
पश्चिम एशिया में उभरता धार्मिक सैन्य गठबंधन भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि, विदेश नीति और वैश्विक स्थिति के लिए नई रणनीतिक चुनौतियां खड़ी करता है।
हाल ही में यह कहा जा रहा है कि पश्चिम एशिया में अपने हितों की रक्षा के लिए तीन शक्तिशाली मुस्लिम देशों ने एक नया संगठन बनाया है। वैश्विक और भारतीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मिलकर एक गठबंधन बनाया है। मीडिया ने इस गठबंधन को “इस्लामिक नाटो” की संज्ञा दी है।
हालाँकि तुर्किये पहले से ही नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन (NATO) का हिस्सा रहा है—जिसमें यूरोप, अमेरिका और कनाडा जैसे देश एक सुरक्षा-सैन्य गठबंधन में शामिल हैं—लेकिन अब वह एक धर्म-आधारित गठबंधन का भी हिस्सा बन गया है। नाटो में अमेरिका के बाद तुर्किये की सेना दूसरी सबसे बड़ी है।
धर्म-आधारित गठबंधन का उभार
पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ तुर्किये का इस तरह का रक्षा गठबंधन बनाना एक बड़ा वैश्विक घटनाक्रम है, जिसके भारत और इज़राइल पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। माना जा रहा है कि तथाकथित “इस्लामिक नाटो” सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति, तुर्किये की सैन्य शक्ति और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता के सहारे संचालित होगा।
नाटो में “नॉर्थ अटलांटिक” शब्द पश्चिमी गोलार्ध के भौगोलिक संदर्भ को दर्शाता है, जबकि पश्चिम एशिया में प्रस्तावित इस्लामिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन में धर्म राष्ट्रीय हितों से आगे एक केंद्रीय भूमिका निभाता है। ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि जब भी इस्लाम को एक धर्म के रूप में चुनौती दी जाती है, तो मुस्लिम देश एकजुट होकर प्रतिक्रिया देते हैं।
ऐसी अटकलें भी हैं कि भविष्य में कुवैत, क़तर और दक्षिण एशिया के अन्य मुस्लिम देश—जैसे इंडोनेशिया, बांग्लादेश और मलेशिया—भी इस गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। ईरान इस समय एक गंभीर आंतरिक संकट और संघर्ष की स्थिति में है, इसलिए उसका भविष्य किस दिशा में जाएगा, यह समय ही बताएगा।
कश्मीर के बाद बदली वैश्विक स्थिति
अनुच्छेद 370 को हटाकर कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद, न केवल पाकिस्तान बल्कि पश्चिम एशिया के अन्य मुस्लिम देशों ने भी कश्मीर मुद्दे पर अपनी तटस्थता से दूरी बनानी शुरू कर दी है। भाजपा/आरएसएस सरकार द्वारा चुनावों में भारतीय मुसलमानों को निशाना बनाकर जिस तरह धार्मिक भाषा का आक्रामक इस्तेमाल किया गया और संविधान की प्रस्तावना से “सेक्युलर” शब्द हटाने का विरोध किया गया, उससे हिंदू–मुस्लिम टकराव की एक संभावित तस्वीर उभरने लगी है।
प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुअल पी. हंटिंगटन ने भविष्यवाणी की थी कि आने वाले समय के संघर्ष धर्म के क्षेत्र में होंगे, जिसे उन्होंने “सभ्यताओं का संघर्ष” कहा था। सवाल यह है कि क्या भारत भी भविष्य में हिंदू–मुस्लिम संघर्ष की ओर बढ़ रहा है?
आरएसएस/भाजपा का मुस्लिम-विरोधी अभियान 2014 के चुनावों से शुरू हुआ, जिसमें कांग्रेस पर “मुस्लिम तुष्टीकरण” का आरोप लगाया गया। कांग्रेस ने कश्मीर और मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों को लोकतांत्रिक और समावेशी दृष्टिकोण से संभाला था। बीते 11 वर्षों में यह अभियान लगातार चलता रहा और अब इस्लामिक दुनिया इसे इस्लाम-विरोधी अभियान के रूप में देखने लगी है। इसी पृष्ठभूमि में मुस्लिम देशों ने भारत और पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन किया है।
ऑपरेशन सिंदूर: एक मोड़
ऑपरेशन सिंदूर को एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। भले ही उस चार-दिवसीय युद्ध में जीत-हार को लेकर मतभेद हों, लेकिन इसने वैश्विक गठबंधनों की दिशा बदल दी। इस युद्ध में पहली बार मुस्लिम दुनिया खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ी नजर आई।
1965 और 1971 के युद्धों में भारत ने अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के कारण पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में सफलता पाई थी। उस समय मुस्लिम देशों को यह विश्वास था कि यह दो देशों के बीच का विवाद है, न कि धार्मिक संघर्ष। लेकिन “सिंदूर युद्ध” ने इस धारणा को बदल दिया।
पहलगाम में पर्यटकों की नृशंस हत्या के बाद आरएसएस/भाजपा सरकार ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (जिसे पाकिस्तान “आज़ाद कश्मीर” कहता है) में आतंकी ठिकानों पर हमला किया। कांग्रेस शासन के दौरान भी दोनों देशों के बीच शत्रुता बनी रही थी, लेकिन उस समय भारत की मजबूत धर्मनिरपेक्ष छवि पश्चिम एशियाई मुस्लिम देशों को पाकिस्तान से दूरी बनाए रखने में मदद करती थी।
भारत में मुस्लिम-विरोधी राजनीतिक भाषा
इसमें कोई संदेह नहीं कि आरएसएस/भाजपा सरकार ने पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को संरक्षण देने के खिलाफ वैश्विक अभियान चलाया। लेकिन इसके समानांतर भारत के भीतर मुस्लिम-विरोधी राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज़ होती चली गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत सहित कई नेताओं ने लगातार “मुस्लिम तुष्टीकरण” की बात की।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी “सनातन धर्म” को “विश्व गुरु” के रूप में प्रस्तुत किया गया। मुस्लिम और ईसाई देशों में कई एनआरआई सम्मेलन धार्मिक राष्ट्रवाद की भावना के साथ आयोजित किए गए। साथ ही, संविधान की प्रस्तावना से “सेक्युलर” शब्द हटाने की मांग ने यह संदेश दिया कि इस्लाम को एक धर्म के रूप में निशाना बनाया जा रहा है।
इससे वैश्विक स्तर पर यह धारणा बनने लगी कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक पूर्ण हिंदू धार्मिक राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। भारत के पड़ोसी कई मुस्लिम देश तानाशाही और अस्थिर शासन वाले रहे हैं, जो हमेशा भारत की स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था से ईर्ष्या करते आए हैं। धार्मिक राष्ट्रवाद लोकतंत्र से मूलतः असहज रहता है।
इज़राइल–फिलिस्तीन युद्ध और नया गठबंधन
पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों का इज़राइल के साथ लंबे समय से संघर्ष रहा है, खासकर 1967 के युद्ध के बाद। 7 अक्टूबर 2023 को यहूदी नागरिकों पर हुए आतंकी हमले के जवाब में इज़राइल द्वारा फिलिस्तीन पर किया गया हमला वस्तुतः एकतरफा और विनाशकारी युद्ध था। इन घटनाओं ने भी शक्तिशाली मुस्लिम देशों को एक नए सैन्य गठबंधन की ओर प्रेरित किया।
भारत के लिए खतरे की घंटी
असल खतरा भारत के लिए अधिक गंभीर है। धार्मिक दृष्टि से मुसलमान और यहूदी एक ही इब्राहीमी परंपरा से आते हैं और भविष्य में वे अपने मतभेद सुलझा सकते हैं। अब्राहम समझौते (Abraham Accords) इसी दिशा में एक कदम हैं। भले ही ये समझौते विफल हों, इज़राइल को ईसाई दुनिया का व्यापक समर्थन मिलेगा।
दूसरी ओर, 56 मुस्लिम देशों के पास OIC और मुस्लिम वर्ल्ड लीग जैसे साझा संगठन हैं। भारत के पास ऐसे सहयोगी नहीं हैं। नेपाल भी संभवतः किसी धार्मिक युद्ध में भारत का साथ नहीं देगा। चीन ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा के कारण भारत का समर्थन नहीं करेगा, बल्कि वह भारत में लोकतंत्र को कमजोर होते देखना चाहता है।
सावधानी की ज़रूरत
वर्तमान परिस्थितियां मांग करती हैं कि आरएसएस/भाजपा सरकार उभरते वैश्विक धार्मिक राष्ट्रवाद को लेकर अत्यंत सावधानी बरते। यदि संविधान की मूल धर्मनिरपेक्ष संरचना पर लगातार हमले होते रहे, तो भारत की स्थिरता, सुरक्षा और विकास खतरे में पड़ सकते हैं।
यही कारण था कि संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्षता को एक गहरे सिद्धांत के रूप में स्थापित किया। प्रस्तावना में “सेक्युलर” शब्द उसी मूल भावना की अभिव्यक्ति है। यदि इस पर लगातार हमला किया गया, तो धार्मिक मुस्लिम राष्ट्र इसका लाभ उठाएंगे।
एक ऐसे राष्ट्रवादी के रूप में, जो धार्मिक नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष और उत्पादक राष्ट्रवाद में विश्वास रखता है, मेरी आशा है कि आरएसएस/भाजपा इस नए वैश्विक घटनाक्रम को गंभीरता से समझे और भारत को अनावश्यक जोखिम में न डाले।
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