
केरल में LPG की कमी से 40% भोजनालय बंद हो चुके हैं और उसका असर बुजुर्गों पर खासतौर से पड़ा है। समाधान के लिए बिजली आधारित कुकिंग और सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है।
व्यावसायिक भोजनालयों में रसोई गैस (LPG) की कमी का असर अलग-अलग राज्यों और शहरों में अलग तरह से दिखाई दे रहा है। लेकिन केरल में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यहाँ बड़ी संख्या में लोग कम से कम एक मुख्य भोजन के लिए घर के बाहर बने खाने पर निर्भर रहते हैं। समाज के सबसे कमजोर वर्ग जो गरीब हैं, बुजुर्ग हैं और जिनके साथ जीवनसाथी या बच्चे नहीं रहते उनकी देखभाल राज्य सरकार की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत की जाती है। इन योजनाओं में उन्हें डे-केयर केंद्रों में लाना और मुफ्त भोजन उपलब्ध कराना शामिल है।
केरल में देश के सभी राज्यों की तुलना में सबसे अधिक बुजुर्ग आबादी है करीब 16 प्रतिशत, जबकि राष्ट्रीय औसत 11 प्रतिशत से कम है। इनमें से कई लोग आर्थिक रूप से घर पर खाना बना सकते हैं, लेकिन वे बाहर से पका हुआ भोजन मंगाना पसंद करते हैं। यह आपूर्ति अक्सर छोटे पारिवारिक व्यवसायों या संगठित भोजनालयों के जरिए होती है। लेकिन रसोई गैस की कमी ने इस पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर दिया है।
40% भोजनालय बंद, श्रमिक संकट भी गहराया
केरल की एक अतिरिक्त समस्या यह है कि राज्य के भोजनालयों में बड़ी संख्या में उत्तर और पूर्व भारत से आए प्रवासी मजदूर काम करते हैं। स्थानीय लोग उन्हें सामान्यतः “बंगाली” कहते हैं, हालांकि यह एक व्यापक शब्द है। चुनाव के समय इनमें से कई मजदूर अपने राज्यों में लौट जाते हैं, जिससे श्रमिकों की कमी और बढ़ जाती है। इसी के चलते राज्य में गैस और श्रमिक दोनों का संकट पैदा हो गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के लगभग 40 प्रतिशत भोजनालय बंद हो चुके हैं।
इसका असर केवल होटल-रेस्टोरेंट तक सीमित नहीं है। कामकाजी परिवार, छात्रावास (हॉस्टल), अस्पताल (जहाँ चैरिटी संस्थाएं भोजन उपलब्ध कराती हैं), मंदिर और श्मशान घाट तक प्रभावित हो रहे हैं।
भारत के लिए दीर्घकालिक समाधान: बिजली आधारित कुकिंग
भारत के लिए दीर्घकालिक समाधान यह है कि रसोई गैस और प्राकृतिक गैस की जगह बिजली को खाना पकाने का मुख्य माध्यम बनाया जाए। इसमें सबसे प्रभावी तकनीक इंडक्शन स्टोव है। जहां प्राकृतिक गैस की कमी का समाधान मुश्किल है, वहीं LPG के मामले में स्थिति कुछ बेहतर है। भारत वर्तमान में अपनी लगभग 60% LPG आयात करता है, लेकिन घरेलू रिफाइनरियों में उत्पादन बढ़ाकर इसकी आंशिक भरपाई की जा सकती है। इसके लिए अधिक कच्चे तेल का आयात करना होगा।हालांकि, यह प्रक्रिया समय ले सकती है और भोजन जैसी मूलभूत जरूरत इंतजार नहीं कर सकती, खासकर बुजुर्गों और बीमारों के लिए।
केरल में संभावित खाद्य संकट
यदि स्थिति बनी रहती है, तो केरल जैसे राज्य में, जो लंबे समय से भूख की समस्या से काफी हद तक मुक्त रहा है, अब खाद्य संकट का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे में राज्य सरकार का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। खासकर तब, जब विधानसभा चुनाव (9 अप्रैल) नजदीक हैं, सरकार इस संकट को हल करने के लिए सक्रिय भूमिका निभा सकती है।
सरकार क्या कर सकती है?
केरल ने कोविड के दौरान प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन और आश्रय की व्यवस्था करके अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित की थी। यहाँ सरकारी तंत्र, स्वयंसेवी संगठन, महिला स्वयं सहायता समूह और राजनीतिक दल मिलकर तेजी से काम कर सकते हैं।अल्पकालिक समाधान के रूप में पारंपरिक इलेक्ट्रिक स्टोव उपयोगी हो सकते हैं, भले ही वे कम ऊर्जा-कुशल हों। सरकार को बिजली आपूर्ति बढ़ाने और ग्रिड को मजबूत करने की जरूरत होगी ताकि बढ़ते लोड को संभाला जा सके।
संगठित समाज से मिल सकती है मदद
केरल में लगभग हर क्षेत्र संगठित है रेस्टोरेंट मालिकों और कर्मचारियों के संगठन सक्रिय हैं। सरकार इन संगठनों के साथ मिलकर तेजी से समाधान लागू कर सकती है।
मध्यम अवधि का समाधान: इंडक्शन क्रांति
सरकार को स्थानीय निर्माताओं और विदेशी सप्लायर्स से इंडक्शन स्टोव और उपयुक्त बर्तनों की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देकर इंडक्शन स्टोव के सभी हिस्सों कॉपर कॉइल से लेकर ग्लास-सेरामिक सतह तक का घरेलू उत्पादन बढ़ाना चाहिए।
तत्काल चुनौती: बिजली और प्रबंधन
अल्पकाल में सबसे बड़ी चुनौती होगी अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था और ग्रिड को मजबूत करना। यदि बहुत सारे लोग एक साथ खाना बनाएंगे तो लोड बढ़ेगा। इससे बचने के लिए सरकार और संस्थाएं मिलकर कुकिंग टाइम का समन्वय कर सकती हैं, ताकि बिजली पर अचानक दबाव न पड़े।
केरल के पास संगठनात्मक और संस्थागत क्षमता है कि वह इस रसोई गैस संकट से उबर सके। जरूरत है तेज, समन्वित और दूरदर्शी कदम उठाने की।यह संकट केवल गैस की कमी नहीं, बल्कि भारत के लिए एक संकेत है कि उसे भविष्य में ऊर्जा आत्मनिर्भर और सुरक्षित कुकिंग सिस्टम की ओर बढ़ना होगा।
(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)


