D Ravikanth

हॉर्मुज़ से लेकर इस्लामाबाद तक, क्या यह शांति है या तूफान से पहले सन्नाटा?


हॉर्मुज़ से लेकर इस्लामाबाद तक, क्या यह शांति है या तूफान से पहले सन्नाटा?
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ईरान-अमेरिका तनाव में मिला विराम अस्थायी है। पाकिस्तान की भूमिका अहम रही लेकिन स्थायी समाधान और वैश्विक स्थिरता अब भी अनिश्चित बनी हुई है।

दुनिया की अर्थव्यवस्था अभी भी अस्थिर बनी हुई है और हालिया घटनाक्रम को किसी बड़े बदलाव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान अचानक संकट कूटनीति का “विश्वगुरु” बन गया है, या फिर वह महज उस समय मौजूद था जब एक डरी हुई दुनिया को किसी ऐसे देश की जरूरत थी जो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान पर बड़े हमले से रोक सके।

साफ शब्दों में कहें तो पाकिस्तान अपनी मध्यस्थ भूमिका का श्रेय ले सकता है। द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, ईरान द्वारा दो हफ्ते के विराम को स्वीकार करने के पीछे पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशों और चीन के अंतिम समय के दबाव की भूमिका रही। पाकिस्तान ने जटिल हालात को संभालने में कुशलता जरूर दिखाई, लेकिन इसे नेतृत्व कहना सही नहीं होगा। यह कोई कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि संभावित विनाश को अस्थायी रूप से टालने की कोशिश थी।

शांति नहीं, सिर्फ विराम

चार हफ्तों तक अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर लगातार हमले किए। डोनाल्ड ट्रंप ने “पूरी तरह से सत्ता परिवर्तन” की बात कही, जबकि ईरान ने जवाब में स्पष्ट कर दिया कि वह झुकेगा नहीं। यह कोई दिखावा नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई थी। जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा था—लोग इतिहास बनाते हैं, लेकिन अपनी पसंद की परिस्थितियों में नहीं। ईरान ने यह युद्ध नहीं चुना, बल्कि उस पर थोपा गया।अब 15 दिनों का विराम मिला है—लेकिन यह शांति नहीं है। कई अहम सवाल अभी भी बने हुए हैं:

क्या यह स्थायी समाधान की शुरुआत है या बड़े युद्ध से पहले की खामोशी? क्या अमेरिका मुआवजा देने को तैयार होगा? क्या इज़राइल किसी समझौते को स्वीकार करेगा? और सबसे महत्वपूर्ण—हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण किसका रहेगा?यह 52 किलोमीटर लंबा समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग 20% तेल व्यापार के लिए अहम है और ईरान के लिए एक रणनीतिक हथियार की तरह है।

रणनीतिक बढ़त किसकी?

पश्चिमी विश्लेषकों का यह कहना कि “दोनों पक्ष जीत का दावा कर सकते हैं” वास्तविकता से बचने जैसा है। ईरान ने रणनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत की है। अमेरिका और इज़राइल ने सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन ईरान ने भी जवाबी हमले कर यह साबित किया कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है।

ईरान का प्रस्ताव और आगे की राह

अब असली बातचीत की शुरुआत मानी जा रही है, जो इस्लामाबाद में हो सकती है। ट्रंप, जो पहले कठोर बयान दे रहे थे, अब “विश्व शांति” की बात कर रहे हैं। वहीं इज़राइल का रुख अब भी सख्त बना हुआ है।ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह किसी भी समझौते के लिए मजबूत और भरोसेमंद सुरक्षा गारंटी चाहता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, चीन, रूस और पाकिस्तान की भूमिका हो। ईरान अमेरिकी सेनाओं की वापसी, प्रतिबंधों में राहत और युद्ध के मुआवजे की मांग कर रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है, लेकिन इस बार वह किसी ऐसे वादे को स्वीकार नहीं करेगा जो भविष्य में बदल जाए।

अस्थायी राहत, स्थायी समाधान नहीं

इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान को एक अहम कूटनीतिक अवसर जरूर मिला है, लेकिन इसे बड़े बदलाव के रूप में देखना गलत होगा। वैश्विक व्यवस्था अब भी अस्थिर है और खतरे पूरी तरह टले नहीं हैं।यह कोई जीत नहीं, बल्कि एक संकीर्ण बचाव है—जहां पाकिस्तान ने दरवाजा खुला रखने में भूमिका निभाई, लेकिन नियंत्रण अब भी उसके हाथ में नहीं है।

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