
टी20 वर्ल्ड कप 2026 में कुल 20 टीमें हिस्सा ले रही हैं। मैचों के दौरान रोमांच और नए हीरो जरूर सामने आएंगे। लेकिन टूर्नामेंट की शुरुआत से ही यह स्पष्ट है कि खेल के बजाय राजनीति और प्रशासनिक विवाद ने इसकी रूपरेखा पर गहरा असर डाला है।
आगामी आईसीसी पुरुष टी20 वर्ल्ड कप 2026 के मद्देनजर ऑस्ट्रेलिया अपने तेज गेंदबाजों की फिटनेस और workload का विशेष ध्यान रख रहा है। पैट कमिंस और जोश हेजलवुड की शारीरिक स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। इसी तरह दक्षिण अफ्रीका डेविड मिलर की फिटनेस पर नजर रखे हुए है, जबकि टीम को हाल की चोटों के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इंग्लैंड श्रीलंका का दौरा कर रहा है और उपमहाद्वीपीय परिस्थितियों में टीम संयोजन और रणनीतियों का परीक्षण कर रहा है। लेकिन इन सभी तैयारियों पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया है।
राजनीति का प्रभुत्व
टी20 वर्ल्ड कप को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा क्रिकेट के बजाय राजनीति और प्रशासन पर रही है। बांग्लादेश का टूर्नामेंट से बहिष्कार, स्कॉटलैंड की अचानक भागीदारी और पाकिस्तान के संभावित निर्णय ने सुर्खियां बटोर ली हैं। टूर्नामेंट शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे हैं, लेकिन चर्चा खेल से दूर राजनीतिक तनाव और प्रशासनिक निर्णयों के इर्द-गिर्द घूम रही है।
बांग्लादेश का बहिष्कार
विवाद का केंद्र बिंदु है बांग्लादेश का अचानक टूर्नामेंट से बाहर होना और स्कॉटलैंड की जगह लेना है। बांग्लादेश ने भारत में निर्धारित मैचों में जाने से सुरक्षा कारणों का हवाला दिया और न्यूट्रल वेन्यू की मांग की थी। लंबे विचार-विमर्श और आईसीसी के अपने आकलन के बाद, उनकी मांग खारिज कर दी गई। बांग्लादेश ने जब पुष्टि नहीं की तो आईसीसी ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए उन्हें बाहर कर दिया। खेल के नजरिए से यह कदम चिंताजनक है। किसी पूर्ण सदस्य देश का वर्ल्ड कप से हफ्तों पहले बाहर होना आधुनिक क्रिकेट में बहुत दुर्लभ है। इस फैसले ने पूर्व खिलाड़ियों और प्रशासकों की आलोचना को जन्म दिया और बांग्लादेश में भी बोर्ड की रणनीति पर सवाल उठे।
खिलाड़ियों और फैंस के लिए झटका
खिलाड़ियों के लिए यह व्यक्तिगत नुकसान है। युवा बांग्लादेशी क्रिकेटरों के लिए वर्ल्ड कप एक करियर-निर्धारण मंच है और यह अवसर उनके हाथ से चला गया। वहीं, स्कॉटलैंड की भागीदारी एसोसिएट क्रिकेट के लिए उत्साहजनक है, लेकिन यह भी याद दिलाती है कि यह टूर्नामेंट खेल से ज्यादा प्रशासनिक और राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित हुआ है। पाकिस्तान ने बांग्लादेश के साथ एकजुटता जताई है और अपने भागीदारी पर फिर से विचार करने का संकेत दिया है। आईसीसी ने चेतावनी दी है कि किसी देश का पीछे हटना गंभीर परिणाम ला सकता है। इन सभी घटनाओं ने फैंस की उम्मीद और उत्साह को कम कर दिया है।
वित्तीय नुकसान
बांग्लादेश का बहिष्कार उसके क्रिकेट अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा झटका है। टूर्नामेंट में न होने से भागीदारी फीस और आईसीसी से मिलने वाली आय खो सकती है। अनुमान है कि करीब 27 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी बोर्ड की वार्षिक आईसीसी आय का लगभग 60% गंवाया जा सकता है। यह धन घरेलू प्रतियोगिताओं, ग्रासरूट कार्यक्रम और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए इस्तेमाल होता है। न सिर्फ बांग्लादेश, बल्कि प्रसारक, प्रायोजक और खिलाड़ी भी इस नुकसान से प्रभावित होंगे।
क्रिकेट को पीछे धकेला गया
दक्षिण एशियाई क्रिकेट लंबे समय से अपने बड़े टूर्नामेंट्स को खेल से बाहर की राजनीति से बचाने में संघर्ष कर रहा है। अक्सर राजनीतिक दबाव खेल में घुस जाता है, जिससे खिलाड़ियों, प्रशंसकों और प्रशासकों के बीच भरोसे की कमी पैदा होती है। आईसीसी के लिए चुनौती सिर्फ नियम लागू करना नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और समानता के साथ उन्हें लागू करना है।


