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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के कारण नौकरियों पर मंडराते संकट के सवाल पर बहुत ही सामान्य बातें कहीं। जहाँ उन्हें ठोस सबूत और भरोसेमंद स्किलिंग प्लान (कौशल विकास योजना) पेश करने चाहिए थे, वहां उन्होंने केवल औपचारिकता पूरी की।
इस महीने की शुरुआत में नई दिल्ली में 'इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026' का आयोजन हुआ। इस दौरान न्यूज़ एजेंसी ANI ने प्रधानमंत्री के साथ हुए एक कथित "इंटरव्यू" का टेक्स्ट जारी किया। सोशल मीडिया पर इस न्यूज़ एजेंसी ने कई वीडियो शेयर किए, जिनके शीर्षक कुछ इस तरह थे: "ANI के साथ इंटरव्यू में PM मोदी का भारत के AI भविष्य के लिए विजन" और "टॉप 3 में भारत: PM मोदी का AI विजन"। इन वीडियो को प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के विभिन्न सोशल मीडिया हैंडल से साझा भी किया गया।
एक कथित इंटरव्यू की हकीकत
इन वीडियो में समिट के दौरान प्रधानमंत्री के घूमने-फिरने की क्लिप्स को मुख्य विजुअल के रूप में इस्तेमाल किया गया था। इन दृश्यों पर इंटरव्यू की बातों को टेक्स्ट के रूप में दिखाया गया। कम से कम एक वीडियो में इंटरव्यू लेने वाली ANI की एडिटर स्मिता प्रकाश और प्रधानमंत्री के कुछ स्थिर चित्र (still shots) भी दिखे। दिलचस्प बात यह है कि दोनों के कपड़े बिल्कुल वैसे ही थे जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले हुए एक इंटरव्यू में थे।
यह लेख इस बात की पड़ताल नहीं कर रहा कि यह वाकई में कोई नया इंटरव्यू था या प्रधानमंत्री कार्यालय से मिला हुआ केवल एक लिखित टेक्स्ट। लेकिन इस कथित इंटरव्यू में एक पुराना ढर्रा साफ नजर आया। ANI के सवाल, सवालों से ज्यादा प्रधानमंत्री को अपनी बात रखने का मंच दे रहे थे। उदाहरण के लिए, एक सवाल था कि इस समिट का विजन क्या है और इसका उद्देश्य 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' (सबका कल्याण, सबकी खुशी) क्यों रखा गया है? ऐसे सवालों में कोई क्रॉस-क्वेश्चन या फॉलो-अप नहीं था।
नौकरियों पर संकट का सवाल
इंटरव्यू में एक सवाल ऐसा था जिसने सबका ध्यान खींचा, क्योंकि यह विषय आज के समय में बहुत महत्वपूर्ण है। सवाल था कि क्या AI नौकरियों को खत्म कर देगा? यह सवाल प्रधानमंत्री को अपनी बात रखने का एक मौका देने जैसा था। उनसे पूछा गया कि युवाओं में डर है कि AI उनकी नौकरियां छीन लेगा, ऐसे में भारत अपने युवाओं की शक्ति का इस्तेमाल कैसे करेगा और सरकार इस चुनौती से कैसे निपट रही है?
चूंकि सवाल में इस डर की गहराई को नापने की कोई कोशिश नहीं की गई थी, इसलिए प्रधानमंत्री को यह कहने का आसान मौका मिल गया कि यह खतरा बेबुनियाद है। उन्होंने कहा कि वे युवाओं की चिंता समझते हैं और तैयारी ही इस डर का सबसे अच्छा इलाज है। हालांकि, इस 'तैयारी' के लिए असल में क्या कदम उठाए गए हैं, इस पर उन्होंने चुप्पी साधे रखी।
बड़े इरादे और अधूरे नतीजे
प्रधानमंत्री के दावों की बारीकी से जांच करना जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि AI से नौकरी जाने का कोई असली खतरा नहीं है क्योंकि सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी स्किलिंग (कौशल प्रशिक्षण) मुहिम शुरू की है।
लेकिन अगर हम 2015 में शुरू हुए 'स्किल इंडिया मिशन' की हकीकत देखें, तो आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। हालांकि इस मिशन से कुछ क्षेत्रों में युवाओं की क्षमता और महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन शॉर्ट-टर्म कोर्स करने वालों का प्लेसमेंट रेट 30 प्रतिशत से भी कम है। इसका सीधा मतलब है कि ट्रेनिंग के बाद युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही है। प्रधानमंत्री का यह दावा कि वे इसे भविष्य की नहीं बल्कि अभी की जरूरत मान रहे हैं, बिना किसी ठोस सबूत के खोखला नजर आता है।
इतिहास और वर्तमान का टकराव
इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने यह भी तर्क दिया कि इतिहास गवाह है कि नई तकनीक से काम खत्म नहीं होता, बल्कि काम का स्वरूप बदल जाता है और नई नौकरियां पैदा होती हैं। लेकिन रोजगार के रुझानों को समझने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि नई तकनीक ने हमेशा पुरानी नौकरियों को खत्म किया है। औद्योगिक क्रांति से लेकर आज के AI युग तक, मशीनों ने इंसानों की जगह ली है।
भारत में ही यह अनुमान है कि साल 2024-25 के दौरान AI के बढ़ते प्रभाव के कारण IT क्षेत्र की लगभग 50,000 से 56,000 नौकरियों पर बुरा असर पड़ा है। पिछले दस सालों में, खासकर कोविड के बाद, नौकरियों के अवसर कम हुए हैं। रिसर्च बताती है कि 2030 तक मौजूदा 60 प्रतिशत नौकरियों के स्वरूप में बड़ा बदलाव आएगा। इसका समाज पर क्या और कितना असर होगा, इसका अभी पूरी तरह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
इंडेक्स की राजनीति
प्रधानमंत्री ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के 'ग्लोबल AI वाइब्रेंसी इंडेक्स' का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस इंडेक्स में भारत का तीसरा स्थान यह दिखाता है कि हम AI के क्षेत्र में कितनी तरक्की कर रहे हैं।
यहाँ दो विरोधाभास दिखते हैं। पहला यह कि जो राजनीतिक नेतृत्व भारत को मानसिक गुलामी से मुक्त करने (डी-कोलोनाइजेशन) की बात करता है, वह अपनी सफलता की पुष्टि के लिए एक विदेशी संस्था के सर्टिफिकेट पर निर्भर है। दूसरा यह कि यह इंडेक्स नौकरियों के नुकसान या फायदे को आधार नहीं बनाता। यह इंडेक्स केवल रिसर्च, अर्थव्यवस्था, पॉलिसी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कारकों पर केंद्रित होता है।
खोखले दावों की चमक
प्रधानमंत्री का यह कहना कि हर इनोवेशन नए मौके लाता है, आंशिक रूप से सच हो सकता है। लेकिन कड़वा सच यह है कि नई नौकरियां पैदा होने की प्रक्रिया में बहुत समय लगता है। इस बीच उन लोगों का क्या होगा जिनकी नौकरियां जा रही हैं? सरकार के पास फिलहाल इसका कोई ठोस प्लान नहीं दिखता।
अंत में, प्रधानमंत्री ने 'इनोवेशन' और 'इनक्लूजन' जैसे बड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि AI भारत के वर्कफोर्स को मजबूत करेगा। लेकिन जब हम इन भारी-भरकम शब्दों की गहराई में जाकर हकीकत तलाशते हैं, तो हाथ कुछ नहीं लगता। खासकर 'इनक्लूजन' (समावेश) शब्द का इस्तेमाल यहाँ किस संदर्भ में किया गया है, यह समझ से परे है।
(द फेडरल हर तरह के नज़रिए और राय पेश करने की कोशिश करता है। आर्टिकल में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और ज़रूरी नहीं कि वे द फेडरल के विचारों को दिखाते हों।)
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