
फर्टिलाइजर सब्सिडी प्रदूषण और इनएफिशिएंसी को बढ़ावा देती है, जिससे खेती की पैदावार बिगड़ती है, पानी जहरीला होता है और खेती एक महंगी साइकिल में फंस जाती है।
अपने शुद्ध रूप में रासायनिक उर्वरकों में कोई गंध नहीं होती। लेकिन भारत में उर्वरक न केवल रूपकात्मक रूप से, बल्कि शाब्दिक अर्थों में भी बेहद बदबूदार हो चुके हैं। वास्तविक बदबू नमी के संपर्क में आने से पैदा होती है, जब यूरिया और डाय-अमोनियम फॉस्फेट से अमोनिया निकलता है, वही गैस जो सार्वजनिक शौचालयों की तीखी गंध के लिए कुख्यात है। इस बदबू को बयान करने के लिए तो एक पूरा लेख चाहिए और यही प्रयास यहां किया जा रहा है।
उर्वरक सब्सिडी केंद्रीय बजट के सबसे बड़े मदों में से एक है। चालू वर्ष में यह 1.84 लाख करोड़ रुपये रही है और आगामी बजट में इसके 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें से लगभग दो-तिहाई सब्सिडी यूरिया पर खर्च होती है, जो मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाता है। इसके मुकाबले फॉस्फेटिक और पोटैशिक उर्वरकों को काफी कम सब्सिडी मिलती है। इसका नतीजा यह होता है कि भारत में उर्वरकों के इस्तेमाल का अनुपात आदर्श संतुलन से काफी भटक गया है। किसान भारी सब्सिडी वाले यूरिया का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, जबकि अन्य उर्वरकों का कम।
यूरिया की बर्बादी
प्राकृतिक तत्वों की आवर्त सारणी में N नाइट्रोजन, P फॉस्फोरस और K पोटैशियम को दर्शाता है। पोटैशियम के लिए लैटिन शब्द Kalium है, जिसकी जड़ अरबी शब्द al-qalyah में है, जिसका अर्थ है पौधों की राख—जिसे परंपरागत रूप से मिट्टी को उपजाऊ बनाने में इस्तेमाल किया जाता था। इसी शब्द से “अल्कली” शब्द भी बना है। उर्वरकों का आदर्श अनुपात N:P:K = 4:2:1 माना जाता है। लेकिन भारत में यह अनुपात बिगड़कर 10.9:4.4:1 तक पहुंच गया है। इसका मतलब यह है कि भारी मात्रा में सब्सिडी वाला यूरिया फसलों को कोई लाभ पहुंचाए बिना बर्बाद हो जाता है।
कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी के अनुसार, न्यूट्रिएंट यूज़ एफिशिएंसी यानी डाले गए पोषक तत्वों में से वास्तव में पौधे द्वारा अवशोषित हिस्से का प्रतिशत सिर्फ 35 से 40 प्रतिशत रह गया है। शेष उर्वरक या तो मिट्टी में फिक्स हो जाता है या वाष्पीकरण और रिसाव के जरिये नष्ट हो जाता है। इसके अलावा सब्सिडी वाले यूरिया का लगभग एक-पांचवां हिस्सा डायवर्ट भी हो जाता है।
पर्यावरण और उत्पादकता पर बढ़ता बोझ
जो यूरिया पौधों द्वारा नहीं लिया जाता, वह टूटकर नाइट्रस ऑक्साइड छोड़ता है—एक बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस, जो वैश्विक तापन को बढ़ाती है। जो यूरिया नाइट्रेट में बदलकर पानी में मिल जाता है, वह जल को पीने योग्य नहीं रहने देता और मानव शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को भी बाधित करता है। उर्वरकों का असंतुलित इस्तेमाल न केवल सब्सिडी की बर्बादी है, बल्कि हवा और पानी को जहरीला भी बनाता है। जब अतिरिक्त यूरिया पौधों द्वारा अवशोषित भी हो जाता है तो वह सिर्फ हरियाली बढ़ाता है—अनाज उत्पादन में समानुपातिक वृद्धि नहीं करता।
गुलाटी के मुताबिक, भारत में उर्वरकों के इस्तेमाल से मिलने वाला अतिरिक्त उत्पादन 1970 के दशक में प्रति अतिरिक्त इकाई उर्वरक पर 10 इकाई अनाज से गिरकर अब 2.7 इकाई रह गया है। प्रति इकाई खेती योग्य क्षेत्र से मिलने वाला कृषि मूल्यवर्धन चीन के मुकाबले भारत में केवल 38 प्रतिशत है—और उर्वरक असंतुलन इसकी एक बड़ी वजह है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारत में यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस पर भी भारी सब्सिडी दी जाती है—अन्य उद्योगों के मुकाबले इसकी कीमत 50 प्रतिशत तक कम होती है। भारत बाजार दरों पर एलएनजी आयात करता है, उसे री-गैसीफाई कर देशभर में पाइप से भेजता है और फिर उर्वरक उद्योग को लागत से काफी कम कीमत पर बेच देता है। इसके बाद उसी उर्वरक को दोबारा सब्सिडी दी जाती है, ताकि वह हवा और पानी को प्रदूषित करे।
इसके अलावा खाद्य सब्सिडी के रूप में एक और अप्रत्यक्ष सब्सिडी जुड़ जाती है। खाद्य सब्सिडी, एफसीआई की लागत और अनाज बिक्री से होने वाली आय के बीच का अंतर है। इस लागत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अनाज खरीद, परिवहन, भंडारण, खराबा और चोरी, साथ ही भंडारण के लिए लिए गए कर्ज पर ब्याज शामिल होता है। किसानों को उत्पादन लागत से ऊपर मार्जिन देने के लिए MSP हर साल बढ़ाया जाता है, लेकिन ये कीमतें वैश्विक दक्षता मानकों से नहीं जुड़ी होतीं। नतीजतन जरूरत से ज़्यादा अनाज पैदा होता है। पिछले साल एफसीआई के गोदामों से 52 लाख टन चावल एथनॉल बनाने के लिए भेजा गया।
भारत में कुल एथनॉल उत्पादन का 56 प्रतिशत अनाज से आता है, न कि गन्ने से। यह अनाज सब्सिडी वाले उर्वरकों से उगाया जाता है। यानी पहले सब्सिडी को नाइट्रस ऑक्साइड और जहरीले अपशिष्ट के रूप में हवा-पानी में छोड़ते हैं और फिर उसी सब्सिडी को आंतरिक दहन इंजनों में जला देते हैं, जो ऊर्जा को गति में बदलने में वैसे भी बेहद अक्षम होते हैं।
कृषि सब्सिडी और प्रोत्साहन में सुधार
तो इस स्पष्ट रूप से अपव्ययी व्यवस्था से बाहर कैसे निकला जाए? सबसे पहले किसानों को इनपुट सब्सिडी देने के बजाय आय समर्थन दिया जाना चाहिए। उर्वरक, पानी और बिजली की कीमतें वास्तविक लागत और उत्पादकों के लिए उचित मुनाफे के अनुरूप तय हों। इससे प्रतिस्पर्धा और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और किसान इनपुट का संतुलित उपयोग करेंगे। N, P और K के मिश्रण वाले जटिल उर्वरक बाजार में आएंगे, जो अलग-अलग फसलों के लिए उपयुक्त हों—चीन की उच्च कृषि उत्पादकता का एक कारण यही है। यदि सिंचाई जल और बिजली की सही कीमत तय हो तो किसान बाढ़ सिंचाई छोड़कर नियंत्रित सिंचाई अपनाएंगे, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और पानी की बर्बादी व मिट्टी की लवणता घटेगी।
भारत में फसलें अक्सर उन agro-climatic ज़ोन में उगाई जाती हैं, जहां वे सबसे उपयुक्त नहीं हैं। उदाहरण के लिए पानी की भारी मांग वाली गन्ने की खेती शुष्क दक्कन क्षेत्र में होती है, जबकि यह गंगा के मैदानों तक सीमित होनी चाहिए।
भारत खाद्य तेलों और दालों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में अनाज के कुछ क्षेत्र को तिलहन और दलहन की खेती की ओर मोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए अनाज पर लगातार बढ़ते MSP के चक्र से बाहर निकलना और तिलहन-दलहन को समान समर्थन देना ज़रूरी है।
किसानों को अधिक शक्ति दें
एफसीआई को हर मौसम में केवल उतना ही अनाज खरीदना चाहिए, जितना बफर स्टॉक मानकों के लिए जरूरी हो। साथ ही, कीमतों को स्थिर रखने के लिए उसे वायदा और विकल्प बाजारों में हस्तक्षेप की क्षमता विकसित करनी चाहिए। जहां ये बाजार प्रतिबंधित हैं, उन्हें खोला जाना चाहिए। पूर्ण ग्रामीण विद्युतीकरण का इस्तेमाल विकेंद्रीकृत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने में किया जाए, ताकि फसल बर्बाद न हो और किसान मूल्य संवर्धन का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकें। इसके लिए सहकारिताओं और किसान-स्वामित्व वाली कंपनियों की अहम भूमिका हो सकती है। किसानों को आय समर्थन दिया जाए, ताकि वे बाजार कीमतों पर इनपुट खरीद सकें और ऐसी फसलें चुन सकें जो अधिक उपज और आय दें। आय समर्थन WTO के नियमों के खिलाफ नहीं जाता, क्योंकि इसे व्यापार-विकृत करने वाली सब्सिडी नहीं माना जाता।
ऊर्जा क्षेत्र में भूमिगत कोयले को गैस में बदलने और कोयला व एलएनजी आयात पर निर्भरता खत्म करने के लिए R&D में निवेश किया जाए। गैस टर्बाइनों से कार्बन डाइऑक्साइड पकड़ने की तकनीक विकसित की जाए और प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन व शुद्ध कार्बन बनाने की उभरती तकनीकों को अपनाया जाए। हाइड्रोजन एक स्वच्छ ईंधन है, जो या तो फ्यूल सेल में बिजली बनाता है या जलवाष्प में बदल जाता है। यह सब संभव है। अधिकांश तकनीकें पहले से मौजूद हैं। कमी सिर्फ एक चीज़ की रही है—नीतिगत महत्वाकांक्षा और राजनीतिक साहस की। और यही दो गुण हैं, जिन्हें मौजूदा सरकार अपनी सबसे बड़ी खासियत बताती है।
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