
वेनेजुएला में अमेरिका की कार्रवाई सिर्फ एक देश का संकट नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक मिसाल बन सकती है। आने वाले दिनों में इसके दूरगामी राजनीतिक, कूटनीतिक और सामाजिक असर देखने को मिल सकते हैं।
जो बात कल तक मजाक जैसी लगती थी, वह अब हकीकत बन चुकी है। अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के आधिकारिक आवास में घुसकर उन्हें और उनकी पत्नी को हिरासत में लिया और अमेरिका ले गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को जनता का समर्थन या सम्मान हासिल नहीं है। ट्रंप ने साफ कहा कि अमेरिका वेनेजुएला को तब तक चलाएगा, जब तक वहां 'सोच-समझकर सत्ता हस्तांतरण' नहीं हो जाता। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला की तेल अर्थव्यवस्था संभालेंगी। उनका दावा है कि यह सब वेनेजुएला की जनता के हित में होगा।
चिंता की बड़ी वजह
यह सिर्फ बाहरी ताकत द्वारा किया गया सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि किसी देश पर सीधा कब्ज़ा है। भारत को इस कदम का स्पष्ट और मजबूती से विरोध करना चाहिए, भले ही इससे ट्रंप नाराज हों। किसी संप्रभु देश की सीमाओं का सैन्य ताकत से उल्लंघन सामान्य नहीं बनाया जा सकता। यह समय तात्कालिक फायदे देखने का नहीं, बल्कि उन सिद्धांतों की रक्षा करने का है, जिनके कारण सैन्य ताकत रखने वाले और कमजोर देशों के बीच सह-अस्तित्व संभव हो पाता है।
लैटिन अमेरिका में डर का माहौल
लैटिन अमेरिका के अन्य देश भी चिंतित हैं। मादुरो पहले गुयाना के तेल संसाधनों पर दावा कर चुके थे। सवाल यह है कि क्या अब अमेरिका द्वारा संचालित वेनेजुएला उस दावे को आगे बढ़ाएगा और उस छोटे लेकिन तेल-समृद्ध देश को अपने कब्ज़े में लेने की कोशिश करेगा? हालांकि, वेनेजुएला के विपक्ष ने मादुरो को हटाए जाने का स्वागत किया था, लेकिन अब जब ट्रंप ने साफ कर दिया है कि देश विपक्ष नहीं बल्कि अमेरिका चलाएगा तो विपक्ष का रुख बदल सकता है।
क्यूबा एंगल: अगला निशाना?
क्यूबा उन देशों में शामिल माना जा रहा है, जिन्हें ट्रंप अपने मौजूदा क्षेत्रीय अभियान में निशाना बना सकते हैं। अमेरिका लंबे समय से लैटिन अमेरिका को अपना “पिछवाड़ा” मानता रहा है। क्यूबा मिसाइल संकट के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हुए समझौते के तहत अमेरिका ने क्यूबा से दूरी बनाए रखने का वादा किया था। लेकिन अब ट्रंप उस समझौते को नज़रअंदाज कर क्यूबा तक अपनी ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा वेनेजुएला द्वारा क्यूबा को दी जा रही आर्थिक और तेल सहायता अब रुक जाएगी, जिससे हवाना की पहले से कमजोर सरकार और दबाव में आ सकती है।
चीन और भारत के लिए क्या मायने?
अमेरिका ने खुद को ‘नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ का पैरोकार बताने की जो छवि बनाई थी, वह अब टूटती दिख रही है। ऐसे में चीन उन देशों के लिए एक केंद्र बिंदु बन सकता है, जो नियमों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था और साम्राज्यवाद के खिलाफ मजबूती चाहते हैं। भारत की गुटनिरपेक्ष नीति आज भी प्रासंगिक है, बशर्ते नई दिल्ली सिद्धांतों के पक्ष में मजबूती से खड़ी हो और समय-समय पर सही पक्ष चुने। कुछ लोग आशंका जता रहे हैं कि क्या चीन इस मौके का फायदा उठाकर ताइवान पर बलपूर्वक कब्ज़ा कर सकता है। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि चीन लंबा खेल खेलने में विश्वास करता है और खुद को साम्राज्यवादी ताकत के रूप में पेश करने से बचेगा।
यूरोप और यूक्रेन संकट पर असर
अमेरिका की वेनेजुएला कार्रवाई यूरोप के उस तर्क को कमजोर करती है, जिसके आधार पर वह यूक्रेन को समर्थन दे रहा है। यूरोपीय संघ का कहना है कि रूस को यूक्रेन की संप्रभुता का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन जब अमेरिका खुद वेनेजुएला की संप्रभुता तोड़ रहा है तो यूक्रेन के समर्थन में खड़े होने का नैतिक आधार कमजोर पड़ता है। ऐसे में यूरोप को रूस के साथ तनाव कम करने और युद्ध समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए। यदि ट्रंप ग्रीनलैंड (जो डेनमार्क का हिस्सा और NATO सदस्य है) पर भी कब्जे की कोशिश करते हैं तो यूरोप का रूस से समझौता लगभग तय माना जा रहा है।
क्या अमेरिका फिर वियतनाम जैसी गलती करेगा?
हालात अभी वियतनाम युद्ध जैसे नहीं हैं। अमेरिकी जनता खासकर ट्रंप का MAGA समर्थक वर्ग, विदेश में अमेरिकी सैनिकों की मौत के पक्ष में नहीं है। अगर वेनेजुएला को चलाने और वहां के तेल पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण स्थापित करने के दौरान अमेरिकी सैनिक मारे जाते हैं तो ट्रंप प्रशासन के लिए हालात बेहद खराब हो सकते हैं।
अमेरिका के भीतर भी बढ़ेगा तनाव
वेनेजुएला पर हमला अमेरिका के भीतर भी ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है। अमेरिका की आबादी में करीब 6.8 करोड़ हिस्पैनिक हैं, जो कुल जनसंख्या का लगभग 20% हैं। हालांकि, कुछ लोग अमेरिकी हस्तक्षेप का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में हिस्पैनिक नागरिक इस बात से नाराज हो सकते हैं कि ट्रंप लैटिन अमेरिका को एक विशाल ‘केला बागान’ की तरह देख रहे हैं, जहां अमेरिकी कंपनियां मुनाफा कमाएं। क्या इस असंतोष का फायदा चरमपंथी ताकतें उठाएंगी? यह अभी अटकल का विषय है, लेकिन इस संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।
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