
विशेषज्ञों के अनुसार, कर्तव्यों को प्रमुख और अधिकारों को गौण बताने की यह रणनीति नागरिकों को दो वर्गों में बांट देती है। एक, वे जो बिना सवाल किए कर्तव्य निभाते हैं। दूसरे, वे जो अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपने पहले 25 वर्षों तक बिना किसी लिखित संविधान के काम किया। अब वह अपने स्थापना के 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, लेकिन आज भी संघ का कोई औपचारिक, कानूनी अस्तित्व कागजों पर दर्ज नहीं है। ऐसे में यह एक असामान्य स्थिति मानी गई, जब संघ के एक शीर्ष पदाधिकारी ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर देशवासियों को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह एक स्थापित तथ्य है कि RSS—जो भारतीय जनता पार्टी (BJP) की वैचारिक आधारशिला माना जाता है—ने अपना संविधान सरदार वल्लभभाई पटेल के दबाव और महात्मा गांधी की हत्या की साजिश में नाम आने के बाद ही अपनाया था। इसके बाद भी RSS का भारतीय संविधान और राष्ट्रीय ध्वज के साथ संबंध लंबे समय तक सहज नहीं रहा।
हाल के वर्षों में ही संघ के कार्यालयों में गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे हैं। हालांकि इन कार्यक्रमों का पैमाना सरकारी आयोजनों की तुलना में सीमित रहता है और आमतौर पर इन्हें संगठन के आंतरिक कार्यक्रम मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
‘अधिकार नहीं, कर्तव्य पहले’
इसी क्रम में, इस गणतंत्र दिवस पर RSS के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबाले ने दिल्ली स्थित संघ कार्यालय में तिरंगा फहराने के बाद दिए गए अपने भाषण में एक मूल विचार सामने रखा। उन्होंने कहा कि RSS की विचारधारा में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य, संविधान में दिए गए उनके अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। उनके पूरे भाषण में नागरिक कर्तव्यों के कई उदाहरण दिए गए—समकालीन जीवन से लेकर पौराणिक कथाओं तक— लेकिन संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों का एक बार भी उल्लेख नहीं किया गया। यह उल्लेखनीय है कि RSS और BJP दोनों ही 1975 में लगाए गए आपातकाल के मुखर आलोचक रहे हैं, जब नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे।
सरकार और संगठन की वैचारिक समानता
होसबाले के बयान से यह भी स्पष्ट हुआ कि RSS नेतृत्व और केंद्र सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संविधान की व्याख्या और प्राथमिकताओं को लेकर एक ही सोच रखते हैं। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं संविधान को भारत का एकमात्र पवित्र ग्रंथ” बता चुके हैं। ऐसे में संघ और सरकार के बीच वैचारिक मतभेद संगठनात्मक स्तर पर भले हों, लेकिन शासन, राष्ट्र और संविधान को लेकर दोनों के दृष्टिकोण में गहरी समानता दिखाई देती है।
नागरिकों से अपेक्षाएं
अपने संक्षिप्त भाषण में होसबाले ने नागरिकों से भारत के “शाश्वत आध्यात्मिक मूल्यों” को अपनाने, नागरिक कर्तव्यों के पालन और राष्ट्रीय दायित्व निभाने का आह्वान किया। उन्होंने भारत की एकता बनाए रखने और सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नागरिकों पर डाली। महाभारत के पात्र भीष्म पितामह का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रजा धर्म और *प्रजा कर्तव्य* की अवधारणा को सामने रखा और आधुनिक भारत में भी इन्हें अपनाने की बात कही। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि जिन कार्यों की अपेक्षा आम नागरिकों से की जा रही है, उनमें से अधिकांश की वास्तविक जिम्मेदारी राज्य और सत्ता में बैठे लोगों की होती है।
‘कर्तव्य भवन’ और ‘कर्तव्य पथ’
संघ परिवार की ‘कर्तव्य’ पर जोर देने वाली सोच का असर सरकारी नीतियों में भी दिखाई देता है। नई दिल्ली में सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत बन रहे सभी केंद्रीय सचिवालय भवनों का नाम कर्तव्य भवन रखा गया है। सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री मोदी ने राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया और कहा कि ‘राजपथ’ गुलामी की मानसिकता का प्रतीक था। उनके अनुसार, नए नाम से यह स्पष्ट होता है कि सरकार का मूल भाव राष्ट्र के प्रति कर्तव्य है।
अधिकारों के लिए जगह कहां?
विश्लेषकों का सवाल है कि जब कर्तव्यों के लिए इतने प्रतीक गढ़े जा रहे हैं तो नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण और शिकायत निवारण के लिए कोई ‘अधिकार भवन’ क्यों नहीं है? लोकतंत्र में नागरिकों का सरकार से अधिकार मांगना गुलामी नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रतीकात्मक संदेश
जहां मंत्रालयों को ‘कर्तव्य भवन’ कहा गया है, वहीं नए प्रधानमंत्री कार्यालय को सेवा तीर्थ नाम दिया गया है। इस पर व्यंग्य करते हुए प्रसिद्ध मिथकशास्त्री देवदत्त पटनायक ने कहा था कि जब राजा आलसी होता है तो वह राजमार्ग की बजाय जनता के कर्तव्य पथ पर ध्यान देता है।
संविधान में दर्ज कर्तव्य
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(क) में दर्ज मौलिक कर्तव्यों में देश की एकता बनाए रखना, सामाजिक सद्भाव बढ़ाना, विविधता का सम्मान करना, वैज्ञानिक सोच विकसित करना और साझा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना शामिल है।
आलोचकों का कहना है कि इन्हीं कर्तव्यों का सबसे अधिक उल्लंघन बहुसंख्यकवादी राजनीति के दौर में देखने को मिला है। यह भी उल्लेखनीय है कि मौलिक कर्तव्यों को संविधान में आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के जरिए जोड़ा गया था, जब मौलिक अधिकार निलंबित थे।
अधिकारों से ध्यान हटाने की कोशिश?
प्रधानमंत्री मोदी अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही मौलिक कर्तव्यों पर जोर देते रहे हैं और नागरिक अधिकारों की बात करने वाले संगठनों और आंदोलनों की आलोचना करते रहे हैं। 2019 में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था कि आजादी के बाद देश केवल अधिकारों की बात करता रहा और कर्तव्यों की अनदेखी की गई, जिससे भारत कमजोर हुआ। कुछ दिन बाद तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इसी तर्क को दोहराया।


