र अब भी अमेरिका में 50 प्रतिशत टैरिफ झेल रहे हैं। यह रणनीतिक समायोजन नहीं, बल्कि समर्पण है।

यूरोपीय संघ: एक रिहर्सल?

भारत–ईयू फ्रेमवर्क समझौता, जिसे सभी सौदों की जननी बताया गया था, अब अपवाद नहीं बल्कि एक रिहर्सल जैसा दिखता है। विश्लेषकों का कहना है कि ब्रसेल्स को दी गई रियायतें — व्यापक बाजार पहुंच, कार्बन बॉर्डर टैक्स और डिफॉरेस्टेशन पेनल्टी — वॉशिंगटन की मांगों से मिलती-जुलती हैं, शायद कम भी। एक पूर्व भारतीय दूत के अनुसार, अमेरिका को कृषि और सेवाओं में भारत ने और भी अधिक रियायतें दी हैं। यह भी सवाल है कि क्या भारत ने इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी के मोरेटोरियम को बढ़ाने की अमेरिकी मांग मान ली जिसे भारत ने मार्च 2024 में WTO बैठक में सख्ती से नकारा था।

खेती की रक्षा, जीएम फसलों का विरोध और खाद्य संप्रभुता जैसे पुराने रेड लाइन अब धुंधले पड़ते दिख रहे हैं। शून्य टैरिफ अमेरिकी एग्रीबिज़नेस को भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व प्रवेश देगा।

सेवाएं और वित्तीय जोखिम

सेवाओं के क्षेत्र में भी वही पैटर्न है। उदारीकरण के नाम पर अमेरिकी कॉरपोरेट हित भारत की वित्तीय प्रणाली में गहराई तक प्रवेश कर रहे हैं। बेंगलुरु की फिनटेक कंपनी एक्सियो का अमेज़न द्वारा अधिग्रहण और उसे डायरेक्ट लेंडिंग लाइसेंस मिलना इसका प्रतीक है। दिसंबर में, कथित तौर पर अमेरिकी और यूरोपीय बीमा कंपनियों के दबाव में, भारत ने बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत विदेशी स्वामित्व की अनुमति दी। उस क्षेत्र में जिसे WTO गठन के समय भी भारत ने बचाकर रखा था।

आधिकारिक तर्क पूंजी प्रवाह, प्रतिस्पर्धा, दक्षता पुराने हैं। वास्तविकता रणनीतिक जोखिम है। वित्तीय ढांचा केवल बाजार नहीं, बल्कि आर्थिक संप्रभुता की रीढ़ है। इसी बीच अमेरिका स्टील, एल्युमिनियम, वाहन, ऑटो पार्ट्स, तांबा, फर्नीचर, लकड़ी और ट्रकों पर 25 प्रतिशत सेक्शन 232 टैरिफ जारी रखे हुए है। WTO पैनल ने इन्हें अवैध बताया, लेकिन अमेरिका ने फैसला मानने से इनकार कर दिया। भारत के लिए बाध्यकारी नियम, अमेरिका के लिए छूट यही इस सौदे की असली पहचान है।

असली एजेंडा

भारतीय नागरिक समाज ने इस खतरे की चेतावनी पहले ही दे दी थी। फोरम फॉर ट्रेड जस्टिस के खुले पत्र — Why India Must Not Give in to US Tariff Blackmail — में कहा गया था कि टैरिफ केवल दबाव का साधन हैं, असली मांगें कहीं गहरी और स्थायी हैं। खतरा टैरिफ नहीं है। खतरा संप्रभुता का शांत, स्थायी क्षरण है।

इसमें पेटेंट एवरग्रीनिंग, जिससे भारत का जेनेरिक दवा उद्योग कमजोर होगा; डिजिटल टैक्स और डेटा लोकलाइजेशन को खत्म करना; अमेरिकी कंपनियों को सरकारी खरीद में तरजीह; और विदेश नीति को फिर से ढालने का दबाव रूस, ईरान और वेनेजुएला से तेल आयात घटाना, ब्रिक्स को कमजोर करना और स्थानीय मुद्रा व्यापार छोड़ना सब शामिल हैं।यह व्यापार वार्ता नहीं, रणनीतिक दबाव है।

असली कीमत

दांव पर बाजार पहुंच नहीं, बल्कि भारत का अपने आर्थिक और राजनीतिक भविष्य का फैसला खुद लेने का अधिकार है। जो समझौता अल्पकालिक टैरिफ राहत के बदले दीर्घकालिक नीति स्वायत्तता बेचता है, वह जीत नहीं कूटनीति के भेष में हार है।घरेलू मोर्चे पर मजबूती दिखाने और वॉशिंगटन को खुश करने की जल्दबाजी में मोदी सरकार उस खतरे को मोल ले रही है, जो निर्यात मंदी से कहीं बड़ा है निर्णय लेने की शक्ति का धीरे-धीरे एक विदेशी सत्ता को सौंपा जाना। असली खतरा टैरिफ नहीं है। असली खतरा संप्रभुता का मौन क्षरण है।

भारत को राहत के भ्रम में अपनी स्वायत्तता नहीं बेचनी चाहिए। यह क्षण पारदर्शिता, संसदीय निगरानी और लोकतांत्रिक बहस की मांग करता है। व्यापार नीति जनता के लिए होनी चाहिए न कि राजनीतिक छवि, डर या किसी विदेशी ताकतवर के तालियों के लिए।

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