Subir Bhaumik

जेंडर बराबरी बनाम कट्टरता, क्या जमात बांग्लादेश को पीछे धकेल रही है?


जेंडर बराबरी बनाम कट्टरता, क्या जमात बांग्लादेश को पीछे धकेल रही है?
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जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान ने महिलाओं के लिए काम के घंटे और दिन कम करने की मांग की ताकि वे परिवार पर ध्यान दे सकें। फोटो: X/@Drsr_Official

कामकाजी महिलाओं पर जमात प्रमुख की टिप्पणी से बांग्लादेश में सियासी भूचाल आ गया है। बयान से महिला नेता नाराज़ हैं और इस्लामवादी गठबंधन संकट में है।

कामकाजी महिलाओं को लेकर जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान की विवादित टिप्पणी ने बांग्लादेश की इस्लामवादी राजनीति में भूचाल ला दिया है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (NCP) का गठबंधन अग्रणी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में नजर आ रहा था।

लंबे समय तक सत्ता में रही अवामी लीग के 12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनावों से बाहर होने और इस सर्दी में उसके छात्र संगठन द्वारा कई अहम विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव जीतने के बावजूद, जमात-ए-इस्लामी 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के बाद अपने सबसे मजबूत दौर में दिख रही थी। बड़ी संख्या में नए और युवा मतदाता जमात–एनसीपी गठबंधन को मौका देना चाहते थे, क्योंकि वे अवामी लीग और BNP—दोनों की पिछली सरकारों से निराश थे। एनसीपी का नेतृत्व उन छात्र-युवा नेताओं के हाथ में है, जिन्होंने जुलाई-अगस्त 2024 के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके चलते शेख हसीना सरकार सत्ता से बाहर हुई।

महिला नेताओं का गठबंधन से बाहर होना

लेकिन इस इस्लामवादी गठबंधन को पहला बड़ा झटका तब लगा, जब कई प्रभावशाली युवा महिला नेताओं ने एनसीपी छोड़ दी। इनमें यूके में शिक्षित मेडिकल प्रैक्टिशनर तस्नीम जारा जैसी हस्तियां शामिल हैं। इन महिला नेताओं का मानना था कि पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर एनसीपी जुलाई-अगस्त आंदोलन की उस विरासत से समझौता कर रही है, जिसमें महिला सशक्तिकरण का वादा किया गया था।

एनसीपी की परिकल्पना मौजूदा अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार और नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने की थी। ऐसे में महिला कार्यकर्ताओं और नेताओं को तब और संदेह हुआ, जब यूनुस ने शिरीन हक के नेतृत्व वाले महिला आयोग की सिफारिशों को लागू करने से पीछे हटने का फैसला किया। शिरीन हक प्रभावशाली महिला संगठन ‘नारीपोक्खो’ की प्रमुख हैं। यूनुस लंबे समय तक सुधारों की बात करते रहे, लेकिन जब इस्लामवादी कट्टरपंथियों ने महिला आयोग की सिफारिशों खासतौर पर विरासत, संपत्ति, विवाह और तलाक में लैंगिक समानता की मांग के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन किया, तो वे पीछे हट गए।

उस रैली में साड़ी पहने एक महिला के पुतले को निर्वस्त्र कर चप्पलों से पीटा गया, जिसने महिला सशक्तिकरण को लेकर इस्लामवादी गुस्से को साफ तौर पर उजागर कर दिया।

जमात का सख्त रुख

जमात-ए-इस्लामी प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान इस मुद्दे को यहीं खत्म करने के मूड में नहीं दिखे। उन्होंने महिलाओं के लिए काम के घंटे और दिन कम करने की मांग की, ताकि वे परिवार पर अधिक ध्यान दे सकें। इसके बाद अल जज़ीरा को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने बयान को और तीखा बना दिया।

उन्होंने कहा, “महिलाओं को लेकर जमात का रुख न तो भ्रमित है और न ही माफी मांगने वाला, बल्कि सिद्धांत आधारित है। हम नहीं मानते कि महिलाओं को नेतृत्व में आना चाहिए। जमात में यह असंभव है। अल्लाह ने इसकी अनुमति नहीं दी है।”

हैरानी की बात नहीं कि 300 सदस्यीय संसद के लिए जिन 179 सीटों पर जमात चुनाव लड़ रही है, उनमें एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा गया है।

यहीं नहीं, जमात प्रमुख ने कामकाजी महिलाओं को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि आधुनिकता के नाम पर जब महिलाओं को घर से बाहर धकेला जाता है, तो वे शोषण, नैतिक पतन और असुरक्षा के शिकार होती हैं। उन्होंने इसे “वेश्यावृत्ति का एक और रूप” तक बता दिया। महिलाओं के वस्तुकरण को उन्होंने प्रगति नहीं, बल्कि नैतिक पतन का संकेत करार दिया।

बढ़ता विरोध और ऐतिहासिक संदर्भ

कामकाजी महिलाओं को “वेश्याएं” कहे जाने से बांग्लादेश में भारी आक्रोश फैल गया है। यह वह देश है, जहां लैंगिक सशक्तिकरण चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ा है और अवामी लीग के 15 वर्षों के शासनकाल में इसे बड़ी मजबूती मिली।

जमात प्रमुख का महिलाओं के नेतृत्व के खिलाफ रुख बांग्लादेश के हालिया इतिहास से भी टकराता है, जहां 1991 में सैन्य शासन खत्म होने के बाद से खालिदा ज़िया और शेख हसीना जैसी दो शक्तिशाली महिलाएं बारी-बारी से प्रधानमंत्री रहीं।

देश में तारण हलीम (अवामी लीग) और रुमिन फरहाना (BNP) जैसी प्रभावशाली महिला सांसद, बैरिस्टर तानिया आमिर जैसी वकील, सुल्ताना कमाल और शिरीन हक जैसी मानवाधिकार कार्यकर्ता और अभिनेत्री-कार्यकर्ता रोकैया प्राची जैसी सांस्कृतिक हस्तियां रही हैं।

बैरिस्टर तानिया आमिर ने कहा, “जमात एक झटके में महिला सशक्तिकरण को खत्म करना और उस धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक बंगाली संस्कृति को नष्ट करना चाहती है, जिसने बांग्लादेश को जन्म दिया। अगर यह सत्ता में आई, तो न केवल महिलाओं को घर की चारदीवारी में धकेल देगी, बल्कि 1972 के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संविधान को भी पलट देगी।”

उन्होंने याद दिलाया कि उन्होंने ही जमात-ए-इस्लामी का राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण रद्द कराने की कानूनी लड़ाई लड़ी थी, क्योंकि उसका एजेंडा बांग्लादेश की राजनीतिक आत्मा के खिलाफ है।

पश्चिम और इस्लामीकरण को लेकर सवाल

कई लोगों ने पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, पर भी सवाल उठाए कि वे जमात-ए-इस्लामी को एक ‘मध्यमार्गी मुस्लिम पार्टी’ के रूप में पेश कर उसका समर्थन कर रहे हैं। कपड़ा मजदूर सबीना अख्तर ने कहा, “अब जब जमात प्रमुख ने महिलाओं को लेकर अपना असली चेहरा दिखा दिया है, तो पश्चिम के पाखंडियों को सच स्वीकार करना चाहिए।”

उन्होंने बताया कि बांग्लादेश के वस्त्र उद्योग में 70 प्रतिशत श्रमिक महिलाएं हैं। “हमारा गारमेंट उद्योग सिर्फ विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत नहीं है, बल्कि इसने गरीब महिलाओं को सशक्त भी किया है। ये मौलवी दान पर जीते हैं, लेकिन हमें अपने परिवार पालने के लिए काम करना पड़ता है। क्या इससे हम वेश्याएं बन जाती हैं?” उन्होंने गुस्से में कहा और महिलाओं से जमात उम्मीदवारों के खिलाफ वोट देने की अपील की।

इस्लामवादी कब्जे की आशंका

अभिनेत्री-कार्यकर्ता रोकैया प्राची ने चेतावनी देते हुए कहा, “जमात-ए-इस्लामी और उसके मुख्य संरक्षक मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश को ‘बंगाली पाकिस्तान’ में बदलने की योजना बना रहे हैं। इसमें महिलाएं और अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा असुरक्षित होंगे।”

शेख हसीना सरकार के पतन के बाद महिलाओं के खिलाफ हिंसा, खासकर बलात्कार के मामलों में चिंताजनक वृद्धि हुई है। महिलाओं को फुटबॉल खेलने से रोका गया, और हिजाब या बुर्का न पहनने पर पीटा गया। अब जब जमात प्रमुख खुले तौर पर महिलाओं के रोजगार और नेतृत्व का विरोध कर रहे हैं, तो गरीब तबकों में डर बढ़ रहा है, जो घरेलू आय बढ़ाने के लिए महिलाओं की कमाई पर निर्भर हैं।

कई विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति अंततः BNP को फायदा पहुंचा सकती है। पार्टी के नए चेयरपर्सन तारीक रहमान अपनी बेटी बैरिस्टर जाइमा रहमान को भविष्य की नेता के रूप में आक्रामक ढंग से पेश कर रहे हैं। खालिदा ज़िया की तरह, जिन्होंने इस्लामवादी नेताओं से मुलाकात करते हुए भी अपनी पहचान से समझौता नहीं किया, जाइमा रहमान शिक्षित युवा महिलाओं के बीच BNP की पकड़ मजबूत कर सकती हैं।

(द फेडरल सभी पक्षों के विचार और राय पेश करने की कोशिश करता है। लेखों में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक के हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दर्शाते हों।)

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