
WTO में भारत ने चीन की पहल रोकी लेकिन अमेरिका की मांगें मान ली। ई-कॉमर्स और PSH मुद्दों पर रुख से नीति पर सवाल उठ रहे हैं।
कैमरून के याउंडे में WTO वार्ता के दौरान वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने ऐसा कदम उठाया जिसे असामान्य कहा जा सकता है। उन्होंने Mahatma Gandhi का हवाला देते हुए चीन-समर्थित पहल का विरोध किया, जबकि दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका की लगभग सभी मांगों को मान लिया। इसे एक तरह की चुनिंदा और व्यावहारिक साहस कहा जा सकता है।
उन्होंने कहा, “महात्मा गांधी जी के सत्य के सिद्धांत से प्रेरणा लेते हुए भारत ने निवेश सुविधा समझौते (IFD) जैसे विवादित मुद्दे पर अकेले खड़े होने का साहस दिखाया।” चीन-समर्थित प्रस्ताव, जिसे 130 देशों का समर्थन था, उसका विरोध करने पर भारत को सराहना मिली। लेकिन सवाल यह है कि यही गांधीवादी दृढ़ता अमेरिका के दबाव के सामने क्यों नहीं दिखी?
अमेरिका का दोहरा एजेंडा
सच्चाई यह है कि जब इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने के मोराटोरियम को बढ़ाने की बात आई—जो एक हानिकारक नीति मानी जा रही है—तब भारत ने विरोध नहीं किया, बल्कि झुक गया। अमेरिका याउंडे में दो मुख्य उद्देश्यों के साथ आया था कृषि क्षेत्र और सार्वजनिक भंडारण (PSH) कार्यक्रमों पर किसी स्थायी समाधान को रोकना, जिन पर भारत के 80 करोड़ गरीब किसान निर्भर हैं। ई-कॉमर्स ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी के स्थायी मोराटोरियम को हर हाल में लागू कराना।
यह कदम वैश्विक व्यापार या विकासशील देशों के हित में नहीं, बल्कि Google, Amazon, Facebook, Apple और Microsoft जैसी बड़ी टेक कंपनियों के हित में बताया जा रहा है।
ई-कॉमर्स ड्यूटी और भारत का रुख
भारत ने चीन की पहल का विरोध किया, लेकिन अमेरिका की मांगों के आगे झुक गया। इसका सीधा असर भारतीय किसानों पर पड़ सकता है, क्योंकि सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रमों पर कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया।अमेरिका ने PSH पर किसी भी समझौते को खत्म कर दिया। इसके बदले भारत को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। वहीं ई-कॉमर्स ड्यूटी पर 5 से 10 साल के मोराटोरियम की संभावना बढ़ गई है।
बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत ने ई-कॉमर्स मोराटोरियम को दबाव के रूप में इस्तेमाल कर PSH पर स्थायी समाधान क्यों नहीं हासिल किया? यह भारत के पास एक मजबूत सौदेबाजी का हथियार था, लेकिन इसका उपयोग नहीं किया गया।अमेरिका के कृषि लॉबी PSH कार्यक्रमों के खिलाफ हैं, यह सभी जानते हैं। इसके बावजूद भारत ने बिना किसी लाभ के समझौता कर लिया।
TRIPS विवाद और दबाव की राजनीति
अमेरिका TRIPS (बौद्धिक संपदा) से जुड़े विवादों पर भी मोराटोरियम खत्म करना चाहता है। भारत ने इसे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन अमेरिका ने इसे ठुकरा दिया।इसके साथ ही अमेरिका अफ्रीकी देशों पर AGOA (ड्यूटी-फ्री व्यापार योजना) के जरिए दबाव बना रहा है कि वे ई-कॉमर्स मोराटोरियम का समर्थन करें। इसे “डिप्लोमेसी” नहीं बल्कि “दबाव की राजनीति” कहा जा सकता है।
भारत की विदेश नीति पर सवाल
याउंडे में भारत ने चीन की पहल का विरोध किया, लेकिन अमेरिका की मांगों—ई-कॉमर्स मोराटोरियम, PSH पर समाधान रोकना, TRIPS विस्तार का विरोध—पर झुक गया।आलोचकों के अनुसार, यह नीति नहीं बल्कि दोहरे मानदंड का उदाहरण है। स्थिति स्पष्ट है या तो भारत को अमेरिका और चीन दोनों के प्रस्तावों का समान रूप से समर्थन या विरोध करना चाहिए था। लेकिन भारत ने तीसरा रास्ता चुना, चीन के खिलाफ कड़ा रुख
अमेरिका के सामने नरम रुख
इसका सबसे बड़ा असर भारत के किसानों पर पड़ सकता है, जिनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा इन नीतियों से जुड़ी है। अंततः सवाल यही है—क्या यह साहस है या रणनीतिक समझौता? आलोचकों के अनुसार, जब तक भारत अमेरिका के सामने भी उतनी ही मजबूती से “ना” नहीं कहेगा, जितनी चीन के सामने कहता है, तब तक इसे वास्तविक स्वतंत्र नीति नहीं माना जाएगा।
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