
1967-73 के अरब-इज़राइल युद्धों के बाद बदले पश्चिम एशिया के समीकरण में आज ईरान इज़राइल से टकराव में है, जबकि अरब देश दूर हैं। इससे फिलिस्तीन सवाल और क्षेत्रीय राजनीति की जटिलता उजागर होती है।
1967 और 1973 में जब मिस्र, सीरिया और जॉर्डन ने अन्य अरब देशों के समर्थन से इज़राइल के खिलाफ युद्ध लड़ा था, तब ईरान उस संघर्ष का हिस्सा नहीं था। लेकिन पांच दशक से अधिक समय बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। आज ईरान इज़राइल के साथ युद्ध जैसी स्थिति में है, जबकि बाकी अरब देश उससे दूर हैं। यह विडंबनापूर्ण स्थिति पश्चिम एशिया में पैदा हुए मौजूदा संकट को समझने की एक अहम कुंजी भी है।
आज अगर इज़राइल बिना किसी क्षेत्रीय जवाबी कार्रवाई के डर के ईरान पर हमले कर पा रहा है, तो यह इस बात को भी दर्शाता है कि पिछले सात दशकों में अरब देश फिलिस्तीनियों के अधिकारों की रक्षा की अपनी लड़ाई में असफल रहे हैं। साथ ही उन्होंने कई रणनीतिक गलतियां भी कीं, जिनमें अमेरिका द्वारा रचे गए एक तरह के अस्तित्वगत जाल में फंस जाना भी शामिल है।
क्षेत्रीय संघर्ष की जड़ें
इज़राइल ने 1948 में खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया था। इसके बाद उसने धीरे-धीरे उस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर ली, जो कभी पूरी तरह फिलिस्तीन का इलाका माना जाता था। 75 साल बाद स्थिति यह है कि 1947 की संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना के तहत प्रस्तावित दो राष्ट्रों—इज़राइल और फिलिस्तीन—में से फिलिस्तीनी राष्ट्र की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है।
आज जब दुनिया इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष देख रही है, तो यह समझना जरूरी है कि दोनों देशों के बीच टकराव क्यों है। यह संघर्ष मूल रूप से फिलिस्तीन-इज़राइल विवाद से जुड़ा हुआ है।
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान ने खुलकर और आक्रामक रूप से एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य का समर्थन किया है और इज़राइल की वैधता पर सवाल उठाए हैं।
जब 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई, तब तक अरब देश 1967 और 1973 के दो बड़े युद्ध इज़राइल के खिलाफ लड़ चुके थे। इन युद्धों में अरब देश न केवल इज़राइल को हराने में असफल रहे, बल्कि उन्होंने फिलिस्तीन के पास मौजूद कई इलाकों—जिसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है—को भी खो दिया, जिन पर इज़राइल ने कब्जा कर लिया।1973 की हार के बाद अरब देशों ने व्यावहारिक रूप से इज़राइल के खिलाफ युद्ध करना बंद कर दिया। खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने की कोशिश भी ठंडी पड़ गई। फिलिस्तीनी राज्य की संभावित भूमि अंततः केवल गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक तक सीमित रह गई। हालांकि इन क्षेत्रों को सीमित स्वायत्तता दी गई, लेकिन वास्तविक नियंत्रण काफी हद तक इज़राइल के हाथ में ही रहा।
अरब देशों का रणनीतिक बदलाव
1948 से लेकर लंबे समय तक फिलिस्तीनियों ने मिस्र, इराक और सीरिया जैसे बड़े अरब देशों पर भरोसा किया था कि वे खोई हुई जमीन वापस दिलाने में मदद करेंगे। लेकिन व्यवहार में फिलिस्तीनी नेतृत्व को लगभग अकेला छोड़ दिया गया। अरब देशों ने लाखों फिलिस्तीनी शरणार्थियों को शरण दी, नागरिकता दी और प्रतिरोध समूहों को कुछ हद तक समर्थन भी दिया। लेकिन इससे फिलिस्तीन की जमीन वापस नहीं मिल सकी।
1973 की हार के बाद अरब देशों ने यह निष्कर्ष निकाला कि अमेरिका समर्थित इज़राइल को सैन्य रूप से हराना मुश्किल है। इसके बाद उन्होंने सोवियत संघ से दूरी बनाकर अमेरिका के साथ अपने संबंध मजबूत कर लिए। इस बदलाव की अगुवाई मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने की। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर की मध्यस्थता में कैंप डेविड समझौते के तहत इज़राइल के साथ शांति समझौता किया। इसके बाद पिछले पांच दशकों में कई शांति वार्ताएं हुईं, लेकिन फिलिस्तीनियों को इससे बहुत कम लाभ मिला।
इस दौरान इज़राइल ने खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया जो शत्रुतापूर्ण अरब देशों के बीच अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। साथ ही उसने वॉशिंगटन के साथ अपनी नजदीकियों का लाभ उठाकर खुद को एक मजबूत सैन्य शक्ति में बदल लिया।
खाड़ी देशों की कमजोर स्थिति
अमेरिका ने लंबे समय तक खुद को इस क्षेत्र में एक मध्यस्थ के रूप में पेश किया, लेकिन साथ ही उसने अरब देशों को धीरे-धीरे अपने प्रभाव में भी ले लिया। आर्थिक सौदे, सुरक्षा सहयोग और लोकतंत्र की छवि के जरिए अमेरिका ने इन देशों के शासकों को अपने करीब रखा। खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन और ओमान विशेष रूप से इसके प्रभाव में रहे क्योंकि ये सभी राजशाही व्यवस्था वाले देश हैं।
आज क्षेत्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखें तो खाड़ी देश सैद्धांतिक रूप से अपने यहां मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को बंद करवाने और अमेरिका पर ईरान पर हमले रोकने का दबाव डालने की स्थिति में होने चाहिए थे। लेकिन युद्ध शुरू होने के पांच दिन बाद भी वे अमेरिका पर ऐसा दबाव नहीं बना पाए हैं।
दूसरी ओर वे ईरान को भी यह समझाने में असमर्थ हैं कि वह उन पर हमला न करे, क्योंकि तेहरान का मानना है कि खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे वास्तव में अमेरिकी क्षेत्र की तरह ही हैं। इस प्रकार खाड़ी देश खुद को सबसे कमजोर स्थिति में पाते हैं वे न तो युद्ध रोक पा रहे हैं और न ही अपनी सुरक्षा को पूरी तरह सुनिश्चित कर पा रहे हैं।
क्षेत्रीय विभाजन और शक्ति संतुलन
समय के साथ अमेरिकी नीतियों ने पश्चिम एशिया में मौजूद पुराने विभाजनों को और गहरा किया। एक बड़ा विभाजन अरब दुनिया और ईरान के बीच है, क्योंकि ईरान अरब नहीं बल्कि फारसी राष्ट्र है। दूसरा बड़ा विभाजन इस्लाम के भीतर शिया और सुन्नी समुदायों का है। ईरान शिया नेतृत्व वाला देश है, जबकि मिस्र और अधिकांश खाड़ी देश सुन्नी बहुल हैं।
सीरिया की सरकार, जो ईरान के साथ खड़ी हो सकती थी, 2024 में गिर गई जब शिया राष्ट्रपति बशर अल-असद को एक सुन्नी विद्रोही नेता ने सत्ता से हटा दिया, जिसे कथित तौर पर अमेरिका और इज़राइल का समर्थन प्राप्त था।
ईरान की बदलती भूमिका
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया। पहले शाह के शासन में ईरान अमेरिका और इज़राइल का करीबी सहयोगी था।लेकिन क्रांति के बाद नई इस्लामी सरकार ने अमेरिका और इज़राइल दोनों के खिलाफ खुलकर विरोध का रुख अपना लिया।
1979 का अमेरिकी दूतावास बंधक संकट दोनों देशों के बीच संबंधों के पूरी तरह टूटने का कारण बना, और आज तक दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध बहाल नहीं हो पाए हैं। इज़राइल के लिए ईरान समय के साथ सबसे बड़े खतरे के रूप में उभर गया।
हालांकि लंबे समय तक अमेरिकी राष्ट्रपति इज़राइल की इच्छा के बावजूद ईरान पर सीधे हमले से बचते रहे। लेकिन इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप के करीबी संबंधों ने इस झिझक को खत्म कर दिया। पिछले साल हुए 12 दिन के युद्ध और उसके बाद शुरू हुआ मौजूदा संघर्ष इसी का परिणाम माना जा रहा है।
संघर्ष के बीच फंसे खाड़ी देश
ईरान पर हो रहे मिसाइल हमलों और उसके जवाबी हमलों ने खाड़ी देशों को एक कठिन स्थिति में डाल दिया है। एक तरफ वे अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं और उनके यहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। दूसरी ओर सऊदी अरब को छोड़कर बाकी कई खाड़ी देशों के ईरान के साथ अपेक्षाकृत अच्छे संबंध भी हैं। इस वजह से वे इस संघर्ष में प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ दिखाई देते हैं।
फिलिस्तीनियों की बढ़ती मुश्किलें
मिस्र जैसे कुछ अरब देशों में 2010 से 2014 के बीच हुए अरब स्प्रिंग आंदोलनों के दौरान ऐसा लगा था कि वे अमेरिकी प्रभाव से कुछ हद तक बाहर निकल सकते हैं। लेकिन अंततः अधिकांश देशों में पुरानी व्यवस्था ही लौट आई। मौजूदा मिसाइल युद्ध भी संभवतः किसी समय थम जाएगा। लेकिन संकेत यही हैं कि यह संघर्ष अंततः गतिरोध में खत्म हो सकता है, जिसमें किसी भी पक्ष को स्पष्ट जीत नहीं मिलेगी। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान फिर से फिलिस्तीनियों का ही होने की आशंका है।
गाजा में पहले ही इज़राइल के सैन्य अभियान से भारी तबाही हो चुकी है, जो पिछले साल युद्धविराम के बाद रुका था। ऐसे में एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की संभावना और दूर होती दिखाई दे रही है।इतना ही नहीं, यह भी आशंका है कि फिलिस्तीनियों के लिए वेस्ट बैंक में बची सीमित स्वायत्तता और गाजा के बचे हुए हिस्से को भी बनाए रखना भविष्य में और मुश्किल हो सकता है।


