
AI में निवेश और इसके इस्तेमाल से भारत की सुरक्षा, विज्ञान और तकनीक में मजबूती आ सकती है, लेकिन इसके लिए केवल तकनीक पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। शैक्षिक सुधार, अनुसंधान में निवेश और परिवर्तन भी जरूरी है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पिछले कुछ सालों में विभिन्न क्षेत्रों में बहस का विषय बन चुका है। ट्रेड यूनियनों से लेकर निवेशक और उद्योग समूहों तक हर कोई इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंतित है। ट्रेड यूनियनों को डर है कि लेबर-सेविंग टेक्नोलॉजी से काम करने वाले बेरोजगार हो सकते हैं, निवेशक AI बबल के फटने की आशंका जताते हैं और उद्योग समूह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का डर रखते हैं। हाल ही में दिल्ली में एक सेशन आयोजित किया गया, जिसमें AI के राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभावों और इससे निपटने के तरीकों पर चर्चा हुई। यह पहल थिंक टैंक NatStrat और Strategic Foresight Group ने की और मीडिया प्लेटफॉर्म Founding Fuel ने इसे संचालित किया।
AI का राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव
सेशन में यह साफ किया गया कि AI देश की वैज्ञानिक और आर्थिक ताकत, विभिन्न हथियार प्रणालियों की क्षमता, साइबर सुरक्षा और विविध संकटों का पूर्वानुमान लगाने की क्षमता पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। सत्र में सुझाए गए नीतिगत उपायों में कहा गया कि AI के चुनौतीपूर्ण प्रभाव से निपटने के लिए समाज, संस्कृति और राजनीति को लोकतांत्रिक बनाना आवश्यक है, साथ ही विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में निवेश बढ़ाना भी जरूरी है। सुझावों में AI को वैज्ञानिक खोज और अनुसंधान से जोड़ने की भी बात कही गई। उदाहरण के तौर पर Google DeepMind का AlphaFold प्रोटीन मॉलिक्यूल्स की संरचना का अनुमान लगाने में मदद कर चुका है। MIT ने इसी डेटा का इस्तेमाल करके नया एंटीबायोटिक विकसित किया। इसके अलावा न्यूक्लियर फ्यूजन स्टार्टअप्स AI का इस्तेमाल प्लाज्मा में हाइड्रोजन परमाणुओं के हीलियम में विलयन को नियंत्रित करने के लिए कर रहे हैं।
निजी क्षेत्र में AI अनुसंधान
AI अनुसंधान में निजी क्षेत्र को शामिल करने की भी सिफारिश की गई। भारत का R&D में GDP का केवल 0.65% खर्च होता है, जिसमें से 63% सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा खर्च किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि निजी क्षेत्र अक्सर नीचे पड़ा फल ही उठाता है, यानी जोखिम कम और तात्कालिक लाभ वाला निवेश करता है। सेमिकंडक्टर निर्माण के लिए Semicon India Mission को बढ़ावा देने की सिफारिश भी हुई, लेकिन यह “डोमेस्टिक फैब्स” और राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता के बीच अंतर को लेकर विवादास्पद मानी गई। उदाहरण के लिए, अगर Intel भारत में फैब बनाता है तो अमेरिकी तकनीक तक भारत की पहुंच सुनिश्चित नहीं होती। विशेषज्ञों का कहना है कि हर कंपोनेंट Extreme UV Lithography मशीनें, तापीय उपकरण, ऑप्टिकल मिरर—को देश में विकसित करना जरूरी है।
R&D फंडिंग और लोन विवाद
सरकार ने 2024 के बजट में 1 ट्रिलियन रुपये का R&D फंड घोषित किया, जिसे दीर्घकालिक सॉफ्ट लोन के रूप में उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। विशेषज्ञों ने इसे “असंगत” करार दिया। अगर शोध असफल होता है तो लोन कैसे चुकाया जाएगा? इसके बजाय National Pension System और Employees’ Provident Fund के योगदानकर्ताओं को 5% निवेश विकल्प देना अधिक व्यावहारिक सुझाव है।
AI अकेले पर्याप्त नहीं
सिफारिशों में AI को किसी स्टैंडअलोन समाधान के रूप में देखा गया, जबकि वास्तविकता यह है कि AI को प्रभावी बनाने के लिए ड्रोन, सैटेलाइट और SAR (Synthetic Aperture Radar) जैसी क्षमताओं की भी आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए AI का उपयोग केवल तकनीकी सुधार नहीं बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक बदलाव भी मांगता है।
विज्ञान और शिक्षा में परिवर्तन की जरूरत
भारत में पारंपरिक ज्ञान प्रणाली में ज्ञान को पूर्वनिर्धारित और सीमित माना गया। युवा केवल ग्रंथों का अध्ययन करते थे, नई खोज नहीं करते थे। अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण और क्रिटिकल थिंकिंग को शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा, ताकि AI और अन्य तकनीकों का वास्तविक लाभ लिया जा सके।
राष्ट्रीय स्वायत्तता और लोकतंत्र
AI के माध्यम से राष्ट्रीय स्वायत्तता मजबूत करने के लिए समाज, संस्कृति और राजनीति को लोकतांत्रिक बनाना अनिवार्य है। इसे विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में निवेश के साथ जोड़ना होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि देश के लिए रणनीतिक सोच में परिवर्तन है।
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