MR Narayan Swamy

31 मार्च के बाद ‘लाल आंदोलन’ इतिहास बनने की कगार पर, नक्सलवाद का अंत?


31 मार्च के बाद ‘लाल आंदोलन’ इतिहास बनने की कगार पर, नक्सलवाद का अंत?
x

1967 में शुरू हुआ नक्सल आंदोलन अब 31 मार्च के बाद खत्म होने की कगार पर है। सैन्य कार्रवाई और बदलते सामाजिक हालात के बीच माओवादी विचारधारा भी कमजोर पड़ती दिख रही है।

31 मार्च के साथ भारत में माओवादी आंदोलन, जिसे आम तौर पर नक्सलवाद कहा जाता है, औपचारिक रूप से एक अपमानजनक अंत की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह अंत काफी हद तक श्रीलंका के लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) जैसा माना जा रहा है। जिस तरह एलटीटीई का सफाया होने के बाद वह दोबारा खड़ा नहीं हो पाया, वैसे ही माना जा रहा है कि भारत में भी माओवादी आंदोलन फिर कभी अपने पुराने रूप में वापस नहीं आएगा। विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय माओवादियों के सामने केवल सैन्य हार ही नहीं, बल्कि वैचारिक पतन भी है, जिसके दूरगामी प्रभाव होंगे।

नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन

भारत में माओवादी आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। उस समय कुछ वामपंथी नेताओं ने चीन के नेता माओत्से तुंग की क्रांतिकारी रणनीति से प्रेरित होकर सशस्त्र आंदोलन शुरू किया था।लेकिन दशकों बाद यह आंदोलन अब कमजोर पड़ चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वह सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को समझने में असफल रहा। आज बड़ी संख्या में युवा—चाहे शहरों में हों या गांवों में—वर्ग संघर्ष और हिंसक क्रांति की विचारधारा से आकर्षित नहीं होते।

बदलती अर्थव्यवस्था और समाज

1960 और 1970 के दशक में भारत में गहरी गरीबी थी, जिसने उग्र वामपंथी आंदोलनों को जमीन दी। लेकिन पिछले कुछ दशकों में आर्थिक सुधारों और उदारीकरण के कारण लोगों की जीवन स्थितियों में कुछ सुधार हुआ है।हालांकि असमानता और गरीबी अब भी मौजूद है, लेकिन पहले जैसी चरम गरीबी नहीं रही। इसी कारण युवाओं में क्रांतिकारी हिंसा के बजाय बेहतर जीवन और अवसरों की चाह ज्यादा मजबूत हो गई है।

वैश्विक बदलावों का असर

सोवियत संघ के पतन और पूर्वी यूरोप में साम्यवादी शासन के खत्म होने के बाद दुनिया भर में मार्क्सवाद की चमक फीकी पड़ गई। यह भी एक बड़ा कारण रहा कि भारत में भी वामपंथी विचारधारा का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया। दिलचस्प बात यह है कि चीन, जिसने कभी माओ की क्रांति को दुनिया के सामने आदर्श के रूप में पेश किया था, उसने भी बाद में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को अपनाकर करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। माओ की प्रसिद्ध किताब ‘लिटिल रेड बुक’, जो कभी नक्सलियों के लिए प्रेरणा का स्रोत थी, आज चीन में भी लगभग अप्रासंगिक हो चुकी है।

सामाजिक योजनाओं का प्रभाव

भारत में केंद्र और राज्य सरकारों ने समय-समय पर दलितों, आदिवासियों और गरीबों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। इन योजनाओं ने धीरे-धीरे हाशिये पर रहे समुदायों को सामाजिक-आर्थिक रूप से ऊपर उठने का अवसर दिया। पिछले दो-तीन दशकों में दलितों और वंचित वर्गों के युवाओं को सरकारी और निजी नौकरियों में अवसर मिलने लगे। यह वही वर्ग था जो पहले नक्सल आंदोलन का आधार माना जाता था।

विश्वविद्यालयों में घटती दिलचस्पी

आज विश्वविद्यालयों में भी मार्क्सवाद और क्रांति पर चर्चा पहले जैसी लोकप्रिय नहीं रही। युवाओं के लिए बेहतर नौकरी, आर्थिक सुरक्षा और आधुनिक जीवनशैली ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। यही कारण है कि मुख्यधारा की वामपंथी पार्टियां भी अपने जनाधार को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

माओवादी नेतृत्व की भूल

माओवादी नेतृत्व ने इन बदलती परिस्थितियों को समझने में बड़ी गलती की। उन्हें विश्वास था कि जंगलों में उनका जो “राज्य के भीतर राज्य” जैसा ढांचा बना है, वह हमेशा सुरक्षित रहेगा और शायद एक दिन वे पूरे भारत में सत्ता हासिल कर लेंगे।लेकिन यह सपना उस दौर का था जब चीन में माओ की क्रांति सफल हुई थी। आज के भारत में ऐसा होना लगभग असंभव था।

संसदीय राजनीति को ठुकराने की कीमत

आपातकाल के बाद जब कुछ माओवादी समूहों ने संसदीय राजनीति का रास्ता अपनाया, तो भूमिगत माओवादी नेताओं ने उन्हें “संशोधनवादी” कहकर खारिज कर दिया। अब वही नेता, जो दशकों तक सशस्त्र संघर्ष का आह्वान करते रहे, अपनी जान बचाने के लिए आत्मसमर्पण कर रहे हैं।

एलटीटीई से समानता

माओवादियों की सबसे बड़ी गलती यह रही कि वे समय रहते पीछे हटना नहीं सीख पाए। यही गलती श्रीलंका के एलटीटीई ने भी की थी। दोनों आंदोलनों को यह भ्रम था कि उन्हें हराना असंभव है। एलटीटीई के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण अंत तक लड़ते हुए मारे गए। उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। इसके विपरीत भारत में कई माओवादी नेता अब मुख्यधारा में शामिल होने की जल्दी में हैं।

विचारधारा का पूर्ण पराभव

जो माओवादी कभी चुनाव लड़ने वालों की हत्या करते थे, मतदाताओं को धमकाते थे और मतदान केंद्रों पर हमले करते थे, वही आज उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बनने का वादा कर रहे हैं। यह स्थिति उस विचारधारा की पूर्ण हार को दर्शाती है जिसे वे दशकों तक प्रचारित करते रहे।

राज्य की निर्णायक कार्रवाई

कई वर्षों तक भारतीय राज्य ने माओवादियों के साथ एक तरह का “छिपा-छिपी” का खेल खेला। कभी उन्हें निशाना बनाया गया, तो कभी उन्हें सीमित रूप से अस्तित्व में रहने दिया गया। लेकिन हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने पहली बार माओवादी आंदोलन को राष्ट्रविरोधी और एक बीमारी करार देते हुए उसके खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ दिया। सुरक्षा बलों, अर्धसैनिक बलों और स्थानीय सहयोगियों के संयुक्त अभियान ने माओवादियों के सुरक्षित माने जाने वाले जंगलों को भी असुरक्षित बना दिया।

“प्रेरी फायर” का सपना अधूरा

1967 में जब चारु मजूमदार ने नक्सल आंदोलन की शुरुआत की थी, तब चीन के अखबार पीपुल्स डेली ने भविष्यवाणी की थी कि एक चिंगारी पूरे मैदान में आग लगा सकती है। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। कुछ छोटे-मोटे उभार जरूर हुए, पर समय के साथ उनकी चमक बुझती गई। मध्य भारत के जंगलों में लंबे समय तक जलती रही नक्सलवाद की आखिरी लौ भी अब 31 मार्च के बाद बुझती दिखाई दे रही है। और शायद इतिहास में यह आंदोलन एक ऐसे प्रयोग के रूप में दर्ज होगा, जो अपने समय की परिस्थितियों को समझने में असफल रहा।

(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)

Next Story