
ईरान युद्ध ने पश्चिमी देशों की नैतिकता, लोकतंत्र और मानवता के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ईरान में चल रहा युद्ध, जिसकी शुरुआत इज़राइल और अमेरिका ने की, वैश्विक स्तर पर व्यापक निंदा के बावजूद लगातार जारी है और इसका कोई अंत नजर नहीं आ रहा। जनमत की मानो कोई अहमियत नहीं रह गई है, क्योंकि दो लोकतांत्रिक देशों के नेता अपने घोषित लक्ष्यों के तहत एक प्राचीन सभ्यता को “पाषाण युग” में धकेलने की कोशिश करते दिखते हैं।
अमेरिका और इज़राइल दोनों लोकतांत्रिक देश हैं, जो सार्वजनिक रूप से मानवतावादी मूल्यों और हर मानव जीवन की अहमियत पर जोर देते हैं। लेकिन यह उनके कार्यों में दिखाई नहीं देता। उनके लक्ष्यों की स्पष्टता भी संदिग्ध है, फिर भी वे अपने अभियान को जारी रखे हुए हैं। उनकी आलोचना करना सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाता है, जिसका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ता।
पश्चिमी नैतिकता का विरोधाभास
इज़राइल और अमेरिका दोनों पश्चिमी सैन्य शक्तियाँ हैं। भले ही इज़राइल भौगोलिक रूप से एशिया में स्थित हो, लेकिन वह पश्चिमी हितों का प्रतिनिधित्व करता है। पश्चिम अक्सर भारत जैसे देशों की आलोचना करता है, जहाँ समाज में संरचनात्मक हिंसा (जैसे जाति, गरीबी आदि) अधिक दिखाई देती है। लेकिन जब वही पश्चिम ईरान जैसे अभियानों में शामिल होता है, तो उसके मानवतावादी मूल्य गायब हो जाते हैं।
यह समझना मुश्किल है कि कैसे वे एक ओर मानवता की बात करते हैं और दूसरी ओर एक ऐसे देश के खिलाफ युद्ध अपराधों में शामिल होते हैं, जिसने अपनी आंतरिक समस्याओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण व्यवहार किया है।
संरचनात्मक हिंसा और भारतीय समाज
‘संरचनात्मक हिंसा’ प्रत्यक्ष हिंसा नहीं होती, बल्कि यह असमान सामाजिक व्यवस्थाओं—जैसे नस्लवाद, गरीबी और लैंगिक भेदभाव—में छिपी होती है। इससे स्वास्थ्य असमानता, मृत्यु दर और जीवन की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।भारत में यह संरचनात्मक हिंसा मुख्यतः जाति व्यवस्था से जुड़ी रही है, जिसकी जड़ें हजारों साल पुरानी ब्राह्मणवादी वर्चस्व की प्रक्रिया में देखी जाती हैं। 1947 के बाद लागू किए गए आरक्षण जैसे उपाय भी अपने लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं कर सके।
हिंदू धर्म का भी कोई एक स्रोत नहीं है, बल्कि यह विभिन्न आदिवासी और स्थानीय मान्यताओं के सम्मिलन से विकसित हुआ है। भारत में संघर्ष मुख्यतः आंतरिक रहा—एक समूह का दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित करने का—न कि बाहरी विस्तार का। शायद यही कारण है कि भारतीयों ने उपमहाद्वीप के बाहर विजय अभियानों का प्रयास कम किया।
मानव जीवन की श्रेणियाँ
यहूदी-ईसाई धर्मों की उत्पत्ति एक ही स्रोत से मानी जाती है। यहूदी धर्म में ‘चुने हुए लोगों’ की अवधारणा है, जबकि ईसाई धर्म ने धर्मांतरण के जरिए विस्तार किया।समय के साथ धार्मिक समुदाय राष्ट्रीय पहचान में बदल गए और “अपने लोगों” को अधिक महत्व दिया जाने लगा। जो इस दायरे से बाहर थे, उन्हें ‘पैगन’ कहकर कमतर माना गया।
आज भी लोकप्रिय संस्कृति में इसके उदाहरण मिलते हैं। जैसे एक टीवी श्रृंखला में दुश्मन राजा को अमानवीय रूप में दिखाकर उसके साथ क्रूर व्यवहार को सही ठहराया जाता है। इसी तरह आधुनिक राजनीति में भी विरोधियों को “बुराई” का प्रतीक बताकर उनके खिलाफ हिंसा को वैध ठहराया जाता है।
पश्चिमी उदारवाद की सीमाएं
अमेरिका आज बहुसांस्कृतिक समाज है, लेकिन व्यवहार में वह पश्चिमी और श्वेत समाजों को ही “मानवता” का असली प्रतिनिधि मानता है। यही सोच उपनिवेशवाद और मूल अमेरिकियों के विनाश को सही ठहराने में इस्तेमाल हुई। अमेरिकी उदारवादी ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’, बाल शोषण, और LGBTQ अधिकारों जैसे मुद्दों पर मुखर रहते हैं, लेकिन उनका दायरा सीमित रहता है। “ब्लैक लाइव्स मैटर” जैसे आंदोलन अमेरिका में उथल-पुथल मचा देते हैं, लेकिन “ईरानी जीवन भी मायने रखते हैं” जैसी कोई समान भावना नहीं दिखती।
फिल्मों और मीडिया में भी यही असंतुलन दिखता है—जहाँ अमेरिकी सैनिकों की मौत पर शोक मनाया जाता है, वहीं दूसरे देशों के लोगों की मौत को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
अमेरिकी उदारवादियों की चुप्पी
अमेरिका में कुछ बुद्धिजीवी हैं जो इन मुद्दों को समझते हैं, लेकिन उनकी आवाज़ मुख्यधारा मीडिया में कम सुनाई देती है। कुछ विशेषज्ञों ने तो यहां तक कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार अमेरिकी और इज़राइली नेतृत्व युद्ध अपराधों के दोषी हो सकते हैं।फिर भी, अमेरिकी उदारवादी इस युद्ध पर व्यापक विरोध नहीं करते। उनका विरोध अक्सर केवल संवैधानिक मुद्दों तक सीमित रहता है। वे भी एक तरह से “अपने लोगों” के दायरे में ही सोचते हैं।
क्या शासन परिवर्तन संभव है?
ईरान की सरकार को दमनकारी माना जाता है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन क्या किसी देश को बमबारी करके “पाषाण युग” में भेज देना वास्तव में शासन परिवर्तन ला सकता है?इतिहास बताता है कि बाहरी हमलों के दौरान आमतौर पर जनता अपने देश के साथ खड़ी हो जाती है। ऐसे में इस तरह के हमले आंतरिक विरोध को कमजोर कर सकते हैं।अगर कुछ प्रवासी ईरानी शासन परिवर्तन की उम्मीद करते हैं, तो यह जरूरी नहीं कि यह पूरे ईरान की आवाज़ हो।
ईरान पर हमला शायद वहां के अंदर मौजूद विरोध को और कमजोर कर चुका है। पहले से ही संकेत थे कि शासन परिवर्तन आसान नहीं होगा, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया गया।अब सवाल यह है कि जब दुनिया के कुछ देशों के लिए दूसरे देशों के लोगों का जीवन इतना कम मूल्य रखता है, तो इस युद्ध को रोका कैसे जा सकता है?फिलहाल, ऐसा लगता है कि सिर्फ ईंधन की बढ़ती कीमतें ही इस विनाश को धीमा कर रही हैं।
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